हास्य-व्यंग्य: विचार नहीं, धारा में बहते नेता जी, प्रगतिशील होने के लिए विचारधारा कोई ‘बैरियर’ नहीं

बड़े दिनों बाद कल शाम को लल्लन चचा मिल गए। बौराए घूम रहे थे। हम पहचान ही नहीं पाए। हमें आशंका हुई कि कहीं उन पर तीसरी लहर का असर तो नहीं हावी हो गया मगर जल्द ही अपनी भूल का अहसास हुआ।

Pooja SinghSun, 10 Oct 2021 12:26 PM (IST)
हास्य-व्यंग्य: विचार नहीं, धारा में बहते नेता जी, प्रगतिशील होने के लिए विचारधारा कोई ‘बैरियर’ नहीं

संतोष त्रिवेदी। बड़े दिनों बाद कल शाम को लल्लन चचा मिल गए। बौराए घूम रहे थे। हम पहचान ही नहीं पाए। हमें आशंका हुई कि कहीं उन पर तीसरी लहर का असर तो नहीं हावी हो गया, मगर जल्द ही अपनी भूल का अहसास हुआ। उनके माथे पर ‘फुल-वैक्सिनेटेड’ का लेबल लगा था। हमें देखते ही ‘आंय-बांय’ बकने लगे। उनके साथ चल रही उनकी आत्मा ने रहस्य उजागर किया कि उनके अंदर सियासत का साया प्रवेश कर गया है। इसलिए वह भी ‘सही जगह’ प्रवेश चाहते हैं। वह बड़बड़ा रहे थे, ‘देश इस समय भीषण बदलाव के दौर में है। पलक झपकते सब बदल रहा है। जो देख रहे हो, वह सच नहीं है। धाराएं बदल रही हैं। दल बदल रहे हैं। लोग गंडक में डुबकी लगाकर गंगा का पुण्य लूट रहे हैं। और तो और, निष्ठा और नैतिकता व्यक्तित्व की सबसे बड़ी बुराइयां हैं। जबकि झूठ और पाखंड अच्छे ‘करियर’ साबित हो रहे हैं।

हम कुछ दिनों से अपनी आत्मा को कुरेद रहे थे। इसी ने बाहर आकर समझाया कि प्रगतिशील होने के लिए विचारधारा कोई ‘बैरियर’ नहीं है। उसे तोड़कर ही मुक्ति का द्वार खुलता है। इसलिए वाम हो कि दक्षिण, ‘मध्य’ में आना ही सबकी नियति है।’ यह कहकर उन्होंने नया झंडा उठा लिया। वाममार्ग से होते हुए वे मध्य की ओर बढ़ चले। आगे जगह खूब खाली पड़ी थी। इसलिए वहां आगे बढ़ने का ‘स्कोप’ दिख रहा था। हमें भी कुछ सवाल दिखाई दिए। उन्हीं से शुरू कर दिया, ‘कल तो झंडे का रंग गाढ़ा था। आज बिल्कुल हल्का है। रंग बदलते समय कुछ ‘विचार-उचार’ नहीं किए चचा?’

वह चेहरे से ‘मास्क’ हटाते हुए बोले, ‘क्यों नहीं! ख़ूब किए। अफसोस है कि बुढ़ापे में यह बात समझ आई कि मनुष्य को ‘विचार’ में नहीं ‘धारा’ में बहना चाहिए। बाएं, दाएं रहेंगे तो किनारे हो जाएंगे। इसलिए विचार को उचार कर मध्य में आ गए हैं। सत्ता की नाव यहीं बहती है। अब बहने में भी सुभीता होगी। जब मन किया, बाएं या दाएं करवट ले ली। पलटने में तनिक संकोच किया तो जिंदगी भर पछताएंगे। वैसे भी आदमी समझदार तभी माना जाता है, जब उसके लिए कोई अपना-पराया नहीं होता। मकबूल शायर ने कहा भी है, ‘उसी को जीने का हक है जो इस जमाने में, इधर का दिखता रहे और उधर का हो जाए।’ राजनीतिक वनवास में रहकर हमने इस पर ख़ूब चिंतन किया है। तुमको भी ‘फ्री’ में बांट रहा हूं। वर्तमान में वाम दक्षिण की ओर खिसक गए हैं तो दक्षिण मध्य बनने को मचल रहा है। बचा मध्य तो उसके लिए कोई निषेध नहीं रहा। वह वास्तव में बचा ही नहीं। उसकी हर जगह पैठ है। सभी ‘धाराएं’ एकाकार हो गई हैं।

इससे पहले कभी ऐसा राजनीतिक संगम देखने को नहीं मिला।’ वह बोले जा रहे थे, आत्मा हंस रही थी। कहने लगी, ‘सब तुम्हें ही नहीं पता। कुछ मेरे भी अनुभव हैं, पर ये बातें ‘आफ द रिकार्ड’ रहनी चाहिए। आजकल आत्माएं बोलती नहीं, बल्कि बयान देती हैं। फिलवक्त मैं बयानबाजी की होड़ में नहीं पड़ना चाहती। मैंने दलों में इतनी पारदर्शिता कभी नहीं देखी। कल जो लोकतंत्र के माथे का कलंक था, आज वही ‘टीका’ है। शुचिता और लंपटता गले मिल रही हैं। यह नया समय है। पाखंड छोड़कर लोग यथार्थवादी बन चुके हैं।

सिद्धांतों और निष्ठा की गठरी कब तक सिर पर लादे रहते। इसलिए चचा जी सब फेंक कर हल्के हो गए हैं। उन्हें हल्के होने की कतई चिंता नहीं। सामने कुर्सी दिखती है तो ‘विजन’ और ‘वजन’ दोनों ‘चेंज’ हो जाता है। इनका भी हो गया है। और हां, सवाल केवल चचा पर ही क्यों? बदलने के दौर में केवल नेता ही नहीं बदल रहे हैं। जनता भी रोज बदल रही है। अब किसी के पास ‘जनता’ ही नहीं बची। वह खांचों में बंट गई है। इसलिए फोकस इस बात पर ज्यादा है कि किसके पास ‘कितनी मात्र’ में जनता है। लोकतंत्र की जान अब ‘जाति-सम्मेलनों’ में है। यही बात चचा जी को मालूम पड़ गई है।’ इसी बीच लोग आत्मा की जाति पूछने लगे। कोई हमारी जाति पूछता, इससे पहले हम भी वहां से सरक लिए। आत्मा की अभी तक खबर नहीं।

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