हास्य-व्यंग्य: एक मुलाकात तालिबान भाईजान से

पड़ोसी देश में जो कुछ भी ‘घट’ रहा है उसमें अभी तक आम राय नहीं बन पाई है। नापाक पड़ोसी के लिए ‘गुलामी की जंजीरें’ टूटी हैं। दुनिया भर में वायरस फैलाने वाला सबसे अधिक सक्रिय है। सुनते हैं कि उसके फैलने के लिए वहां माकूल माहौल है।

Sanjeev TiwariSun, 12 Sep 2021 02:06 PM (IST)
अफगानिस्तान में तालिबान की नई सरकार (फाइल फोटो)

[ संतोष त्रिवेदी ]: जानकार बताते हैं कि बाजार में लोकतंत्र का यह नया संस्करण ‘तालिबान’ आया है। इसकी खूबी यह है कि इसे जो करना होता है, उसके लिए कानून, संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार जैसी संस्थाओं का मुंह नहीं ताकना पड़ता। पड़ोसी देश में जो कुछ भी ‘घट’ रहा है, उसमें अभी तक आम राय नहीं बन पाई है। नापाक पड़ोसी के लिए ‘गुलामी की जंजीरें’ टूटी हैं। दुनिया भर में वायरस फैलाने वाला सबसे अधिक सक्रिय है। सुनते हैं कि उसके फैलने के लिए वहां माकूल माहौल है।

आतंकवाद और साम्राज्यवाद अब दोनों हिल-मिलकर रहेंगे। सबसे भले तो वे हैं जिनकी इस बारे में अब तक कोई राय ही नहीं बनी है। वे महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों पर हो रहे जुल्म की कहानियों को अभी भी तौल रहे हैं। सही परख होते ही उनके भी उच्च-विचार सामने आएंगे। हां, बुद्धिजीवियों ने हमेशा की तरह निराश नहीं किया है। जहां गैर-बुद्धिजीवी पड़ोसी देश में ‘लोकतंत्र की दस्तक’ को आतंकी कह रहे हैं, वहीं विशुद्ध-बुद्धिजीवियों के लिए वे ‘लड़ाका’ हैं। इनके तईं वे लोकतंत्र को ‘सरिया’ देने वाले आधुनिक क्रांतिकारी हैं। कुछ ने तो अपनी बंद आंखों में कश्मीर के भी सपने पाल लिए हैं। इस कशमकश के बीच असल बात को पकड़ने के इरादे से हमने इस उदारवादी तालिबान भाईजान से संपर्क किया।

तालिबान भाईजान से मुलाकात के लिए किसी बंकर में मिलने की बात की तो उधर से हमें तसल्ली मिली और यह खबर भी कि अब चूंकि वे ‘लोकतंतर’ ले आए हैं, इसलिए बेकार पड़े बंकरों में मिलने की जरूरत नहीं है। अब जो भी होगा, सरे-आम होगा। आखिर तय समय पर हम उसके ठिकाने पर पहुंचे। चारों तरफ संगीनें तनी हुई थीं। जब इसका कारण पूछा तो पता चला कि जब बातचीत संगीन हो तो ऐसा इंतजाम करना पड़ता है। वह इतना उदार था कि इंटरव्यू देते वक्त उसने बंदूक के टिगर को बड़ी सावधानी से संभाल रखा था, क्योंकि गोली चल जाने पर खामखां एक इंटरव्यू हलाक हो जाता। सबसे पहले मेरी आंखों पर पट्टी बांध दी गई। इस तरह का तजुर्बा होने से हमें खास तकलीफ नहीं हुई। लोकतंत्र को इज्जत बख्शने के इरादे से मेरा मुंह खुला छोड़ दिया गया। इसका फौरी फायदा यह हुआ कि तालिबान भाईजान से मेरी गुफ्तगू शुरू हो सकी।

‘इस माहौल में आपको कैसा लग रहा है? आपको खुदा का खौफ भी नहीं रहा अब?’ मैंने अपनी जुबान चला दी। ‘यह निहायत बेहूदा सवाल है। हम जो भी कर रहे हैं, उसी के नाम पर तो कर रहे हैं। उसी की दिखाई राह पर चल भी रहे हैं। हम अपनी कौम के हक के लिए लड़ रहे हैं।’ भाईजान ने बेखौफ होते हुए जवाब दिया। ‘जिन औरतों, बच्चों और बूढ़ों को आप मार रहे हैं, ये तो आपकी कौम के ही लोग हैं। किनके हक के लिए आप बारूद बो रहे हैं? क्या खुदा ने यह सब करने के लिए कहा है?’ मैंने जल्दबाजी में सवाल पूछ लिया। इतना सुनते ही भाईजान हाथ में लहराती बंदूक को मेरी खोपड़ी से सटाने को आतुर हो उठा। मेरी रूह तक सनसना गई। लगा कि जन्नत का रास्ता ज्यादा दूर नहीं है, पर तभी भाईजान ने दिलासा दी, ‘डरिए मत। हम बहुत धीरे से गोली मारते हैं। इससे मरने वाले को जन्नत जाने में सहूलियत होती है। रही बात, अपने कौम के लोगों को मारने की तो ऐसे लोग जो हमारी राह में नहीं चलते, वे काफिर हैं और काफिर को मारना गुनाह नहीं, नेक काम है। हम मजहबी लोग हैं, कुछ गलत नहीं करते।’

‘पर इससे आपका मजहब बदनाम नहीं होता? आपको अल्लाह के नुमाइंदे किसने बना दिया?’ मैंने कलेजा थामकर सवाल उछाला। ‘लगता है आप भी काफिरों की जमात में शामिल हो गए हैं। हमारी लड़ाई ‘दीन’ के लिए है। हमने पढ़ रखा है-‘शूरा’ सो पहचानिए, जो लड़े ‘दीन’ के हेत। हम ‘शूरा’ हैं और सिर्फ ‘दीन’ के लिए लड़ते हैं।’ यह कहकर भाईजान ने इस मुलाकात के खत्म होने का एलान कर दिया। मेरी जान सिर्फ इसलिए बख्श दी गई, ताकि हम उनके ‘दीन’ को दुनिया के सामने ला सकें, वरना एक काफिर की जिंदगी किस काम की?

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