सब कुछ नहीं कर सकती सरकार: सरकार का नियामक तंत्र ईमानदार, पारदर्शी हो तो निजीकरण भी कल्याणकारी हो सकता है

जो काम पहले पिछले दरवाजे से होता था, मौजूदा सरकार ने उसे सार्वजनिक और पारदर्शी बनाया।

पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने नौकरशाही की कमियों पर बहुत तीखे शब्दों में प्रहार किया था। सुप्रीम कोर्ट भी आए दिन नौकरशाही की नकारात्मक प्रवृत्तियों पर प्रहार करता रहता है। देश का कल्याण तभी संभव है जब मंत्रियों और नौकरशाहों दोनों की कार्यशैली में सुधार हो।

Bhupendra SinghThu, 25 Feb 2021 01:52 AM (IST)

[ प्रेमपाल शर्मा ]: पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि बाबुओं यानी नौकरशाहों को अपने काम के रंग-ढंग बदलने होंगे। वे हर क्षेत्र में विशेषज्ञता का दावा नहीं कर सकते। प्रधानमंत्री का सवाल था कि आखिर यह क्यों जरूरी है कि नौकरशाह कारखाना भी चलाए और एयर लाइंस कंपनियां? नि:संदेह न तो सरकार में सब कुछ ठीक होता है और न ही निजी क्षेत्र में सब कुछ खराब। हमें खुले मन से देश के हित में तंत्र को बेहतर बनाने की जरूरत है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देश की फिजा ऐसी बना दी गई है कि सरकार के किसी भी निर्णय के विरोध में झंडे निकल आते हैं। अफसोस की बात यह है कि विरोध उन लोगों की तरफ से भी होता है, जो 1991 के आर्थिक सुधारों की जयगाथा बढ़-चढ़कर बताते रहे हैं। 2016 में सुधारों के 25 वर्ष पूरे होने पर उसकी प्रशंसा में दर्जनों किताबें लिखी गई थीं, विशेषकर संचार, मोबाइल, हवाई जहाज और बैंकिंग आदि क्षेत्र में हुए परिवर्तन को लेकर।

मोदी सरकार का न्यूनतम सरकार अधिकतम शासन का वायदा दीवार पर टंगा रह गया

साल 2014 में मोदी सरकार ने भी वायदा तो ‘न्यूनतम सरकार अधिकतम शासन’ का किया था, लेकिन यह नारा दीवार पर ही टंगा रह गया। अब उन्होंने निजी क्षेत्र का सहयोग लेने की बात कही है। यदि देश का प्रधानमंत्री नौकरशाही की लालफीताशाही, अड़ंगेबाजी, यथास्थितिवादी, फिजूलखर्ची की ओर इशारा करता है तो क्या इसका स्वागत नहीं किया जाना चाहिए? यहां प्रश्न बस इतना सा है कि क्या हमारे पूरे तंत्र और नौकरशाही को पारदर्शी, भ्रष्टाचार मुक्त और सक्षम बनाने की जरूरत नहीं है? यदि है तो कुछ प्रयोग तो करने ही होंगे। दो वर्ष पहले भी संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी, जिसकी प्रतिष्ठा स्वाधीन भारत में असंदिग्ध है, की निगरानी में विधिवत नियमों के अनुसार नौ संयुक्त सचिव के पदों पर लेटरल एंट्री से भर्तियां हुई थीं।

जो काम पहले पिछले दरवाजे से होता था, मौजूदा सरकार ने उसे सार्वजनिक और पारदर्शी बनाया

कृषि, ऊर्जा, वित्त, संचार आदि क्षेत्रों के जो विशेषज्ञ चुने गए, उनकी क्षमता पर आज तक किसी वैचारिक पूर्वाग्र्रह आधारित या दूसरे अन्य किस्म के आरोप नहीं लगे। वैसे भी यदि केंद्र सरकार के 500 से अधिक पदों में से कुछ तकनीकी पद विशेषज्ञों को दे भी दिए गए तो कौन सा आसमान टूट गया और क्या यह पहली बार हुआ है? यह तो चार दशकों से हो रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, मोटेक सिंह आहलूवालिया और नंदन नीलकेणी से लेकर दर्जनों ऐसे नाम हैं जो सरकार में लेटरल एंट्री के रास्ते से ही शामिल हुए और उनकी विशेषज्ञता का पूरे देश को लाभ मिला। नौकरशाही में तुरंत कुछ बड़े सुधारों के लिए प्रशासनिक सुधार आयोग जैसे मंचों से कई अलग-अलग रंगों की सरकारों ने निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता और विशेषज्ञों को सरकार में शामिल करने की बात बार-बार कही है। फर्क इतना है कि जो काम पहले चुपचाप पिछले दरवाजे से होता था, मौजूदा सरकार ने उसे सार्वजनिक और पारदर्शी बनाया है।

बदलते वैश्विक परिदृश्य में निजी क्षेत्र की उद्यमिता और नवोन्मेष का कम योगदान नहीं

बदलते वैश्विक परिदृश्य में निजी क्षेत्र की उद्यमिता और नवोन्मेष का कम योगदान नहीं है। संचार क्रांति के क्षेत्र में फेसबुक, ट्विटर, वॉट्सएप से लेकर अमेजन, फ्लिपकार्ट, स्नैपडील जैसी कंपनियां सरकारी सीमाओं के बाहर ही खड़ी हुईं। इन कंपनियों ने अपनी सफलता भी सिद्ध की है। भारत के संदर्भ में इसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि भ्रष्टाचार को कम करने में जितना योगदान संचार क्रांति ने दिया है, उतना न संविधान ने और न ही समाजवादी नारों ने। जिन राज्यों ने खुले मन से निजी क्षेत्र की क्षमता और ऊर्जा का स्वागत किया, वे सामाजिक और र्आिथक मोर्चे पर उतना ही अच्छा कर रहे हैं, जबकि कुछ राज्य अभी भी सरकारी नौकरियों के भरोसे जनता को लगातार मूर्ख बनाए हुए हैं। हाल में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में उद्योग आदि लगाने के बजाय जिस अंदाज से सरकारी नौकरियों में लाखों की भर्ती की घोषणाएं की जा रही थीं, वे जनता के पैसे पर सरकारी लूट का नमूना ही ज्यादा थीं।

सरकार सब कुछ नहीं कर सकती, नियामक तंत्र पारदर्शी हो तो निजीकरण भी कल्याणकारी हो सकता

लोकतंत्र में कल्याणकारी राज्य की बात बार-बार की जाती है, लेकिन आज के दौर में यह काम केवल सरकार नहीं कर सकती। दुनिया भर में पिछले 200 वर्षों में कई व्यवस्थाओं के तहत प्रयोग हुए हैं, लेकिन 21वीं सदी तक पहुंचते-पहुंचते यह साबित हो चुका है कि अकेली सरकार ही सब कुछ नहीं कर सकती। सरकार का नियामक तंत्र ईमानदार, पारदर्शी और सक्षम हो तो निजीकरण भी कल्याणकारी हो सकता है। यूरोप और अमेरिका जैसे विकसित देश इसका प्रमाण हैं। भारत सरीखे देश इन प्रमाणों की अनदेखी नहीं कर सकते। इसलिए प्राइवेट, लेटरल शब्द सुनते ही बिदकने के बजाय गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। विशेषकर तब जब एक तरफ आप हर सरकारी महकमे को गाली देते हों और दूसरी तरफ उसे सुधार की तरफ लाने का नाम लेते ही हाय-हाय में शामिल हो जाते हों।

केंद्रीय मंत्री गडकरी ने नौकरशाही की कमियों पर बहुत तीखे शब्दों में प्रहार किया

पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने नौकरशाही की कमियों पर बहुत तीखे शब्दों में प्रहार किया था। सुप्रीम कोर्ट भी आए दिन नौकरशाही की नकारात्मक प्रवृत्तियों पर प्रहार करता रहता है। देश का कल्याण तभी संभव है जब मंत्रियों और नौकरशाहों, दोनों की कार्यशैली में सुधार हो। ये दोनों मिलकर ही निजी क्षेत्र के लालच और शोषण पर लगाम लगा सकते हैं। खुली छूट उनको भी नहीं दी जानी चाहिए।

सेवानिवृत्त नौकरशाहों को फिर से शामिल करने की होड़

सरकार में पिछले दिनों सेवानिवृत्त नौकरशाहों को फिर से शामिल करने की होड़ लगी हुई है। जब देश में नौजवान पीढ़ी रोजगार का इंतजार कर रही हो तो सरकार को इसे भी तुरंत रोकने की जरूरत है। इन कदमों से नौकरशाही की सुस्ती भी टूटेगी तथा निजी क्षेत्र और सरकार, दोनों को परस्पर सीखने का मौका भी मिलेगा, लेकिन सरकार को बहुत सजग रहने की जरूरत है, ताकि किसी विचारधारा और क्षेत्र के आधार पर कोई अयोग्य व्यक्ति सरकार में न घुस आए।

( लेखक भारत सरकार में संयुक्त सचिव रहे हैं )

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