राष्ट्रवाद की विचारधारा के अग्रदूत: जम्मू-कश्मीर की समस्या के निस्तारण के लिए पुरजोर आवाज उठाने वाले श्यामाप्रसाद मुखर्जी ही थे

देश की एकता और अखंडता के लिए मुखर्जी का बलिदान तब फलीभूत हुआ जब देश ने अनुच्छेद 370 को निर्मूल होते देखा। वह इस धारणा के प्रबल समर्थक थे कि सांस्कृतिक दृष्टि से हम सब एक हैं। भारत माता के ऐसे महान सपूत के सर्वोच्च बलिदान को नमन करता हूं।

Bhupendra SinghWed, 23 Jun 2021 03:53 AM (IST)
आजादी के बाद के इतिहास में अगर किसी राजनेता का स्मरण आता है तो वह डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी हैं।

[ जगत प्रकाश नड्डा ]: राष्ट्रवाद की विचारधारा, देश की एकता और अखंडता के लिए प्रतिबद्धता तथा राजनीतिक विकल्प के बीजारोपण के लिए आजादी के बाद के इतिहास में अगर किसी एक राजनेता का स्मरण आता है तो वह डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी हैं। बेशक आजादी के बाद डॉ. मुखर्जी बहुत अधिक समय तक जीवित नहीं रहे, लेकिन छोटे कालखंड में ही वैचारिक राजनीति के लिए उन्होंने बड़े अधिष्ठान चिन्ह प्रस्थापित किए।

जम्मू-कश्मीर की समस्या को पहचानने वाले डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे

जम्मू-कश्मीर की समस्या को पहचानने तथा इसके समूल निस्तारण के लिए पुरजोर आवाज उठाने वाले डॉ. मुखर्जी ही थे। बंगाल विभाजन की परिस्थिति के बीच भारत के हितों का पक्षधर बनकर अगर कोई खड़ा हुआ तो वह डॉ. मुखर्जी ही थे। आजादी के बाद सत्ता में आई कांग्र्रेस द्वारा देश पर थोपी जा रही अभारतीय तथा आयातित विचारधाराओं का तार्किक विरोध कर भारत, भारतीय तथा भारतीयता के विचारों के अनुरूप राजनीतिक विकल्प देश को देने वालों में अग्रणी डॉ. मुखर्जी ही थे।

नेहरू-लियाकत पैक्ट में हिंदू हितों की अनदेखी से क्षुब्ध होकर डॉ. मुखर्जी ने मंत्री पद छोड़ दिया था

आजादी के बाद बनी नेहरू सरकार में डॉ. मुखर्जी को उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बनाया गया। वह सरकार का हिस्सा थे, किंतु उसी दौरान कांग्रेस सरकार द्वारा नेहरू-लियाकत पैक्ट में हिंदू हितों की अनदेखी से क्षुब्ध होकर उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। यह इस्तीफा उनकी उच्च वैचारिक चेतना का जीवंत प्रमाण है। बेमेल विचारों के साथ सत्ता में बने रहना उन्हें मंजूर नहीं था। इसलिए इस्तीफा देकर उन्होंने देश में एक नए राजनीतिक विकल्प के लिए चर्चा शुरू की। विदित है कि देश की स्वतंत्रता के लिए भिन्न-भिन्न विचारों के लोग कांग्रेस की छतरी के नीचे आए थे, किंतु आजादी के बाद देश में यह सुगबुगाहट शुरू हुई कि कांग्रेस की विचारधारा का विकल्प क्या हो सकता है? एक ऐसी विचारधारा की तलाश देश कर रहा था, जिसमें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद देश की एकता-अखंडता के संकल्प के साथ तुष्टीकरण के विरोध की नीति निहित हो। इस बहस के अगुआ के रूप में डॉ. मुखर्जी आगे आए। उनके प्रयासों से 21 अक्टूबर 1951 को जनसंघ की स्थापना हुई। एक ऐसे राजनीतिक दल की स्थापना, जिसके विचारों में राष्ट्रवाद की खुशबू और भारतीयता की सुगंध थी। दशकों से हम उसी विचार यात्रा के कई पड़ाव को पार करते हुए, अनेक संघर्ष करते हुए यहां तक पहुंचे हैं।

पहले आम चुनाव में जनसंघ ने 3 सीटें जीतीं, कई दलों ने मिलकर मुखर्जी को विपक्ष का नेता चुना

1951-52 में हुए पहले आम चुनाव में जनसंघ तीन सीटों पर चुनाव जीतने में सफल रहा। डॉ. मुखर्जी कोलकाता से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। उनके विचारों की साफगोई, नीतियों में दूरदर्शिता को देखते हुए विपक्ष के कई दलों ने मिलकर उन्हें लोकसभा में विपक्ष का नेता चुना। नेता-प्रतिपक्ष के रूप में डॉ. मुखर्जी लगातार देश की समस्याओं को लेकर सवाल करते रहे और बहुत कम समय में ही वह विपक्ष की मुखर आवाज बन गए। संसद में उन्होंने सदैव राष्ट्रीय एकता की स्थापना को ही अपना प्रथम लक्ष्य रखा। संसद में दिए अपने भाषण में उन्होंने पुरजोर शब्दों में कहा था कि राष्ट्रीय एकता के धरातल पर ही सुनहरे भविष्य की नींव रखी जा सकती है।

मुखर्जी अनुच्छेद 370, परमिट सिस्टम को देश की एकता और अखंडता में बाधक मानते थे

जम्मू-कश्मीर में अनु. 370, परमिट सिस्टम को वह देश की एकता और अखंडता में बाधक मानते थे। इसके लिए संसद में उन्होंने कई बार आवाज उठाई। 26 जून 1952 को लोकसभा में जम्मू-कश्मीर पर चर्चा में उन्होंने कहा था कि एक लोकतांत्रिक संघीय राज्य में एक घटक इकाई के नागरिकों के मौलिक अधिकार किसी अन्य इकाई के नागरिकों से अलग कैसे हो सकते हैं? वह देश की एकता और अखंडता के प्रति कटिबद्ध थे। परमिट सिस्टम का विरोध करते हुए उन्होंने जम्मू-कश्मीर में बिना परमिट आने का निर्णय किया। अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि ‘या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।’ जम्मू में प्रवेश के साथ ही उन्हें हिरासत में ले लिया गया, जिसका देशभर में विरोध हुआ। गिरफ्तारी के 40 दिन बाद 23 जून 1953 को श्रीनगर के राजकीय अस्पताल में रहस्यमयी तरीके से भारत माता के महान पुत्र डॉ. मुखर्जी की मृत्यु हो गई। उनके बलिदान पर कई सवाल खड़े हुए, किंतु तत्कालीन नेहरू सरकार ने उन्हें अनसुना कर दिया था। डॉ. मुखर्जी की माता योगमाया देवी ने नेहरू को पत्र लिखकर जांच की मांग की। इसे भी सरकार ने अनसुना कर दिया। उनकी गिरफ्तारी, उनकी नजरबंदी और उनकी मृत्यु को लेकर कई ऐसे तथ्य हैं, जो आज भी अनसुलझे हैं।

मुखर्जी का कहना था- एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे

डॉ. मुखर्जी का कहना था, ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे।’ यह नारा जनसंघ और आगे चलकर भाजपा के हर कार्यकर्ता के लिए संकल्प वाक्य बना। दशकों तक यह प्रश्न लोगों के जेहन में रहा कि आखिर कब डॉ. मुखर्जी का एक देश एक विधान, एक प्रधान, एक निशान का स्वप्न पूर्ण रूप से साकार होगा। यह एक वैचारिक लड़ाई थी। इसमें एक ओर कांग्रेस सहित तुष्टीकरण की राजनीति करने वाले कई दल थे तो दूसरी ओर अपने विचारों तथा संकल्पों के साथ अडिग भाजपा थी, जो शुरू से अनु. 370 को हटाने के लिए संकल्पबद्ध रही। जनसंघ का समय हो अथवा भाजपा का गठन, हमारी विचारधारा और नीतियों में तनिक भी परिवर्तन नहीं आया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के कुशल नेतृत्व एवं दृढ़ इच्छाशक्ति और गृह मंत्री अमित शाह की रणनीति के कारण अगस्त 2019 में अनु.370 को हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया। एक निशान, एक विधान, एक प्रधान का जो सपना डॉ. मुखर्जी ने देखा था, उसे प्रधानमंत्री मोदी ने साकार किया।

मुखर्जी का बलिदान तब फलीभूत हुआ, जब देश ने अनुच्छेद 370 को निर्मूल होते देखा

देश की एकता और अखंडता के लिए डॉ. मुखर्जी का सर्वोच्च बलिदान तब फलीभूत हुआ, जब देश ने अनुच्छेद 370 को निर्मूल होते देखा। विचारधारा के प्रति निष्ठावान और अडिग एक ऐसे दल की स्थापना डॉ. मुखर्जी ने की थी, जो अपने विचारों तथा संकल्पों के प्रति दशकों तक एकनिष्ठ और अडिग रहा है। वे देश के लिए बलिदान हो गए और भारत ने एक ऐसा व्यक्तित्व खो दिया जो देश की राजनीति को एक नई दिशा दे सकते थे। डॉ. मुखर्जी इस धारणा के प्रबल समर्थक थे कि सांस्कृतिक दृष्टि से हम सब एक हैं। भारत माता के ऐसे महान सपूत के सर्वोच्च बलिदान को नमन करता हूं।

( लेखक भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं )

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