एक अव्यावहारिक निर्णय का अंत: फेल न करने की नीति का खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ा

[ जगमोहन सिंह राजपूत ]: शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई एक्ट) पुन: चर्चा में है, क्योंकि बीते दिनों आठवीं तक छात्रों को फेल न करने की नीति (नो डिटेंशन पॉलिसी) संबंधी इसके प्रावधान को समाप्त कर दिया गया। 2010 से यह देश भर के निजी और सरकारी, दोनों तरह के स्कूलों में लागू थी। उस समय जब यह कहा गया कि अब कक्षा आठ तक कोई परीक्षा नहीं होगी और सभी बच्चे प्रतिवर्ष अगली कक्षा में आगे चलते जाएंगे तब भारत में शिक्षा व्यवस्था की जमीनी स्थिति से परिचित सभी लोगों को यह स्पष्ट हो गया था कि यह अव्यावहारिक निर्णय है। देश में इसे लागू करने लायक परिस्थितियां नहीं हैं। इससे सबसे अधिक हानि समाज के उस वर्ग के बच्चों को ही होगी जिसके लिए शिक्षा प्राप्त करना ही जीवन में आगे बढ़ पाने का एकमात्र तरीका है।

पिछले सात-आठ वर्षों के अनुभव के आधार पर इसकी पुष्टि हो गई। नो डिटेंशन पॉलिसी लागू होने से अध्यापकों का रहा-बचा उत्तरदायित्व बोध और भी शिथिल हो गया। बच्चे अगली कक्षा में तो जाते रहे, लेकिन सीख कुछ नहीं पाए। परिणामस्वरूप कक्षा आठ-नौ में असफल होकर उनमें से अधिकांश ने स्कूल छोड़ दिया। माता-पिता ठगे से रह गए। इसके बाद इस नीति में परिवर्तन के लिए हर तरफ से विरोध के स्वर उठने लगे। लिहाजा अनेक राज्यों ने परीक्षा न लेने की नीति पर पुनर्विचार के लिए केंद्र सरकार से इस अधिनियम में संशोधन के लिए अनुरोध किया। तीन जनवरी, 2019 को राज्यसभा ने भी प्रस्तावित परिवर्तनों को मंजूरी दे दी।

यह राज्य सरकारों के ऊपर छोड़ा गया है कि वे चाहें तो कक्षा पांच और आठ के बाद परीक्षा ले सकती हैं, लेकिन आरटीई एक्ट में परीक्षा न कराने का बंधन हट गया है। अब यदि कोई बच्चा परीक्षा में असफल होता है तो उसके लिए अलग से पढ़ाने के विशेष प्रबंध कर अगला सत्र प्रारंभ होने के पहले उसकी पुन: परीक्षा ली जाएगी। उसे एक अवसर और भी दिया जा सकता है। मेरे विचार से यदि विद्यार्थी इसके बाद भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाता तो उसे अगली कक्षा में भेजना अन्याय होगा, क्योंकि वह आगे नहीं बढ़ पाएगा और फिर उसके सामने स्कूल छोड़ने के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं बचेगा। यह शिक्षा सुधारों का दुर्भाग्य है कि इससे जुड़े महत्वपूर्ण पक्षों पर भी दलगत राजनीति को आगे रखकर तर्क दिए जाते हैं।

आरटीई एक्ट में परिवर्तन को भी सियासी नजरों से देखा जाने लगा है। अब राज्य सरकारें भी संभवत: उसी आधार पर परीक्षा लेने या न लेने का निर्णय करेंगी। जहां परीक्षा होगी और जहां नहीं होगी-इस अंतर का बच्चों की शैक्षिक उपलब्धियों से किस प्रकार का संबंध है, इसका सर्वेक्षण और अध्ययन तीन-चार वर्षों के बाद किया जाना चाहिए और आगे का निर्णय उसी आधार पर लेना उचित होगा।

यहां यह समझाना आवश्यक है कि जिस ढंग से हमारे देश में बच्चों की परीक्षा ली जाती है उसे आदर्श विधा तो कतई नहीं कहा जा सकता है। प्रारंभिक कक्षाओं में बच्चे की शैक्षिक उपलब्धिओं का सबसे सही आकलन तो उसे पढ़ाने वाला अध्यापक ही कर सकता है। शिक्षा की दृष्टि से अग्रणी देशों में ऐसा ही होता है, लेकिन यह तभी संभव है जब अध्यापक सही ढंग से प्रशिक्षित हो, उसे अपने कार्य में रुचि हो, उसके साथ उतने ही बच्चे हों जिन पर वह व्यक्तिगत रूप से ध्यान और समय दे सके। उस पर कोई अनावश्यक बोझ न हो, जैसा कि लाखों अस्थाई अध्यापकों पर इस समय इस देश भर में है।

अच्छे से अच्छा अध्यापक भी मूल्यांकन का यह कार्य सुचारू रूप से नहीं कर पाएगा यदि उसे बार-बार चुनावों या पशु-गणना जैसे गैर-शैक्षिक कार्यों में उसकी अनिच्छा को दरकिनार कर लगा दिया जाए। सरकारी प्रशासनिक अधिकारी अध्यापकों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। शिक्षा के क्षेत्र में जितने भी देश आगे माने जाते हैं उनमें से हर एक में अध्यापक का सम्मान सर्वाधिक है। उसका वेतन उसे आर्थिक स्वतंत्रता देता है। परिवार, समाज और सरकार में उसे सम्मानजनक स्थान मिला होता है। उसे ट्यूशन या कोचिंग संस्थानों में जाकर अतिरिक्त धन कमाने की आवश्यकता नहीं होती है।

जो स्थितियां देश में हैं, उन्हें जमीनी स्तर पर बिना जाने समझे या उनमें सुधार के प्रयास किए बगैर जब मंत्री और प्रशासनिक अधिकारी फिनलैंड जैसे देशों का दौरा करते हैं तब सारी स्थिति की विडंबना समझ में आ जाती है। फिनलैंड जाकर वहां की व्यवस्था देखकर आप क्या उसमें से अंशमात्र भी लागू कर पाएंगे? हमारी शिक्षा की मूलभूत कमियों को दूर करने की आवश्यकता की ओर तो 1950 के बाद से लगातार हर स्तर पर ध्यान दिलाया जाता रहा है, लेकिन उन्हें दूर करा पाने में केवल आंशिक सफलता ही मिल सकी है।

सरकारी स्कूलों की साख इस समय सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है। सत्तर साल के बाद अपनी शिक्षा व्यवस्था के लिए अब विदेशी शासकों को जिम्मेदार ठहराना अपनी हंसी उड़ाना ही होगा। कोठारी आयोग (1964-66) ने परीक्षा पद्धति में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया था, जबकि आज भी लगभग वैसी ही परीक्षा पद्धति कक्षा दस तथा बारह की बोर्ड परीक्षाओं में बनी हुई है। बच्चों की नैसर्गिक प्रतिभा के विकास या उनकी जिज्ञासा तथा सृजनात्मकता को पंख लगाने के बजाय यह पद्धति उसे ही कुंद कर देती है, क्योंकि बच्चे और अध्यापक पाठ्यक्रम पूरा करने तथा बोर्ड परीक्षा में अधिकाधिक अंक लाने मात्र को ही शिक्षा का संपूर्ण लक्ष्य मानने को बाध्य हैैं।

प्राथमिक (कक्षा पांच तक) और प्रारंभिक शिक्षा (कक्षा आठ तक) की गुणवत्ता आगे की शिक्षा को प्रभावित करती है। हाल के एक सर्वेक्षण से यह इंगित हुआ कि प्राथमिक पाठशालाओं में बच्चों में सीखने का स्तर नीचे ही जा रहा है। सभी उन कारणों और तथ्यों से परिचित हैं जो नकल माफिया को विस्तार देते हैं, कोचिंग संस्थाओं को बढ़ावा देते हैं और प्रतियोगिता परीक्षाओं में व्यापमं जैसे घोटाले कराते हैं। कक्षा पांच और आठ में परीक्षा हो या नहीं हो, इस पर बहस हो सकती है, मगर हमें उन बड़े अवरोधों को भूलना नहीं चाहिए जिनके कारण करोड़ों बच्चे अपेक्षित स्तर की शिक्षा स्कूलों में न पाकर आगे के जीवन में निराशा ही पाते हैं। युवा भारत की चर्चा बहुधा होती है, युवाओं के लिए देश-विदेश में स्वर्णिम अवसर उपलब्ध होने की बात भी कही जाती है, मगर प्रारंभिक शिक्षा को उचित स्वरूप देने के लिए किए गए प्रयत्न अभी भी कमजोर बने हुए हैं। यहां पर संपूर्णता में सुधार आवश्यक हैं।

( लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैैं )

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