डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर परियोजना परिवहन तंत्र से लेकर रोजगार सृजन और पर्यावरण सुरक्षा में होगी मददगार

ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और वेस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर नौ राज्यों से होकर गुजरेंगे। रेलवे से मिलेगी अर्थव्यवस्था को गति।

कोरोना संकट के बीच एक नए दशक में प्रवेश करते हुए देश की अर्थव्यवस्था रेल पटरियों से न सिर्फ रफ्तार हासिल करेगी बल्कि इससे उसके आकार को पांच लाख करोड़ डॉलर के स्र्विणम स्तर पर ले जाने में भी मदद मिलेगी।

Publish Date:Mon, 04 Jan 2021 01:23 AM (IST) Author: Bhupendra Singh

[ अरविंद मिश्रा ]: भारतीय रेलवे में इन दिनों सुधारों की बयार चल रही है। इसके तहत कई परियोजनाओं की संकल्पना को साकार रूप दिया जा रहा है। इसी कड़ी में माल गाड़ियों के लिए अलग रेलवे ट्रैक विकसित करने वाली बहुप्रतीक्षित डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर परियोजना भी आखिरकार परिचालन के स्तर आ गई है। हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस परियोजना के एक हिस्से (ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर) पर बने न्यू खुर्जा-न्यू भाऊपुर रेलवे ट्रैक का उद्घाटन किया। यह 351 किमी लंबा है। वर्तमान में डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर देश के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में बनाए जा रहे हैं। इसमें ईस्टर्न कॉरिडोर की लंबाई 1856 किमी है जो लुधियाना से बंगाल के डानकुनी तक जाएगा। वेस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर 1504 किमी लंबा होगा जो दादरी, यूपी से जवाहरलाल नेहरू पोर्ट, मुंबई तक फैला होगा।

ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और वेस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर नौ राज्यों से होकर गुजरेंगे

दोनों फ्रेट कॉरिडोर डबल ट्रैक के होंगे। यानी आने-जाने वाली मालगाड़ियों के लिए अलग-अलग पटरियां होंगी। ये दोनों फ्रेट कॉरिडोर नौ राज्यों तथा 61 जिलों से होकर गुजरेंगे। डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और उस पर दौड़ने वाली मालगाड़ियों की औसत रफ्तार लगभग 100 किमी प्रति घंटा होगी जो अभी चल रहीं मालगाड़ियों की औसत रफ्तार से लगभग दोगुनी होगी। इससे न केवल समय की बचत होगी, बल्कि एक साथ ज्यादा माल एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया जा सकेगा। इसका सबसे बड़ा फायदा सब्जी, फल और दूध जैसी जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं को होगा। ये पूरी तरह से अति आधुनिक सिग्नल, ट्रैक, इंजन और कम्युनिकेशन सुविधाओं से भी जुड़ी होंगी। जाहिर है यह पूरी परियोजना देश के परिवहन तंत्र से लेकर वस्तुओं के आयात-निर्यात, रोजगार सृजन और पर्यावरण सुरक्षा सभी आयामों को गति देगी।

डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर बनने से मालगाड़ियों से ढुलाई बढ़ेगी

दरअसल अंग्रेजों के जमाने में जब से भारत में रेल शुरू हुई थी तभी से माल ढुलाई रेलवे की आमदनी का बड़ा जरिया था, लेकिन पिछले 30-40 वर्षों में रेलवे का विकास लगभग ठप हो गया है। ऐसे में माल ढुलाई में रेलवे की हिस्सेदारी पर सबसे बड़ी गाज गिरी है। यह धीरे-धीरे 70 फीसद से घटकर 30 से 35 फीसद के स्तर पर आ गई है। अब डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर बनने से मालगाड़ियों से ढुलाई फिर बढ़ेगी और उम्मीद की जा रही है कि यह 50 फीसद तक भी पहुंच सकती है। अभी रेलवे की सभी गाड़ियां चाहे वे मालगाड़ियां हों या आम सवारी गाड़ियां हों या मेल एक्सप्रेस और शताब्दी-राजधानी सभी एक ही ट्रैक पर दौड़ती हैं।

फ्रेट कॉरिडोर के चालू होने से भारतीय रेल की 40 प्रतिशत लाइनें मालगाड़ियों से मुक्त हो जाएंगी

एक अनुमान के मुताबिक भारतीय रेलवे के ट्रैक अपनी क्षमता से करीब डेढ़ गुना ज्यादा काम कर रहे हैं। इससे ट्रेनों की औसत रफ्तार भी कम हो गई है और आने-जाने में लगने वाला समय भी बढ़ गया है। ट्रेनों की लेटलतीफी के पीछे भी यह एक बड़ा कारण है। डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के ईस्टर्न और वेस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर के पूरी तरह चालू हो जाने के बाद अभी भारतीय रेल के मौजूदा नेटवर्क से 40 प्रतिशत लाइनें मालगाड़ियों से मुक्त हो जाएंगी। दूसरे शब्दों में कहें तो इससे सवारी गाड़ियों के लिए पटरियों पर जगह खाली हो जाएगी। जाहिर है इसका फायदा अंतत: यात्रियों को ही होगा। अभी देश में कुल माल ढुलाई में से 57 प्रतिशत की ढुलाई सड़क मार्ग से की जाती है, जबकि चीन में 22 प्रतिशत और अमेरिका में 32 प्रतिशत माल की ढुलाई सड़क मार्ग से की जाती है। इसके विपरीत भारतीय रेल देश में कुल माल ढुलाई यातायात में से केवल 36 प्रतिशत की ही ढुलाई करती है, जबकि अमेरिका में 48 प्रतिशत और चीन में 47 प्रतिशत ढुलाई रेलवे द्वारा की जाती है।

डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर वायु प्रदूषण रोकने में बड़ा योगदान देगी

इसके अतिरिक्त डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर वायु प्रदूषण रोकने और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की दिशा में भी बड़ा योगदान देगा। जलवायु परिवर्तन को लेकर पेरिस में हुए पर्यावरण समझौते के मुताबिक भारत ने अगले 15 वर्षों में कार्बन उत्सर्जन में कटौती का जो वादा किया है उसमें एक बड़ा हिस्सा सड़क यातायात से ट्रकों को कम करने से आ सकता है। और यह तभी हो सकता है जब ट्रक ट्रांसपोर्ट का कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध हो। यहीं पर डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर सड़कों से ट्रकों का बोझ हटाने में मददगार साबित होगा। माना जा रहा है कि दोनों निर्माणाधीन फ्रेट कॉरिडोर पर हर 10 मिनट में एक मालगाड़ी दौड़ेगी। मालगाड़ियों की लंबाई भी 700 मीटर से दोगुनी होकर 1.5 किमी हो जाएगी। हर मालगाड़ी में लगभग 300 ट्रकों के बराबर माल ढोया जा सकेगा। साफ है इससे सड़कों का बोझ भी कम होगा। अगर हर 10 मिनट में डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर्स पर एक मालगाड़ी के हिसाब से जोड़ें तो दिन में 140 ट्रेनें चलेंगी। और अगर एक मालगाड़ी में 300 ट्रकों का माल ढोया जाए तो 43,200 ट्रकों का माल रोजाना इन फ्रेट कॉरिडोर से ढोया जा सकेगा। नई मालगाड़ियों को इस तरह से तैयार किया जा रहा है कि इन पर माल रखने का प्लेटफॉर्म आज की मालगाड़ियों से कुछ ज्यादा चौड़ा हो। साथ ही जमीन से इनकी ऊंचाई भी घटाई जा रही है। इससे एक के ऊपर एक वैगन या कंटेनर रखे जा सकेंगे।

फ्रेट कॉरिडोर के स्टेशनों के आसपास इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण होगा

फ्रेट कॉरिडोर के स्टेशनों के आसपास सरकारी और निजी क्षेत्र के वेयर हाउस निर्माण में तेजी आने से इंफ्रास्ट्रक्चर का भी निर्माण होगा। माल गोदामों की संख्या बढ़ने से अनाज और सब्जियों की बर्बादी पर लगाम लगेगी। जिन क्षेत्रों से डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर गुजरेगा, वहां नई दुकानें, होटल, बाजार विकसित होंगे। माल की आवाजाही के लिए ट्रैक्टर ट्रॉलियों की संख्या बढ़ेगी। इसके संकेत अभी से आगरा-टूंडला लाइन पर खरेजी के पास डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर प्रोजेक्ट आने से मिलने लगे हैं। वहां बरसों से बंजर पड़ी जमीनें महंगी हो गई हैं। अच्छा मुआवजा मिलने से नई बस्तियां और बाजार विकसित हो रहे हैं। जाहिर है कोरोना संकट के बीच एक नए दशक में प्रवेश करते हुए देश की अर्थव्यवस्था रेल पटरियों से न सिर्फ रफ्तार हासिल करेगी, बल्कि इससे उसके आकार को पांच लाख करोड़ डॉलर के स्र्विणम स्तर पर ले जाने में भी मदद मिलेगी।

( लेखक स्वदेशी आंदोलन से जुड़े हैं )

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