Coronavirus Outbreak: सेहत के प्रति समाज के नजरिये को बदलने का समय

आम व्यक्ति को केंद्र में रखकर खड़ी की गई सामाजिक संरचना पर पुनर्विचार करने का भी समय है।

कोरोना संकट की विकरालता बढ़ने में आर्थिक व राजनीतिक तंत्र की संवेदनहीनता और रोगियों व उनके परिवार के प्रति समाज के नजरिये ने नकारात्मक भूमिका निभाई है। इसने हमारे संवाद संरचना तंत्र की गुणात्मक और कार्यात्मक अपर्याप्तता और अक्षमता को भी उजागर किया है।

Sanjay PokhriyalFri, 07 May 2021 11:42 AM (IST)

बिनय ठाकुर। कोरोना ने इस समय केवल भारत को ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को झकझोर कर रखा हुआ है। इसकी चोट सीधे सांसों पर पड़ रही है। इसे सहेजने के क्रम में व्यक्ति जिस तरह से अपनी गतिविधियों को समेट रहा है, लगता है जैसे कोरोना केवल अर्थव्यवस्था ही नहीं, जीवन ही लीलने को मुंह बाए है। इसने हमारे सामने ढेर सारे सवाल खड़े किए हैं जो सिर्फ स्वास्थ्य से संबंधित नहीं हैं। इसने हमारी पूरी जीवन शैली और उसके दर्शन की अपर्याप्तता को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

इस बुरे वक्त में एक बात जो सबसे शिद्दत के साथ महसूस की जा रही है वह यह कि आड़े वक्त में सरकार और बाजार दोनों की तुलना में परिवार व समाज भरोसे के हैं। बाजार को सरकार बनने का मौका देना और भी घातक दिख रहा है। बाजार निर्मम और निराकार है, उसे आपदा की उतनी ही परवाह है जितना उसके हित को प्रभावित करती हो। अगर इस कठिन घड़ी में सबसे बड़ा रक्षा कवच बनकर सामने आया है तो वह है परिवार और सबको अपने परिवार की तरह मानने वाला कुटुंब भाव।

परिवार ही एक ऐसी संस्था है जहां सदस्यों को किसी सेवा को देने के लिए कोई फैसला लेते समय पात्रता, अपात्रता और नफा-नुकसान के बारे में नहीं सोचा जाता है। केवल परिवार के सदस्य होने मात्र से ही आप उच्चतम संरक्षण के अधिकारी होते हैं। स्वास्थ्य को लेकर भी हमें अपनी सोच को बदलने की जरूरत है। रोग क्या है? क्या यह महज देह की सीमा में कैद है या इसका वास्ता देह की सीमा से बाहर भी है। टेलकॉट पारसन जैसे समाजशास्त्रियों ने पहले ही इस पर विचार कर ‘सोशियोलॉजी ऑफ डिजीज’ की नींव रखी जो आगे चलकर ‘सोशियोलॉजी ऑफ इलनेस एंड हेल्थ’ के रूप में विकसित हुई। कोरोना के इस संकट ने पारसन की बात को पुष्ट करते हुए रोग के सामाजिक-सांस्कृतिक आयाम को गहराई से रेखांकित किया है।

इसमें अहम बात यह है कि केवल अपने स्वास्थ्य को सुरक्षित रखकर आप स्वस्थ नहीं रह सकते हैं। रोग के असर का वितरण सामाजिक ताने-बाने व उसकी कार्यात्मक रिश्तेदारी के आधार होता है। ‘टोटल हेल्थ’ के नए दर्शन के मुताबिक आपके स्वस्थ रहने के लिए यह जरूरी है कि आपके आसपास रहने वाले लोगों के साथ ही आसपास के पशु-पक्षी और पेड़-पौधे भी स्वस्थ हों। आपको अपने परिवेश के हर जीवन के अधिकार व उनके स्वस्थ रहने के अधिकार का सम्मान करना होगा। अपनी सहूलियत के हिसाब से प्रकृति से शिकायत का भाव छोड़कर उसके लय के हिसाब से स्वयं को ढालना सीखना होगा। हमारे यहां तो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना रही है। यह भाव कितना जरूरी है इसे अब समझा जा रहा है। रोग को लेकर दो तरह के दर्शन हैं। पहले को ‘बायोस्टेटिकल थ्योरी ऑफ हेल्थ’ कहा जाता है तो दूसरे को ‘होलिस्टिक थ्योरी ऑफ हेल्थ’ कहा जाता है।

पहले के अनुसार एक व्यक्ति को स्वस्थ तब माना जाता है जब उसके सभी प्राकृतिक अंग सामान्य ढंग से कार्य कर रहे हों। यह सामान्य सांख्यिकीय औसत होता है। इसके अनुसार रोग की अनुपस्थिति ही स्वस्थ होने को सुनिश्चित करता है, जबकि ‘होलिस्टिक थ्योरी ऑफ हेल्थ’ के अनुसार किसी व्यक्ति को स्वस्थ तभी माना जाता है जब वह अपने प्राणाधार जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हो। आज सबसे ज्यादा जिस बात को लेकर चर्चा है वह है इम्युनिटी और अक्सर लोग इसके महज जैविक पक्ष पर ही बात करते हैं, जबकि इसके तीनों आयाम जैविक व्यवहारात्मक, सामाजिक संस्थागत संरचना व उनका विन्यास महत्वपूर्ण हैं। कोरोना के समय व्यवहारात्मक व सामाजिक संस्थागत संरचनाओं का महत्व खास तौर पर देखने को आ रहा है।

कोरोना से बचने के लिए क्या करना चाहिए इसको लेकर जितने मुंह उतनी बातें हैं। कोरोना ने हमारे चरित्र के खोखलेपन को भी सामने रखा है। यहां हर किसी की फिक्र अपने को बचाने की है और अक्सर रोगी व प्रभावित परिवार को हेय दृष्टि से देखा जा रहा है। संयुक्त परिवार को गैर-जरूरी मान लिया गया है। उसके साथ ही सामाजिक सुरक्षा के दायरे से परिवार जिस तरह से पीछे हटा उस खाली जगह की भरपाई सरकार और बाजार ठीक से कर नहीं पा रहे हैं। बाजार व सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली सामाजिक सुरक्षा पात्रता व गुणवत्ता दोनों के मामले में परिवार-समाज द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली सुरक्षा निम्न कोटि की है। बाजार जिस तरह से हमारी रसोई को कब्जे में लेने की जुगाड़ में है उसे भी कोरोना ने सामने रखा है। खाना बनाने को गैर जरूरी कौशल मानने की सोच ने कई परिवारों में इस समय भुखमरी जैसे हालात पैदा कर किए। खाने बनाने की जिम्मेदारी जिनकी है वे बीमार हैं और बाहर से कोई मदद नहीं आ सकती तो लोग असहाय हो जा रहे हैं। गांव-समाज में यह परंपरा थी कि कई मौके पर जब आपके घर में चूल्हा नहीं जलना है तो आपके रसोई को चलाने की जिम्मेदारी रिश्तेदारों व पड़ोसियों की होती थी। शहरों में लोग दरवाजा बंदकर अपनी दुनिया में कैद रहना पसंद करते हैं।

बाजार व सरकार की सुरक्षा में सारा जोर भौतिक संसाधन पर रहता है, उसमें भावना का पक्ष काफी कमजोर रहता है। वहीं, इंटरनेट मीडिया पर बहते ज्ञान की धारा में डूबते उतराते व्यक्ति की सांस फूलने लगती है। शहरों के मुकाबले गांव में बेहतर स्थिति ने रेखांकित किया है कि हमें शहर निर्माण योजना पर नए सिरे से सोचना होगा। सुखी व खुशहाल जिंदगी के लिए सिर्फ सुविधा ही नहीं, बल्कि स्वच्छ हवा, पानी और आहार के साथ ही स्पेस भी महत्वपूर्ण है। शहरों की योजना बनाते समय उसे उसकी जरूरत के हिसाब से उसकी आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करना बेहद अहम है।

[स्वतंत्र पत्रकार]

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