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फिर से आर्थिकी पर असर, विकास की धुरी पर घूमने वाला भारत आर्थिक दुष्चक्र में फंसकर उलझ सकता है

यदि कोरोना की लहर आती रही तो इसमें कोई शक नहीं कि देश में गरीबों की तादाद और बढ़ेगी

Coronavirus Impact On Economy यदि कोरोना की लहर पर लहर आती रही और इसका निस्तारण समय रहते न हुआ तो इसमें कोई शक नहीं कि देश में गरीबों की तादाद और बढ़ेगी। भुखमरी और कुपोषण का दायरा बढ़ेगा।

Sanjay PokhriyalWed, 12 May 2021 02:10 PM (IST)

डॉ. सुशील कुमार सिंह। Coronavirus Impact On Economy अभी देश में कोरोना की दूसरी लहर विकराल रूप लिए हुए है। यह जनता की घोर लापरवाही का दुष्परिणाम है अथवा फिर सरकार की नीतियों में कमी। फिलहाल कोई इसका जवाब देना नहीं चाह रहा है। बहरहाल सरकारें इससे निपटने के लिए अपने स्तर पर कहीं नाइट कर्फ्यू तो कहीं आंशिक तो कहीं पूर्ण लॉकडाउन तक लगा रही हैं। साथ ही चिकित्सा संबंधी सुविधा बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है, लेकिन हालात इस कदर बेकाबू हैं कि सारी कोशिशें मानो बौनी होती जा रही हैं। दुनिया के देशों ने भी दिल खोलकर भारत को मदद पहुंचाई है, मगर देश अभी राहत नहीं महसूस कर रहा है। कोरोना वायरस का साइड इफेक्ट आम जनमानस के दैनिक कामकाज पर भी आसानी से देखा जा सकता है। आंकड़े इशारा कर रहे हैं कि कोरोना ने भारत में करोड़ों लोगों को गरीबी में धकेल दिया है और मध्यम वर्ग की कमर टूट रही है। इसकी दूसरी लहर ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को भी प्रभावित किया है।

गौरतलब है कि कोरोना को रोकने के लिए विभिन्न राज्यों में लगाए गए लॉकडाउन से लाखों श्रमिकों को अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ा है। दैनिक खर्च चलाने के लिए कइयों को कर्ज लेने के लिए मजबूर होना पड़ा है। अजीम प्रेमजी यूनिर्विसटी की एक रिपोर्ट पर नजर डालें तो पता चलता है कि कोरोना वायरस की सबसे बड़ी मार गरीबों पर पड़ी है। मार्च 2020 से अक्टूबर 2020 के बीच देश में 23 करोड़ गरीब मजदूरों की कमाई कम हो गई। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट है कि उस दौरान शहरी इलाकों में गरीबी 20 फीसद, जबकि ग्रामीण इलाकों में 15 प्रतिशत तक बढ़ी। जाहिर है इस दूसरी लहर के बाद देश में गरीबी की स्थिति और भयावह होगी। ध्यान रहे कि 41 करोड़ से अधिक श्रमिक देश में काम करते हैं जिन पर कोरोना का बढ़ता संक्रमण इन दिनों कहर बनकर टूटा है।

अमेरिकी रिसर्च एजेंसी प्यू रिसर्च सेंटर के आंकड़ों पर विश्वास करें तो कोरोना महामारी के चलते भारत के मध्यम वर्ग भी खतरे में है। गौरतलब है कि भारत में मध्यम वर्ग का आकार पिछले कुछ वर्षों में बढ़ा था, मगर कोरोना ने कई ऐसे परिवारों को फिर बेपटरी कर दिया है। कोरोना से पहले देश में मध्यम वर्ग की श्रेणी में करीब 10 करोड़ लोग थे अब यह संख्या घटकर सात करोड़ से भी कम हो गई है। वास्तव में जिनकी प्रतिदिन आय 50 डॉलर या उससे अधिक है वे उच्च श्रेणी में आते हैं, जबकि प्रतिदिन 10 डॉलर से 50 डॉलर तक की कमाई करने वाला मध्यम वर्ग में आता है। खास यह भी है कि चीन की तुलना में भारत के मध्यम वर्ग की संख्या में अधिक कमी और गरीबी में भी अधिक वृद्धि होने की संभावना देखी जा रही है। साल 2011 से 2019 के बीच करीब छह करोड़ लोग मध्यम वर्ग की श्रेणी में शामिल हुए थे, मगर कोरोना ने एक दशक की इस वृद्धि को एक साल में ही घटा दिया। कोरोना से बिगड़े र्आिथक हालात को देखते हुए मोदी सरकार द्वारा मई 2020 में 20 लाख करोड़ रुपये का र्आिथक पैकेज भी आवंटित किया गया, मगर भीषण र्आिथक तबाही का सिलसिला जारी रहा। परिणामस्वरूप लाखों लोग गरीबी में गुजर-बसर के लिए मजबूर हो गए हैं।

दरअसल कई लोगों के काम-धंधे पहले ही बंद हो गए थे। वहीं कल कारखानों के ताले अभी खुले नहीं थे कि कोरोना की दूसरी लहर आ गई। ऐसे में गांव से शहर तक रोजी-रोजगार का संकट आज भी बरकरार है। जाहिर है यह आर्थिक दुष्चक्र अभी बना रहेगा। पहली लहर में 14 करोड़ लोगों का एक साथ बेरोजगार होना काफी कुछ बयां कर देता है। यह दूसरी लहर भी इसमें कुछ बढ़ोतरी ही करेगी। एक यक्ष प्रश्न यह भी है कि कोरोना वायरस ने इतनी बड़ी तबाही मचा दी। देश लगातार मुसीबतों को झेलता रहा। बावजूद इसके इससे निपटने के लिए एक समग्र राष्ट्रीय नीति अभी तक सामने क्यों नहीं आई है? कोरोना को आए एक साल से अधिक समय हो गया, अब दूसरी लहर उफान पर है, जबकि तीसरी लहर की संभावना भी व्यक्त की जा चुकी है। यदि लहर पर लहर आती रही और इसका निस्तारण समय रहते न हुआ तो इसमें कोई शक नहीं कि देश में गरीबों की तादाद और बढ़ेगी। भुखमरी और कुपोषण के आगोश में करोड़ों समाएंगे। लिहाजा विकास की धुरी पर घूमने वाला भारत आर्थिक दुष्चक्र में फंसकर उलझ सकता है।

सुशासन की अवधारणा इसमें मददगार साबित हो सकती है। अभिशासन के सिद्धांत में इस बात पर जोर दिया गया है कि सुशासन तब होता है जब सरकार अपने व्यय में मितव्ययिता बरतती है, अपनी शक्तियों को कम करती है, विनम्र भूमिका निभाती है और लोक सशक्तीकरण की ओर झुकी होती है। मौजूदा हालात में यह समय की मांग भी है। सरकार इस मामले में कितनी खरी उतरती है यह देखने वाली बात होगी। सरकार के अलावा जनता को भी यह विचार करना है कि देश आखिर कोरोना के इस भंवरजाल से कैसे बाहर निकले। उसे भी अनुशासन का परिचय देना होगा। अब समय रहते दोनों को होश में आ जाना चाहिए, ताकि सभ्यता, संस्कृति और देश सभी को आसानी से पटरी पर लाया जा सके।

[निदेशक, वाईएस रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन]

 

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