राष्ट्रवाद की चपेट में कोरोना वैक्सीन, टीका निर्यातक हमारा देश करेगा इसका आयात

प्राथमिकता के आधार पर यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी को कोरोना रोधी वैक्सीन उपलब्ध हो सके। फाइल

बहुराष्ट्रवाद और बहुलतावाद भूमंडलीकरण का मुख्य नारा रहा है। लेकिन दुनिया में बढ़ते कोरोना संक्रमण ने ग्लोबल विलेज और आर्थिक उदारवाद के इस मिथक को तोड़ दिया है। भारत में टीकाकरण अभियान में पश्चिमी देशों ने नई मुसीबत खड़ी कर दी है।

Sanjay PokhriyalMon, 19 Apr 2021 09:29 AM (IST)

प्रमोद भार्गव। आज समूचा देश कोरोना महामारी की दूसरी लहर से जूझ रहा है। इससे बचने के एकमात्र उपाय कोरोना वैक्सीन की कमी ने दिक्कत बढ़ा दी है। भारत में वैक्सीन निर्माण पर असर पड़ा है। इस समय जब भारतीय कंपनियां वैक्सीन उत्पादन में तेजी लाते हुए दुनियाभर में इसकी उपलब्धता को बढ़ाने के प्रयासों में जुटी हैं, वैसे में अमेरिका और यूरोपीय देशों की आत्मकेंद्रित सोच ने इनकी राह में बाधाएं पैदा कर दी हैं। इन देशों ने वैक्सीन निर्माण के लिए जरूरी कच्चे माल के निर्यात पर रोक लगा दी है।

भारत की सबसे बड़ी टीका निर्माता कंपनी एसआइआइ यानी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के सीईओ अदार पूनावाला ने इस समस्या के निदान के लिए केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग भी की है। जबकि भारत पिछले एक वर्ष से इस संक्रमण से लगातार जूझ रहा है। जाहिर है, शासन-प्रशासन के सामने वे सब कमियां आई होंगी, जिनसे सबक लेकर यदि इस आपदा की पुनरावृत्ति होती है तो कारगर ढंग से निपटा जा सके। लेकिन देखने में आ रहा है कि हमारे पास भारतीय वैक्सीन की जो खुराकें अतिरिक्त मात्र में थीं, उन्हें हमने पड़ोसी देशों को उदारतापूर्वक दान दे दिया और अब पश्चिमी देशों की ओर ताक रहे हैं। इन्हीं देशों ने राष्ट्रवाद को प्रमुखता देते हुए भारत को वैक्सीन का कच्चा माल देने से इन्कार कर दिया। इधर ऑक्सीजन की समस्या भी विकराल होकर उभरी है। जबकि इस समस्या से घरेलू स्तर पर निपटा जा सकता था। लेकिन देश और प्रदेश के नेतृत्वकर्ताओं ने विधानसभा चुनावों को ज्यादा महत्वपूर्ण समझा, जिसके नतीजे अब भुगतने पड़ रहे हैं।

इस बीच अमेरिका की बाइडन सरकार ने इस रोक के लिए ‘रक्षा उत्पादन अधिनियम’ को बहाना बनाया है। नतीजतन एसआइआइ को कच्चे माल के रूप में अमेरिका से आयात किए जाने वाले एकल उपयोगी ट्यूब, असेंबली एडज्यूवेंट समेत कुछ रसायन आयात करने में दिक्कतें आने लगी हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने पूरे कार्यकाल में ‘अमेरिका प्रथम’ का नारा खुले रूप में लगाते रहे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में उन्होंने वीजा और अमेरिकी नागरिकता हासिल करने के नियमों को कठोर भी बनाया था। हालांकि बाइडन ने राष्ट्रपति बनते ही वीजा नियमों को कुछ हद तक शिथिल कर दिया है। ट्रंप के बारे में दुनिया में यह धारणा बन गई थी कि उन्होंने राष्ट्रवाद को महत्व दिया, ताकि अमेरिका वैश्विक व्यापार में अग्रिम पंक्ति में रहे, इसलिए अमेरिका प्रथम की नीति अपनाई। किंतु अब वैक्सीन के कच्चे माल को लेकर जो हकीकत सामने आ रही है, उससे यह साफ है कि बाइडन भी ट्रंप की विदेश नीति में प्रच्छन्न राष्ट्रवाद और स्वदेशी की अवधारणा को अपना रहे हैं। बस वे इतनी कुटिल चतुराई जरूर बरत रहे हैं कि ट्रंप की तरह अंदरूनी व्यापारिक रणनीतियों को उजागर नहीं कर रहे। इस प्रतिबंध के पीछे यूरोपीय देशों की भी यही मंशा है कि भारत में निíमत कोविशील्ड और कोवैक्सीन की मांग सस्ती और प्रभावी होने के कारण जिस तेजी से बढ़ रही है, उसके चलते अमेरिका, ब्रिटेन, रूस और अन्य देशों में निíमत वैक्सीन कहीं वाणिज्य की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ न जाएं?

इस बाबत इन कथित ‘विश्व ग्राम’ के पैरोकारों का यह कहना भी थोथा साबित हो रहा है कि विदेश नीति और आíथक विकास की उदारवादी अवधारणा को लेकर उनका नजरिया राष्ट्रवादी और विकासशील देशों से कहीं बेहतर है। अमेरिका ईरान परमाणु संधि और पेरिस जलवायु समझौते को दुनिया की हितपूíत का माध्यम बताकर अपनी पीठ थपथपाता रहा है। हालांकि ट्रंप जलवायु समझौते का विरोध करके बार-बार यह जताते रहे थे कि इससे अमेरिका के आíथक हितों को पलीता लगा है और सबसे ज्यादा लाभ भारत, चीन उठा रहे हैं।

वैक्सीन निर्माण में अगुआ भारत : भारत जिस तरह से वैक्सीन निर्माण और उसके वितरण में वैश्विक स्तर पर अग्रिम पंक्ति में आ खड़ा हुआ है, उसके चलते यह आशंका दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रही थी कि वह खुद वैक्सीन की कमी के संकट से घिर जाएगा। इस हकीकत से नि¨श्चत रहते हुए ही भारत ने अपने कई पड़ोसी देशों को मुफ्त में वैक्सीन की करोड़ों खुराकें देकर अभिभावक जैसी उदारता दिखाई थी। लेकिन अब वैक्सीन के क्षेत्र में दुनिया की राजधानी माने जाने वाले भारत को उस वैक्सीन को निर्यात करने पर विवश होना पड़ रहा है जिसका मानव परीक्षण भारत के लोगों पर हुआ ही नहीं है। साथ ही, इनके त्रिस्तरीय मानव परीक्षण के आंकड़े भी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। हालांकि इन कमियों को नए नियमों के चलते ‘न्यू ड्रग्स एंड क्लीनिकल ट्रायल्स रूल्स 2019’ में दवा परीक्षण के परिप्रेक्ष्य में जो छूटें दी गई हैं, उसके तहत कुछ सैकड़ा लोगों पर परीक्षण कर ट्रायल पूरा कर लिया जाएगा। सात दिन ये लोग चिकित्सकों की निगरानी में रहेंगे। रूस से जिस स्पुतनिक टीके के आयात को मंजूरी मिली है, उसे इस प्रक्रिया से गुजारने के बाद ही जन-साधारण को लगाया जाएगा।

अमेरिका ने तो एक कदम आगे बढ़ते हुए फाइजर बायोएनटेक और मॉडर्ना की वैक्सीनों को दिसंबर 2020 में ही मंजूरी देकर टीका लगाना शुरू कर दिया था। इन्हें लगभग 94 प्रतिशत तक प्रभावी माना जा रहा है। इसके बावजूद यह भरोसा नहीं किया जा रहा कि ये वैक्सीन कितने समय तक सुरक्षा मुहैया कराएंगी। इसलिए फाइजर ने कोरोना के नवीनतम रूप बी-1.351 के खिलाफ नई वैक्सीन का विकास शुरू कर दिया है। मॉडर्ना ने भी इस स्वरूप को बेअसर करने वाली नई वैक्सीन का परीक्षण जानवरों पर शुरू कर दिया है। यदि यह सफल होती है तो इसे तीसरे बूस्टर डोज के रूप में लगाया जाएगा। अमेरिका इनका उपयोग केवल अमेरिकियों की प्राण-रक्षा के लिए राष्ट्रवाद के तहत कर रहा है। अपने 60 प्रतिशत नागरिकों को टीका लगाने के बाद अमेरिका इन वैक्सीन का निर्यात शुरू करेगा।

हालांकि भारत अभी तक वैक्सीन के क्षेत्र में सबसे बड़ा निर्माता व निर्यातक देश है। लेकिन इस समय टीका निर्माता सभी देशों की कंपनियां अधिकतम बाजार हथियाने की होड़ में लग गई हैं। यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के बीच तो कोविड वैक्सीन को लेकर तीखी झड़प भी हो चुकी है। लिहाजा अभी तक यह तय नहीं हो पाया है कि यूरोपीय संघ के सदस्य देश ब्रिटेन को वैक्सीन देंगे भी अथवा नहीं। घरेलू जरूरतों के सामने सभी अंतरराष्ट्रीय संधियों की शर्ते बौनी साबित हो रही हैं।

दरअसल कोरोना संक्रमण पर नियंत्रण का बाजार करीब 2,704 अरब रुपये तक पहुंच गया है। दूसरी और तीसरी लहर में कोरोना का कठोर रूप जो कहर ढा रहा है, उससे टीका व कोरोना से जुड़ी दवा निर्माता कंपनियों का अनुमान है कि यह बाजार दो से तीन साल के भीतर 4,165 अरब रुपये का हो जाएगा। भारत की कोविशील्ड और कोवैक्सीन की नजर भी इस बाजार पर है। कोवैक्सीन अब तक की सबसे सस्ती वैक्सीन है। उसकी नजर गरीब व मध्यम आय वाले देशों पर है, जो वैक्सीन हासिल करने के लिए भारत की ओर टकटकी लगाए हैं। कोविशील्ड भी इन्हीं देशों में बाजार तलाश रही है। इसलिए कोविशील्ड भारत सरकार द्वारा की जा रही खरीदी से बाहर निकलकर खुले बाजार में वैक्सीन का निर्यात करके अपनी धाक जमाना चाहती है। भारत बायोटेक जो कोवैक्सीन बना रही है उसकी वैक्सीन सप्लाई चेन करीब 80 देशों में फैली हुई है। दूसरी तरफ ब्राजील में कोवैक्सीन का क्लीनिकल परीक्षण पूरा हो चुका है और अब उसने इसे खरीदने की इच्छा भारत बायोटेक को जता दी है।

साफ है, कोवैक्सीन की मांग पूरी दुनिया में बढ़ रही है। इससे बेचैन होकर उसके मुकाबले की होड़ में लगी अन्य कंपनियां, उसकी क्षमता और प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करने लगी हैं। अलबत्ता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय वैक्सीन के निर्यात को 170 देशों में वितरित करने की बात कह चुके हैं, इसलिए बाधाएं आती-जाती रहेंगी। लेकिन निर्यात से पहले भारतीय नागरिकों को वैक्सीन प्राथमिकता से लगाई जानी चाहिए। सीरम इंस्टीट्यूट की कोविशील्ड को ब्रिटेन, अर्जेटीना और अल-सल्वाडोर में निर्यात करने की मंजूरी मिल चुकी है। बावजूद एसआइआइ चाहता है कि भारत सरकार उसे खुले बाजार में प्रतिस्पर्धा का अवसर दे। भारत में वैक्सीन का बाजार दुनिया में न फैल जाए, इसलिए अमेरिका व यूरोपीय संघ के देशों ने कच्चे माल पर रोक लगाई है। फिलहाल दुनिया के कुल वैक्सीन उत्पादन में अमेरिका की हिस्सेदारी तो 27 फीसद है, पर निर्यात में उसका योगदान शून्य है।

टीका निर्यातक हमारा देश करेगा इसका आयात: आज भारत में कोरोना हर क्षेत्र और प्रत्येक आयुवर्ग के लोगों में जिस तेजी से पैर पसार रहा है उसके चलते भारत टीका निर्यात करने की बजाय आयात करने को मजबूर हो गया है। ऐसे में भारतीय वैक्सीन की करोड़ों खुराकों का निर्यात प्रभावित होने की आशंका बन गई है। भारत सरकार की अब स्पष्ट मंशा है कि देश में उत्पादित वैक्सीन का उपयोग पहले घरेलू स्तर पर होना जरूरी है। इसलिए पहले भारत ने जहां फाइजर के आयात को नामंजूर कर दिया था, वहीं अब फास्टट्रैक वैक्सीन आयात को मंजूरी देने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। रूस की स्पुतनिक वैक्सीन का आयात जल्द शुरू हो सकता है। इसकी 12.5 करोड़ खुराकें मंगाई जा रही हैं।

भारत ने भारतीय वैक्सीन के निर्यात पर रोक और आयात की छूट इसलिए भी दी है, क्योंकि कच्चे माल का संकट होने के बावजूद उसे देश की 60 प्रतिशत आबादी का टीकाकरण जल्द करना है। फिलहाल रोजाना औसतन 35 लाख लोगों को टीका लगाया जा रहा है। ऐसे में 60 फीसद यानी करीब 78 करोड़ लोगों को वैक्सीन की दोनों डोज देने में लगभग पांच माह लगेंगे। इस लक्ष्यपूíत के लिए दोनों डोज के लिए 156 करोड़ खुराकों की जरूरत होगी। जबकि राज्यसभा की एक समिति की रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में देश में सालाना करीब 125 करोड़ खुराकें बनाने की क्षमता भारतीय कंपनियों के पास है।

यही वजह है कि कोविशील्ड और कोवैक्सीन के अलावा तीसरी स्पुतनिक वैक्सीन के आयात को मंजूरी दी जा रही है। वैसे देखा जाए तो सही मायने में इस कठिन कोरोना काल में दवा क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय कंपनियों और देशों को एक दूसरे की मदद करने की जरूरत है, ताकि सभी को टीका लग सके। किसी एक देश या चुनिंदा देशों के नागरिकों को टीका लगा देने भर से कोरोना की समाप्ति मुश्किल है। इसलिए बहुराष्ट्रवाद व विश्वग्राम की अवधारणा बनाए रखनी है तो समर्थ देशों को प्रतिबंधात्मक उपाय करने के बजाय उदार रुख अपनाना होगा।

[वरिष्ठ पत्रकार]

This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.