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महामारी के दौर में बौद्धिक संपदा अधिकार से मुक्त हो कोरोना टीका, पेटेंट के अधिकार दिलाती ज्ञान परंपरा

डब्ल्यूटीओ में 164 देश सदस्य हैं। इनमें से 120 देशों ने भारत के प्रस्ताव का समर्थन कर किया है।

अमेरिका में कोरोना के लिए बनी मॉडर्ना की वैक्सीन के शोधकार्य में अमेरिकी सरकार भी शामिल रही है। लिहाजा अमेरिका पेटेंट के अधिकार छोड़ता है तो बाकी देशों पर भी अधिकार छोड़ने का नैतिक दबाव बनेगा। इससे टीका निर्माण की राह आसान होगी।

Sanjay PokhriyalTue, 11 May 2021 10:42 AM (IST)

प्रमोद भार्गव। यह सुखद खबर है कि विश्व के प्रत्येक देश में कोरोना टीका पहुंचाने की दिशा में अमेरिका ने अहम पहल की है। दरअसल भारत एवं दक्षिaण अफ्रीका ने कोरोना टीकों को बौद्धिक संपदा अधिकार (आरपीआइ) अर्थात ‘पेटेंट’ से छूट देने की मांग की थी। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में पिछले साल कोरोना महामारी जब चरम पर थी, तब यह प्रस्ताव रखा गया था। अमेरिकी प्रशासन ने इस प्रस्ताव पर सहमति दे दी है। यूरोपीय संघ भी विचार कर रहा है। फिलहाल डब्ल्यूटीओ में 164 देश सदस्य हैं। इनमें से 120 देशों ने भारत के प्रस्ताव का समर्थन कर किया है। किंतु विधान में विडंबना है कि जब सभी सदस्य देश किसी प्रस्ताव का समर्थन करेंगे तब वह मान्य होगा।

यदि डब्ल्यूटीओ में यह प्रस्ताव पारित हो जाता है तो टीका निर्माता सरकारी और निजी कंपनियों को अपनी तकनीक और शोध संबंधी जानकारियां साझा करनी होंगी, जिससे बिना कोई शुल्क चुकाए अन्य दवा कंपनियां इस टीके का निर्माण कर सकेंगी। नतीजन टीके के उत्पादन की मात्रा बढ़ जाएगी और वैक्सीन गरीब देशों को भी सस्ती दरों पर मिल जाएगी। वैसे भारत समेत जो भी टीका निर्माता देश हैं, वे बौद्धिक संपदा के अधिकारों को सुरक्षित बनाए रखने के पक्ष में रहते हैं, लेकिन जब पूरी दुनिया महामारी से जूझ रही है तब यह जरूरी हो जाता है कि पेटेंट समझौतों में रियायत दी जाए। क्योंकि टीकों की मांग की तुलना में उपलब्धता बहुत कम है। हालांकि यह रियायत कंपनियां आसानी से देने को राजी नहीं हैं।

इसलिए उनके सीईओ अमेरिका के फैसले को निराशाजनक एवं व्यापार विरोधी बता चुके हैं। खासकर यूरोपीय यूनियन के कुछ देश वैक्सीन से होने वाले मुनाफे को छोड़ना नहीं चाहते हैं। दरअसल टीका निर्माण की तकनीक पेटेंट मुक्त हो जाएगी तो टीके के निर्माण में पूंजी लगाने वाली कंपनियों को र्आिथक हानि तो उठानी ही पड़ेगी, भविष्य में भी लाभ नहीं कमा पाएंगी। लिहाजा डब्ल्यूटीओ यदि टीके को पेटेंट मुक्त करता है तो कंपनियां अंतरराष्ट्रीय न्यायालय से भी हस्तक्षेप की अपील कर सकती हैं।

हालांकि भारतीय दर्शन कहता है कि इस संसार में जो भी कुछ है, वह ईश्वर का है, इसलिए जो ईश्वर का है, वह सबका है। मानवता को बचाए रखने के लिए इसी भावना से जुड़ा भाव बचा सकता है। कोई भी व्यक्ति या कंपनी नई दवा का उत्पाद या किसी उपकरण का अविष्कार करते हैं तो उसे अपनी बौद्धिक संपदा बताते हुए पेटेंट करा लेते हैं। मसलन इस उत्पाद और इसे बनाने की विधि को कोई और उनकी इजाजत के बिना उपयोग नहीं कर सकता। भारत ने भी ऑक्सफोर्ड यूनिर्विसटी और एस्ट्राजेनेका की कोविशील्ड तथा भारत बायोटेक की कोवैक्सीन के निर्माण में पूंजी लगाई है, लेकिन कोविशील्ड पर पेंटेट खत्म करने का अधिकार भारत सरकार के पास न होकर एस्ट्राजेनेका के पास है। इसे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में विकसित किया गया है।

अदार पूनावाला की सीरम कंपनी सिर्फ इसका निर्माण कर रही है। कोवैक्सीन जरूर भारत बायोटेक और आइसीएमआर ने विकसित की है। अतएव इसकी बौद्धिक क्षमता पर भारत सरकार का अधिकार है। हालांकि टीका बनाने की विधि बता देने भर से वैक्सीन बना लेना आसान नहीं है। इसके लिए दुनिया के अनेक देशों से द्विपक्षीय समझौतों के अंतर्गत कच्चा माल भी मंगाना होता है। पश्चिमी देशों द्वारा अस्तित्व में लाया गया पेटेंट एक ऐसा कानून है, जो व्यक्ति या संस्था को बौद्धिक संपदा का अधिकार देता है। मूल रूप से यह कानून भारत जैसे विकासशील देशों के पारंपरिक ज्ञान को हड़पने की दृष्टि से ईजाद में लाया गया है। क्योंकि यहां जैव विविधता के अकूत भंडार होने के साथ, उनके नुस्खे मानव व पशुओं के स्वास्थ्य लाभ से भी जुड़े हैं। इन्हीं पारंपरिक नुस्खों का अध्ययन करके उनमें मामूली फेरबदल कर उन्हें एक विज्ञान शब्दावली दे दी जाती है और फिर पेटेंट के जरिये इस बहुसंख्यक ज्ञान को हड़पकर इसके एकाधिकार चंद लोगों के सुपुर्द कर दिए जाते हैं।

यही वजह है कि वनस्पतियों से तैयार दवाओं की ब्रिकी करीब तीन हजार अरब डॉलर तक पहुंच गई है। हर्बल या आयुर्वेद उत्पाद के नाम पर सबसे ज्यादा दोहन भारत की प्राकृतिक संपदा का हो रहा है। ऐसे ही बेतुके एवं चालाकी भरे दावे और तरकीबें एलोपैथी दवाओं के परिप्रेक्ष्य में पश्चिमी देशों की बहुराष्ट्रीय फार्मा कंपनियां अपना रही हैं। अब तक वनस्पतियों की जो जानकारी विज्ञानी हासिल कर पाए हैं, उनकी संख्या लगभग ढाई लाख है। इनमें से 50 प्रतिशत ऊष्ण कटिबंधीय वन-प्रांतरों में उपलब्ध हैं। भारत में 81 हजार वनस्पतियां और 47 हजार प्रजातियों के जीव-जंतुओं की पहचान सूचीबद्ध है। अकेले आयुर्वेद में पांच हजार से भी ज्यादा वनस्पतियों का गुण व दोषों के आधार पर मनुष्य जाति के लिए क्या महत्व है, इसका विस्तृत विवरण है।

विदेशी दवा कंपनियों की निगाहें इस हरे सोने के भंडार पर टिकी हैं। इसलिए 1970 में अमेरिकी पेटेंट कानून में नए संशोधन किए गए। विश्व बैंक ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि नया पेटेंट कानून परंपरा में चले आ रहे देशी ज्ञान को मान्यता नहीं देता। बल्कि इसके उलट जो जैव व सांस्कृतिक विविधता और उपचार की देशी प्रणालियां प्रचलन में हैं, उन्हें नकारता है। जबकि इनमें ज्ञान और अनुसंधान अंतर्नििहत हैं। ये समाज में इसलिए संज्ञान में हैं, ताकि इन्हें आपस में साझा करके उपयोग में लाया जा सके। साफ है, बड़ी कंपनियां देशी ज्ञान पर एकाधिकार प्राप्त कर समाज को ज्ञान और उसके उपयोग से वंचित करना चाहती हैं।

इसी क्रम में सबसे पहले भारतीय पेड़ नीम के औषधीय गुणों का पेटेंट अमेरिका और जापान की कंपनियों ने कराया था। इसके बाद तो पेटेंट का सिलसिला रफ्तार पकड़ता गया। हल्दी, करेला, जामुन, तुलसी, अनार, आमला, रीठा, अर्जुन, हरड़, अश्वगंधा, अदरक, कटहल, अर्जुन, अरंड, सरसों, बासमती चावल, बैंगन और खरबूजा तक पेटेंट की जद में आ गए। इसी तरह भारत में पैदा होने वाले बासमती चावल का पेटेंट अमेरिकी कंपनी राइसटेक ने हड़प लिया। यह चावल आहार नलिकाओं को स्वस्थ रखने में औषधीय गुण का काम करता है। हल्दी के औषधीय गुणों व उपचार से देश का हर आदमी परिचित है। इसका उपयोग शरीर में लगी चोट को ठीक करने में परंपरागत ज्ञान के आधार पर किया जाता है। इसमें कैंसर के कीटाणुओं को शरीर में नहीं पनपने देने की भी क्षमता है। मधुमेह और बवासीर के लिए भी हल्दी असरकारी औषधि के रुप में इस्तेमाल होती है। कोरोना के असर को खत्म करने के लिए करोड़ों लोग इसे दूध में मिलाकर पी रहे हैं। इसका भी पेटेंट अमेरिकी कंपनी ने करा लिया था, किंतु इसे चुनौती देकर भारत सरकार खारिज करा चुकी है। दरअसल पेटेंट कानून बौद्धिक संपदा के बहाने विकासशील देशों की ज्ञान परंपरा को हड़पने का एक अंतरराष्ट्रीय कानून है, जिसे समाप्त करना ही कोरोना महामारी से जूझ रही दुनिया के हित में है।

पेटेंट के अधिकार दिलाती ज्ञान परंपरा: प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के बूते हमने दो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विरुद्ध पेटेंट की लड़ाई जीती है। इन दोनों ही मामलों में विदेशी कंपनियों ने भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों से उत्पादन की पद्धति व प्रयोग के तरीके चुरा लिए थे। भारत की वैज्ञानिक व औद्योगिक अनुसंधान परिषद ने भारतीय पारंपरिक ज्ञान के डिजिटल पुस्तकालय से तथ्यपरक उदाहरण व संदर्भ खोजकर आधुनिक विज्ञान के सिद्धांतों के क्रम में यह लड़ाई लड़ी और जीती। इस कानूनी कामयाबी से साबित हुआ है कि भारत की पारंपरिकता सदियों से भविष्य दृष्टा रही है। प्राकृतिक संपदा के उपयोग और उपभोग को लेकर हजारों वर्ष पूर्व ही हमारे मनीषियों ने आचार संहिता र्नििमत कर दी थी। क्योंकि इसके दीर्घकाल तक सुरक्षित रहने में ही प्राणी जगत की शाश्वतता और मनुष्य की र्आिथक समृद्धि का मूल-मंत्र छिपा था।

जावित्री से कुल्ला करने और आयोडीन युक्त नमक बनाने की पद्धतियों को विदेशी कंपनियों द्वारा हड़पने की मंशा को, पारंपरिक ज्ञान से चुनौती देने की कानूनी प्रक्रिया ने यह तय कर दिया है कि हमारी ज्यादातर ज्ञान प्रणालियां विज्ञान की कसौटी पर खरी हैं। पेटेंट संबंधी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अदालतों में अपने साक्ष्य की मजबूती के लिए प्रस्तुत की गईं ज्ञान प्रणालियों से अब साबित हो रहा है कि स्वदेशी प्रौद्योगिकी कितनी महत्वपूर्ण हैं? भारतीय औद्योगिक अनुसंधान परिषद जीत हासिल करने के बाद इस प्राचीन भारतीय समृद्धि और समरसता के मूल में प्राकृतिक संपदा, कृषि और गोवंश थे। पाकृतिक संपदा के रूप में हमारे पास नदियों के अक्षय, शुद्ध और पवित्र जल स्नोत थे। इसीलिए नदियों के किनारे और वन प्रांतों में मानव सभ्यता और भारतीय संस्कृति विकसित हुई। आहार की उपलब्धता सुलभ हुई तो सृजन और चिंतन के पुरोधा सृष्टि के रहस्यों की तलाश में जुट गए। र्आिथक संसाधनों को समृद्ध बनाने के लिए ऋषि-मनीषियों ने नए-नए प्रयोग किए। कृषि फसलों के विविध उत्पादनों से जुड़ी।

फलत: अनाज, दलहन, चावल, तेलीय फसलें और मसालों की हजारों किस्में प्राकृतिक रूप से फली-फूलीं।

लगभग 167 फसलों और 350 फल प्रजातियों की पहचान की गई। 89 हजार जीव-जंतुओंऔर 47 हजार प्रकार की वनस्पतियों की खोज हुई। मनीषियों ने प्रकृति और जैव-विविधता के उत्पादन तंत्र की विकास सरंचना और प्राणी जगत के लिए उपयोगिता की विज्ञान सम्मत समझ हासिल की। इनकी महत्ता और उपस्थिति दिर्घकालिक बनी रहे, इसलिए धर्म व अध्यात्म के बहाने अलौकिक तादात्म्य स्थापित कर इनके, भोग के लिए उपभोग पर व्यावहारिक अंकुश लगाया। दूरदृष्टा मनीषियों ने हजारों साल पहले ही लंबी ज्ञान-साधना व अनुभवजन्य ज्ञान से जान लिया था कि प्राकृतिक संसाधनों का कोई विकल्प नहीं है। वैज्ञानिक तकनीक से हम इनका रूपांतरण अथवा कायातंरण तो जरूर कर सकते हैं, किंतु तकनीक आधारित किसी भी आधुनिकतम ज्ञान के बूते इन्हें प्राकृतिक स्वरूप में पुनर्जीवित नहीं कर सकते? तमाम दावों के बावजूद जैव तकनीक क्लोन से अभी तक जीवन का पुनरागमन धरती पर नहीं हुआ है।

[वरिष्ठ पत्रकार]

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