संघ की चिंता भविष्य का भारत है और राजनीतिक दलतंत्र की चिंता अगला चुनाव

[ हृदयनारायण दीक्षित ]:  ‘चेतन’ जड़ नहीं होता। यह दिक् और काल में गतिशील है। गति चेतन की प्रकृति है। व्यक्ति की तरह राष्ट्र का भी चेतन होता है। भारतीय उपमहाद्वीप के इस चेतन तत्व का नाम हिंदुत्व है। हिंदुत्व भारत की आत्मा है। ‘भारतीय इतिहास के उत्तरवैदिक काल में वृहदारण्यक उपनिषद में कहा गया कि सनातन काल से चला आ रहा धर्म सभी भूतों का मधु है और सभी भूत इसी धर्म के मधु हैं।’ धर्म सतत गतिशील है। सतत परिवर्तनशील है। वैदिक काल में यह प्रकृति के निकट है। उत्तरवैदिक काल में इसका दार्शनिक सांस्कृतिक विकास हुआ।

रामायण काल में इसी जीवन रचना में शील और मर्यादा की अभिव्यक्ति हुई। श्रीराम इसी शील और मर्यादा के पुरुषोत्तम हैं। महाभारत काल धर्म की ग्लानि और पराभव का समय है। श्रीकृष्ण ने गीता के चौथे अध्याय में बताया कि यह तत्व ज्ञान काल के प्रभाव में नष्ट हो गया। भारत में हिंदू चेतना के जागरण और पुनर्जागरण का दीर्घ इतिहास है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसी नवजागरण का प्रतिनिधि संगठन है। संघ दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है।

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने ‘भविष्य का भारत’ निर्माण पर तीन दिन खुलकर बातें की हैं। उन्होंने सभी राष्ट्रीय प्रश्नों पर संघ का मत व्यक्त किया है। संघ विरोधी हक्के-बक्के हैं। उन्होंने संघ विरोध के सारे मुद्दे छीन लिए हैं। संघ और राजनीतिक दलों के ध्येय में आधारभूत अंतर है। संघ की चिंता भविष्य का भारत है और राजनीतिक दलतंत्र की चिंता अगला चुनाव। संघ प्रमुख ने कहा कि ‘भविष्य के परमवैभवशाली भारत’ के निर्माण के लिए सभी वर्गों व विचार समूहों को ‘समन्वय’ के साथ बढ़ना चाहिए। भागवत का जोर राष्ट्रनिर्माण पर है।

उन्होंने विचारधाराओं की बहुलता का स्वागत किया है। सही बताया है कि ‘वैचारिक विविधता हिंदुत्व की शक्ति है।’ प्राचीन भारतीय दर्शन में पूर्व मीमांसा, न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग व वेदांत छह भिन्न विचारधाराएं हैं। बुद्ध और जैन को मिलाकर आठ। जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने ‘सिक्स सिस्टम ऑफ इंडियन फिलॉसफी’ में इस विविधता का उल्लेख किया है। आठों भिन्न दर्शन हिंदुत्व की शक्ति हैं। अथर्ववेद में पृथ्वी को भिन्न-भिन्न धर्मों की धारक बताया गया है। भारत में आस्तिक भी हैं और नास्तिक भी। यहां विदेशी माक्र्सवाद भी है। ईसाई और मुस्लिम भी अपनी आस्था का आनंद लेते हैं। भागवत ने हिंदुत्व के लिए मुसलमानों की उपस्थिति को सहज, स्वाभाविक और अनिवार्य बताया है। मुसलमानों को भी हिंदुत्व का अंग बताया है। संघ विरोधी निहत्थे हैं। संघ प्रमुख ने राष्ट्रीय चुनौतियों से जूझने के लिए सभी विचारधाराओं व वर्गों का आह्वान किया है। 

वैशेषिक दर्शन में दिक्, काल, मन और आत्मा को भी द्रव्य बताया गया है। ऐसे ही हिंदुत्व विश्वचेतन का ‘अमर द्रव्य’ है। हिंदू सभी विचारों के समन्वय का पर्याय है। सभी विविधताएं हिंदू द्रव्य का ही प्रकट रूप हैं। हिंदू द्रव्य के भीतर तमाम भाषाएं, बोलियां, रीति-रिवाज, आस्था और विश्वास हैं। पूर्वजों ने सचेत रूप में हिंदुत्व की मानवीय संवेदना को सींचा है। रूढ़ियां छोड़ी हैं। कालवाह्य को त्यागा है। युगानुरूप नए का अनुसंधान भी किया है। इसी का अनुसरण करते हुए संघ प्रमुख ने अपने अग्रज सरसंघचालक एमएस गोलवलकर के ‘बंच ऑफ थॉट्स’ के भी कुछ अंशों को तात्कालिक बताकर आज छोड़ने की घोषणा की है। संघ विरोधी कुछेक विद्वान भौचक हैं। वे प्रश्न उठा रहे हैं कि क्या संघ वाकई बदल रहा है? उन्हें संघ प्रेरणा की जानकारी नहीं है। युगानुरूप परिवर्तन हिंदू जीवन रचना की अंतर्निहित चेतना हैं और संघ हिंदू जीवन रचना के ही उदात्त आदर्श लेकर राष्ट्रनिर्माण में सक्रिय है। भागवत ने संघ दृष्टि का युगानुरूप पुनर्नवा दर्शन प्रस्तुत किया है। इसी समग्र दृष्टि में भारत को समृद्ध और अजेय बनाने के स्वर्ण सूत्र हैं।

संघ प्रमुख की घोषणा का सूत्र है, ‘भारत में कोई पराया नहीं। सब अपने हैं।’ भिन्नता प्रकृति की संरचना है। अपना पराया मनुष्य का निजी विचार है। तमाम भिन्नताओं के मध्य परस्पर विरोध भी दिखाई पड़ते हैं, लेकिन भागवत ने कहा है कि ‘एक समान मूल्यबोध के कारण सब अपने हैं।’ वे एक जन, एक भूमि एक संस्कृति और एक राष्ट्र हैं। उन्होंने इस मूल्यबोध को विकसित करने का श्रेय जनजातीय समूहों व किसानों को दिया है। वैदिक काल में तमाम समूह थे। जनों के लिए ऋग्वेद में पांचजन्य और पंचजना: शब्द आए हैं। किसानों के लिए ‘पंचकृष्टया’ का उल्लेख है। वैदिक भारत कृषकों, शिल्पियों, आचार्यों, व्यापारियों से समृद्ध था। उन्होंने साथ-साथ चलते हुए एक व्यावहारिक मूल्य बोध गढ़ा था। सबको साथ लेकर चलना ऋग्वेद में ‘संगच्छध्वं संवदध्वं’ कहा गया है। हिंदुत्व सहमना मूल्यबोध का ही व्यवहार सिद्ध दर्शन है। ऋग्वेद में ही ‘सभी दिशाओं से भद्र विचार प्राप्त करने’ की स्तुति मिलती है। अपने मूल्यबोध को सुंदर और दृढ़ बनाने के लिए विपरीत विचार का भी आदर हिंदू जीवन रचना में ही मिलता है।

जाति भारतीय समाज की एकता का बाधक तत्व हैं। विद्वान इसे ‘जाति व्यवस्था’ कहते हैं। संघ जातिविहीन एकात्म समाज निर्माण में संलग्न है। भागवत ने ठीक वार किया, ‘यह व्यवस्था कहां हैं? यह तो अव्यवस्था है। वह जाने वाली है।’ जाति भेद के विरुद्ध काम करने की एक शैली राजनीतिक है। जातियों का प्रतिशत, उनको मिली सुविधाएं और सुविधाओं की नई मांग आदि के आधार पर जाति खात्मे की नारेबाजी होती है। संघ शैली भिन्न है। सबको समान सम्मान। जाति पूछने का प्रश्न नहीं।

भागवत ने कहा कि जाति उच्छेद के लिए सकारात्मक प्रयास व समरसता का भाव निर्माण जरूरी है। उन्होंने अंतर्जातीय विवाह का समर्थन करते हुए संघ विरोधियों को भी नया ध्येय दिया है। आरक्षण के प्रश्न पर संघ का मत भी स्पष्ट किया है कि संविधानसम्मत सभी आरक्षणों को संघ का समर्थन है। राष्ट्रजीवन को मथने वाले प्रश्नों पर संघ का अपना मत है, लेकिन अपने मत से भिन्न मत के भी आदर की अभिव्यक्ति अनूठी है। राष्ट्र सर्वोपरिता के प्रश्नों पर सभी राजनीतिक दलों और गैर राजनीतिक संगठनों को भी समन्वय का ही मार्ग अपनाना चाहिए।

संवाद समाज गठन की आत्मा है और जनतंत्र की भी। कई समूह माओवादी हिंसक संगठनों से भी संवाद का प्रस्ताव करते हैं। कुछ समूह कश्मीरी अलगाववादियों पाकिस्तान समर्थकों से भी इसकी जरूरत बताते हैं, लेकिन संघ से संवाद नहीं करते। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कांग्रेसी होकर भी संघ से संवाद किया था, लेकिन कई नेता बेवजह संघ पर लांछन लगाते हैं। संघ पारदर्शी रूप में प्रत्यक्ष संवाद कर रहा है। आधुनिक भारत को विश्व में प्रतिष्ठित करने के लिए सभी संगठनों को संवाद करना चाहिए। तनावग्रस्त विश्व उदात्त मूल्यबोध के लिए भारत की ओर टकटकी लगाए है। हम सब भविष्य का भारत गढ़ रहे हैं। कुछ सचेत होकर शाश्वत मूल्यबोध के संवर्धन में संलग्न हैं। संघ ऐसा ही संगठन है, लेकिन अनेक दल या संगठन अचेत रूप में शाश्वत मूल्यों पर ही हमलावर हैं। संघ ने अपना रूप स्वरूप, ध्येय और स्वप्न सुस्पष्ट कर दिया है। विश्व मानवता का कल्याण ’हिंदू द्रव्य’ से ही होगा। भारत को भारत की नियति में ले जाने का भाव अर्थ प्रकट कर दिया गया है। इस अनुष्ठान में सबका स्वागत। सबका अभिनंदन। सब अपने अपने विचार लेकर हिंदू मूल्यबोध को विश्वजनीन बनाएं।

[ लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं ]

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