अर्थव्यवस्था की सेहत में सुधार के आसार, अगले वित्त वर्ष में विकास की संभावनाएं अच्छी

भारतीय अर्थव्यवस्था की सेहत में सुधार के आसार।

बीते माह देश में आर्थिक मोर्चे पर अनेक अच्छी खबरें आई हैं। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि वर्तमान वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही में विकास दर में व्यापक वृद्धि हो सकती है। देश के विज्ञानियों द्वारा विकसित दो वैक्सीनों से आशा की नई लहर दिखने लगी है।

Publish Date:Fri, 08 Jan 2021 10:25 AM (IST) Author: Tanisk

[प्रो. लल्लन प्रसाद]। विश्व की अर्थव्यवस्था के लिए बीता वर्ष ऐतिहासिक रूप से कठिनाइयों से भरा रहा। कोविड-19 का जन्मदाता और उसे सारी दुनिया में फैलाने वाला चीन तो उससे मुक्त हो चला है तथा उसकी अर्थव्यवस्था तेजी से विकास पथ पर अग्रसर है, किंतु अधिकांश विकासशील और अविकसित देशों की अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं लौटी है। भारत ने समय रहते लॉकडाउन लगा कर स्थिति को नियंत्रण से बाहर होने नहीं दिया, फिर भी अर्थव्यवस्था को भारी क्षति पहुंची। वर्तमान वित्त वर्ष में जीडीपी का विकास दर शून्य से नीचे यानी माइनस 7.5 प्रतिशत होने का अनुमान है, जो पिछले छह दशकों का सबसे कम है। 

मार्च से सितंबर तक आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं को छोड़कर बाकी चीजों का उत्पादन एवं व्यवसाय नहीं के बराबर रह गया था। बेरोजगारी चरम सीमा पर पहुंच गई थी, करोड़ों लोग औद्योगिक शहरों को छोड़कर गावों की ओर पलायन के लिए मजबूर हो गए थे। केंद्र सरकार ने कुल 29 लाख करोड़ रुपये से अधिक के राहत पैकेज दिए, अर्थव्यवस्था अब विकासोन्मुख है। मोबाइल, वाशिंग मशीन, रेफ्रीजरेटर, एसी, टीवी, दो पहिया वाहन और कार, कंप्यूटर व लैपटॉप, लक्जरी फ्लैट जैसी चीजों की मांग में तेजी आ रही है, जो इस बात का द्योतक है कि विकास गति पकड़ रहा है, हालांकि अर्थव्यवस्था के बहुत से क्षेत्र मंदी से अभी उबर नहीं पाए हैं। टूरिज्म, हवाई यातायात और होटल व्यवसाय आदि अभी भी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और मास्क समेत शारीरिक दूरी व अन्य सावधानियों को बरतने के कारण बाधित हैं।

कामकाज की व्यवस्था में भारी बदलाव आया

इस बीच कामकाज की व्यवस्था में भारी बदलाव आया है। कार्यालय की जगह लोग घरों से काम कर रहे हैं। नई नौकरियां बहुत कम आ रही हैं। हालांकि अधिकांश मजदूर अब शहरों में लौट तो आए हैं, किंतु रोजगार के अवसर पहले से कम हैं। एशियन डेवलपमेंट बैंक और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की एक संयुक्त रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 15-27 आयु वर्ग की उम्र के लोगों के लिए अल्प एवं दीर्घकाल तक आर्थिक व सामाजिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

 

सप्लाई चेन अभी भी पूरी तरह बाधा मुक्त नहीं

सप्लाई चेन अभी भी पूरी तरह बाधा मुक्त नहीं हुई है। ऐसे में किसानों का आंदोलन आग में घी का काम कर रहा है। एक अनुमान के अनुसार इसके कारण अब तक 70 हजार करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान किसानों को और देश को हो चुका है। महंगाई की दर 6.8 प्रतिशत है, जो छह प्रतिशत की सुरक्षा सीमा पार कर चुकी है, जिस कारण रिजर्व बैंक रेपो एवं रिजर्व रेपो रेट में परिवर्तन नहीं कर रहा है, क्योंकि यह मुद्रा स्फीति को बढ़ावा दे सकता है। इस कारण अर्थव्यवस्था में विरोधाभास की स्थिति पैदा हो गई है। देशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए कर्ज सस्ता होना चाहिए, किंतु यह चलन में अधिक मुद्रा लाकर महंगाई को हवा दे सकता है। रिजर्व बैंक का मानना है कि अर्थव्यवस्था में मुद्रा की कमी नहीं है, किंतु आम आदमी ऐसा नहीं मानता, स्वदेशी निवेश में बढ़त न होना भी यही संकेत देता है।

 

मैन्यूफैक्चरिंग विकास दर प्रशंसनीय

मैन्यूफैक्चरिंग विकास दर प्रशंसनीय है। पिछले तीन महीनों से इसमें रिकॉर्ड बढ़त जारी है। दिसंबर के शुरू में पीएमआइ 56.4 था। पिछले वर्ष दिसंबर में यह 53.3 था। उल्लेखनीय है कि 50 के ऊपर का पीएमआइ विकास का द्योतक होता है। मांग में वृद्धि के कारण कंपनियां स्टॉक में बढ़ोतरी कर रही हैं। अक्टूबर 2020 में दोपहिया गाड़ियों की बिक्री 2019 की इसी अवधि की अपेक्षा 18 प्रतिशत अधिक थी। त्योहारों का सीजन समाप्त होने पर कुछ वस्तुओं की मांग में थोड़ी कमी जरूर आई, जो स्वाभाविक है। 

 निर्यात में कमी आई

विश्वव्यापी मंदी के कारण निर्यात में कमी आई है। एक्जिम बैंक का अनुमान है कि अक्टूबर-दिसंबर में कच्चे तेल को छोड़कर निर्यात में 0.3 प्रतिशत की बढ़त संभावित है। एक सर्वे के अनुसार 50 प्रतिशत कंपनियों ने मांग ऑर्डर में वृद्धि की बात की, 40 प्रतिशत ने विदेशों से ऑर्डर में बढ़ोतरी माना। ऊर्जा की मांग कारखानों में काम शुरू होने से बढ़ी है। कुछ आधारभूत उद्योगों जैसे कोयला, कच्चा तेल, गैस, बिजली उत्पादन, फर्टलिाइजर, सीमेंट आदि के उत्पादन में कमी आई जो अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय रहा। ई-वे बिल जो 50 हजार से अधिक कीमत की वस्तुओं के यातायात पर अनिवार्य है उसकी संख्या जनवरी के 5.1 करोड़ से बढ़ कर अक्टूबर में 6.4 करोड़ हो गई थी।

 

डिजिटलाइजेशन की प्रक्रिया तेज हुई

लॉकडाउन ने डिजिटलाइजेशन की प्रक्रिया को तेज किया है। जीएसटी की उगाही अक्टूबर से लगातार एक लाख करोड़ रुपये के ऊपर जा रही है जो व्यापार में वृद्धि का स्पष्ट संकेत है। एफडीआइ में लगातार बढ़ोतरी हुई है, जो यह दर्शाता है कि विश्वव्यापी मंदी में भी विदेशी निवेशकों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर विश्वास बना रहा। विदेशी आयात में इस बीच कमी हुई और चालू खाते का घाटा समाप्त हुआ। आत्मनिर्भर भारत के अभियान से चीन से आने वाली बहुत सी अनावश्यक वस्तुओं पर भी पहली बार लगाम लगा।

 

भारत की अर्थव्यवस्था में स्थिरता कायम रहेगी

अर्थव्यवस्था की सेहत का एक द्योतक शेयर बाजार होता है, जो नवंबर के शुरू से उछाल पर है। मात्र 44 ट्रेडिंग सेशन में बीएसई सूचकांक 8,400 प्वाइंट बढ़कर पांच दिसंबर को 48,176 की रिकार्ड ऊंचाई पर बंद हुआ। अगले वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी विकास दर की जो संभावनाएं विभिन्न वित्तीय संस्थाओं और रेटिंग एजेंसियों द्वारा अनुमानित हैं, वे 5.4 से 13 प्रतिशत तक की हैं। इन अनुमानों से स्पष्ट है कि विकास की संभावनाएं अच्छी हैं, बशर्ते कोविड महामारी अगले कुछ महीनों में काबू में आ जाए, साथ ही इसका और कोई नया रूप संकट नहीं पैदा करे और देश में कृषि की पैदावार अच्छी रहे जैसे वर्तमान वित्त वर्ष में। इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट भी उम्मीद जगाती है, जिसमें जिक्र किया गया है कि दीर्घ अवधि में दक्षिण एशिया क्षेत्र में भारत की अर्थव्यवस्था में स्थिरता कायम रहेगी।

[लेखक- दिल्ली विश्वविद्यालय के बिजनेस इकोनॉमिक्स विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष हैं]

 

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