परीक्षा प्रणाली में नए प्रयोग के निहितार्थ, सभी परीक्षाओं का बढ़ेगा महत्व; स्कूलों की बढ़ी भूमिका

12वीं बोर्ड परीक्षा का परिणाम 10वीं 11वीं और 12वीं के प्री-बोर्ड तक के प्रदर्शन को आधार बनाकर जारी किया जाएगा। कोरोना काल में छात्र हित में लिया गया यह ऐतिहासिक फैसला बदलती शिक्षा के अनुरूप है। इससे भविष्य में छात्रों के मूल्यांकन का बेहतर विकल्प खोजने में मदद मिलेगी।

Sanjay PokhriyalWed, 23 Jun 2021 09:50 AM (IST)
कोरोना काल ने शिक्षा प्रणाली के समक्ष एक अभूतपूर्व और अप्रत्याशित संकट उत्पन्न कर दिया है। फाइल

डॉ. दर्शनी प्रिया। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) और भारतीय विद्यालय प्रमाण पत्र परीक्षा परिषद (सीआइएससी) के 12वीं बोर्ड की परीक्षा देने वाले छात्रों के मूल्यांकन संबंधी फार्मूले को मंजूरी दे दी। इससे वर्तमान शैक्षणिक वर्ष 2020-21 में 12वीं कक्षा के करीब 15.5 लाख छात्रों का भविष्य तय हो सकेगा। जहां सीबीएसई ने कोर्ट में 10वीं, 11वीं और 12वीं के अंकों के आधार पर नतीजे तैयार करने का फार्मूला पेश किया तो वहीं सीआइएससी ने परिणाम संबंधी मूल्यांकन के लिए विद्याíथयों के छह वर्ष के प्रदर्शन को प्राथमिकता दी। हालांकि अंतिम रूप से सीबीएसई के फामरूले पर सहमति बनी। कोरोना काल में कक्षीय पठन-पाठन और परीक्षा के अभाव में बच्चों को उत्तीर्ण करने का जो तरीका सैद्धांतिक रूप से मंजूर हुआ है देखा जाए तो मौजूदा परिस्थितियों में उसकी जरूरत भी थी। शिक्षा और परीक्षा प्रणाली से जुड़ा यह न्यायालयी निर्णय समकालीन परिपेक्ष्य में ऐतिहासिक कहा जा सकता है। निश्चित ही समग्र समीक्षा के मद्देनजर इसके दूरगामी परिणाम होंगे।

क्या है अंकगणितीय फार्मूले का सार: इस फामरूले के तहत 12वीं बोर्ड के नतीजे 10वीं, 11वीं और 12वीं कक्षा में छात्रों के प्रदर्शन के आधार पर घोषित किए जाएंगे। इसके लिए क्रमश: 30:30:40 का फार्मूला अपनाया गया है। यह बहुत ही समेकित और संतुलित है। यह कुछ इस तरह होगा। दसवीं के पांच विषय में से जिन तीन विषयों में छात्र ने सबसे ज्यादा अंक प्राप्त किया होगा। उनके औसत के आधार पर 30 फीसद अंक तय किए जाएंगे। 11वीं की वार्षकि परीक्षा में पांचों विषय में जो अंक मिले हैं उनका औसत लिया जाएगा। और उसी के आधार पर 30 फीसद अंक बनेंगे। 12वीं में यूनिट टेस्ट, एग्जाम और प्री बोर्ड परीक्षाओं से 40 फीसद अंक तय किए जाएंगे। प्रयोगात्मक परीक्षा और आंतरिक मूल्यांकन अधिकतर स्कूलों में किए जा चुके हैं। और जहां नहीं हुए हैं वहां सीबीएसई ने इन्हें आनलाइन करने के लिए कहा है। इस फार्मूले की एक खास बात यह भी है कि दसवीं के पांच में से श्रेष्ठ तीन विषयों के अंकों के आधार पर आकलन किया जाएगा। यह उदार फैसला पूरी तरह से छात्रों के अनुकूल है।

एक विशेष व्यवस्था के तहत यह भी तय किया गया है कि अगर कोई छात्र अपने प्राप्त नंबरों से संतुष्ट नहीं है तो उसके लिए परीक्षा पंजीकरण की व्यवस्था कराई जाएगी और समयानुकूल संबंधित परीक्षाएं भी आयोजित कराई जाएंगी। जाहिर है अगर कोई छात्र अपने अंकों में सुधार के लिए स्कूल में परीक्षा देना चाहता है तो वह बाद में दे सकेगा। इससे ऐसे विद्याíथयों के साथ पक्षपात नहीं हो सकेगा, जो परिणाम से संतुष्ट नहीं होंगे। हालांकि उन्हें इसके लिए हालात सामान्य होने तक का इंतजार करना होगा। खबर है कि असंतुष्ट विद्याíथयों के जल्द ही आनलाइन रजिस्ट्रेशन करवाए जाएंगे, ताकि इनकी सटीक संख्या की जानकारी हो सके। वैसे किसी भी विषम हालात से निपटने के लिए एक समिति भी बनाने का निर्णय लिया गया है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि ठीक वैसे ही परिणाम सामने आएं जैसे परीक्षा के बाद आते हैं।

कमिटी गठन से सुनिश्चित होगी पारदर्शिता : छात्रों के मूल्यांकन का यह फार्मूला कितना संतुलित है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 12वीं कक्षा की परीक्षाओं के अंकों के मूल्यांकन के लिए सीबीएसई ने स्कूल स्तर पर पांच सदस्यीय शिक्षकों की कमिटी के गठन का प्रस्ताव दिया है। इसमें संबंधित स्कूल के प्रिंसिपल, 12वीं कक्षा को पढ़ाने वाले दो वरिष्ठ शिक्षक और पड़ोसी स्कूल के शिक्षकों को भी शामिल किया जाएगा। कमिटी की जिम्मेदारी छात्रों के लिए निष्पक्ष परिणाम जारी करने की रहेगी। वहीं विशेष अनुबंध पर बाहर से भी शिक्षक बुलाए जा सकेंगे, जो निष्पक्ष जांच में कमिटी की मदद करेंगे। परिणाम को तैयार करने के लिए कमिटी अलग से आइटी क्षेत्र के एक व्यक्ति की भी सहायता ले सकती है। इससे मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहेगी।

कंपार्टमेंट का नया फार्मूला चौंकाने वाला : नए फार्मूले के तहत जो विद्यार्थी एक विषय में फेल होंगे उन्हें कंपार्टमेंट की श्रेणी में रखा जाएगा। मुख्य परिणाम जारी होने के बाद कंपार्टमेंट परीक्षा होगी। जो विद्यार्थी एक से अधिक विषय में फेल होंगे उन्हें अनिवार्य रूप से रिपीट की श्रेणी में रखा जाएगा। यानी उन्हें परीक्षा फिर से देनी होगी। यदि किसी विद्यार्थी ने 12वीं की कोई भी आंतरिक परीक्षा नहीं दी है तो उसके लिए स्कूल अलग से कोई परीक्षा आयोजित नहीं करेगा। बल्कि संबंधित कमिटी छात्र के 10वीं और 11वीं के अंकों के आधार पर ही 12वीं कक्षा में प्रदर्शन का मूल्यांकन करेगी। छात्रों के 11वीं और 12वीं कक्षा के अंकों का हर स्कूल अपने पिछले रिकार्ड के आधार पर मानकीकरण करेगा। उसी के अनुसार कमिटी द्वारा हर छात्र के आंतरिक अंक उचित और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत बढ़ाए या घटाएं जाएंगे। यदि स्कूल परिणाम तैयार करने में निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया का पालन नहीं करता तो सीबीएसई द्वारा उसकी मान्यता भी खत्म की जा सकती है। या फिर ऐसे स्कूलों पर आíथक दंड लगा सकती है। 12वीं बोर्ड के रिजल्ट जारी होने तक स्कूलों को सीबीएसई की नीतियों का पालन सुनिश्चित करना होगा। साफ है कि इससे स्कूलों की मनमानी पर काफी हद तक नियंत्रण रखने की कोशिश की गई है।

मेधावी छात्रों पर संभावित असर : निश्चित ही 12वीं के करोड़ों छात्रों की स्वास्थ्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बोर्ड परीक्षाएं रद करने का निर्णय स्वागत योग्य है। हालांकि यह भी उतना ही सच है कि नया फामरूला आने वाले दिनों में छात्रों पर और देश की परीक्षा प्रणाली पर कई तरह से असर दिखाएगा। माना जा रहा है कि इस फामरूले से मेधावी विद्याथियों पर असर हो सकता है। ऐसे छात्रों को भी इससे मायूसी हो सकती है जो साल भर उदासीन रहते हैं, लेकिन बोर्ड जैसी महत्वपूर्ण परीक्षों के समय सक्रियता दिखाते हैं। सर्व स्वीकार्य रूप से 12वीं की बोर्ड परीक्षा बच्चों के करियर के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इसी दौरान पता चलता है कि वे आगे की पढ़ाई को कितना और किस रूप में समझ पाएंगे। एक तरह से उनका आगे का करियर इसी कक्षा में किए गए मेहनत पर निर्भर करता है। दरअसल यह एक स्क्रीनिंग स्टेज होता है। बहुत संभव है कि जिन बच्चों की 11वीं की परीक्षा बेहतर नहीं हुई होगी इस बार के मूल्यांकन पर उसका गहरा प्रभाव पड़ेगा।

स्कूलों की बढ़ी भूमिका: कुल मिलाकर छात्र हित में लिया गया यह ऐतिहासिक फैसला बदलती शिक्षा के अनुरूप है। इससे मौजूदा शिक्षा की प्रणालीगत खामियां भी दूर होंगी। और भविष्य में परिस्थितिजन्य हालातों में बेहतर विकल्प की तलाश की जा सकेगी। सरकार और अदालत ने अपने दायित्वों का निर्वहन कर दिया है। अब स्कूलों को निष्पक्ष और न्यायपूर्ण ढंग से परिणाम निकालने के इस तरीके को आगे बढ़ाना होगा। तभी इसे भविष्य में एक नजीर के तौर लिया जा सकेगा। कोरोना के संकट के दौर में स्कूल-कालेज अभी भी बंद हैं। छात्रों की पढ़ाई आनलाइन चल रही है। यह संकट कितने दिनों तक रहेगा और छात्र स्कूल-कालेज जाने से वंचित रहेंगे कुछ कहा नहीं जा सकता। जाहिर है हमें महामारी की वास्तविकता को स्वीकारना होगा। विशेषज्ञ अभी तीसरी लहर की आशंका जता रहे हैं। कोरोना वायरस भी लगातार अपना रूप बदल रहा है।

ऐसे में बहुत जरूरी है कि 2021-22 सत्र में होने वालीं 10वीं और 12वीं की बोर्ड की कक्षाओं और परीक्षाओं के लिए अभी से कोई मानदंड तय कर दिए जाएं। छात्रों के मूल्यांकन और प्रोजेक्ट के संचालन के तौर-तरीकों के साथ ही आनलाइन परीक्षाओं को ध्यान में रख कर जल्द ही एक योजना विकसित करनी चाहिए, ताकि इस साल जो अफरा-तफरी हुई उससे बचा जा सके। इसके अलावा छात्रों की बेहतरी के लिए कई न्यायपूर्ण फैसले की भी दरकार है। 12वीं की मार्कशीट देर से जारी होने से विद्याíथयों को कॉलेज में दाखिला लेने में कोई कठिनाई न हो इसका भी संज्ञान लेना होगा।

साथ ही सरकार जल्दी उन बच्चों के लिए भी निर्णय ले जो 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाएं देना चाहते हैं इससे उनके आगे की राह आसान होगी। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि सीबीएसई ने छात्रों के हक में जो कदम उठाए हैं वे सराहनीय हैं। नि:संदेह परीक्षा परिणाम निकालने का यह फार्मूला भविष्य में हमारे लिए नजीर बनेगा। यह तरीका ताíकक है और इसके आधार पर छात्रों का बहुत हद तक न्यायपूर्ण आकलन भी किया जा सकेगा। वैसे यह बात सही है कि ज्यादातर छात्र फाइनल परीक्षा में बेहतर परीक्षा प्रदर्शन का इंतजार करते हैं। इस मामले में दसवीं की परीक्षा के परिणाम का महत्व कुछ ज्यादा हो सकता है, क्योंकि दसवीं की परीक्षा के प्रति ज्यादातर छात्रों में बहुत गंभीरता होती है।

दसवीं की तुलना में 11वीं की परीक्षा को वे विशेष महत्व नहीं देते हैं। अत: परिणाम निकालने का यह तरीका छात्रों के लिए एक सबक बनेगा। वे अब सभी परीक्षाओं को गंभीरता से लेंगे। जाहिर है जब प्रत्यक्ष कक्षाएं नहीं लगेगी और जब प्रत्यक्ष परीक्षाएं नहीं होंगी तब हर कक्षा और हर छोटी-बड़ी परीक्षा का महत्व बढ़ जाएगा। और हर परीक्षा भविष्य पर भी असर डालेगी।

[शिक्षा मामलों की जानकार]

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