किसानों की समृद्धि में बांस की अहम भूमिका, पर्यावरण अनुकूल जीवन-यापन में भी सहयोगी

केंद्र सरकार की बांसों के जंगल को फिर से पूरे देश में आबाद करने की योजना।
Publish Date:Fri, 23 Oct 2020 01:02 PM (IST) Author: Sanjay Pokhriyal

रेणु जैन। ग्रामीण आबादी को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए केंद्र सरकार अपनी ओर से कई तरीकों से पहल कर रही है। देश के पूवरेत्तर समेत अनेक इलाकों में बांस की व्यापक पैमाने पर खेती होती है, लेकिन उसे पैदा करने वाले किसानों को उसकी पर्याप्त कीमत नहीं मिल पाती है। लिहाजा केंद्र सरकार ने एक प्रशंसनीय पहल करते हुए बांसों के जंगल को फिर से पूरे देश में आबाद करने की योजना बनाई है।

केंद्र सरकार ने 2017 में बांस को वृक्ष की श्रेणी से हटा दिया था। किसान बिना किसी रोकटोक के बांस की खेती कर सकते हैं। सरकार ने किसानों की कमाई बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय बांस मिशन को आगे बढ़ाने के लिए नौ राज्यों में 22 बांस के क्लस्टर की शुरुआत की है। इससे बांस उत्पादक किसानों को फायदा होगा। बांस का धार्मिक महत्व तो अपनी जगह है ही, इसका जादू हरियाली तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इससे कई छोटे मोटे लघु और कुटीर उद्योग जुड़े हैं, जो हमारे भारत समेत दुनिया के अनेक देशों में हमारा डंका बजा सकते हैं। भारत पिछले कुछ वर्षो से अगरबत्ती जैसी वस्तुओं के निर्माण में बेहद आवश्यक सामग्री सीकों के लिए वियतनाम जैसे देश का मुंह ताकता था। इसके चलते अगरबत्ती उद्योग पर गहरा असर पड़ रहा था। भारत चीन और वियतनाम से 35 हजार टन सीकें आयात करता है, जबकि देश के पूवरेत्तर क्षेत्र में उन खास प्रजातियों के बांस उपलब्ध हैं जिनसे अगरबत्ती के लिए सीकी बनाई जाती है।

चीन के बाद भारत बांस उत्पादन में दूसरे नंबर पर है। बांस का उपयोग कई प्रकार के लघु तथा कुटीर उद्योगों में बरसों से होता आ रहा है। बांस की बनी लुगदी कागज उद्योग को नया आधार प्रदान कर रही है। बांस को चीरकर छोटी छोटी तीलियां माचिस, अगरबत्ती, पेंसिल, टूथपिक, चॉपस्टिक जैसे काम में योगदान दे रही हैं। भारत के पूवरेत्तर राज्यों सहित अनेक भागों में बांस का उपयोग नदियों पर पुल बनाने में भी किया जाता है।

पर्यावरण अनुकूल जीवन-यापन में सहयोगी भूमिका : पर्यावरण का मित्र माना जाने वाला बांस प्लास्टिक, स्टील और सीमेंट के स्थान पर भी उपयोग में लाया जाता है, जिसमें बांस की चादर, जाली, खिड़की, दरवाजे, चौखट, शटर, सीढ़ी जैसी अनेक वस्तुएं शामिल हैं। बांस की प्राकृतिक सुंदरता के कारण इसकी मांग सौंदर्य तथा डिजाइन की दुनिया में तेजी से बढ़ रही है। बांस की खपच्चियों को तराशकर तरह तरह की रंगबिरंगी चटाइयां, कुर्सयिां, टेबल, स्टिक्स, चारपाई, डलिया, झूले, मछली पकड़ने का कांटा, लकड़ी के खूबसूरत नक्काशीदार चाकू, चम्मच, खूबसूरत बर्तन, खेती के औजार आदि बनाए जाते हैं, जिनकी भूमिका मानव समाज को प्राकृतिक पर्यावास में रहने और उसी अनुकूल जीवन बिताने का एहसास कराने में सक्षम हो सकता है। हिल स्टेशनों पर बांस के छोटे छोटे झोपड़ीनुमा घर भी बनाने का प्रचलन शुरू हो गया है। इसमें खास बात यह है कि खूबसूरती के अलावा बांस के घर में रहना स्वाभाविक रूप से आपको प्रकृति के निकट होने का एहसास कराता है।

वैदिक काल में बांस का उपयोग कई बीमारियों को ठीक करने में कारगर माना जाता था। बांस का जूस बेहद गुणकारी माना जाता है। हालांकि इसे हासिल करना बहुत ही मुश्किल कार्य है, क्योंकि इसके लिए उच्च श्रेणी के तकनीक की आवश्यकता होती है, लेकिन यदि हमारा देश इसे सक्षम तरीके से कर सके, तो किसानों का बहुत ही भला हो सकता है। भारत के कई राज्यों में बांस की कोंपलों का इस्तेमाल खाद्य पदार्थ के रूप में भी किया जाता है। पूवरेत्तर राज्यों में बांस की कोंपलों से सिरका बनाने का काम सदियों से होता आया है। प्राकृतिक खाद्य पदार्थ के तौर पर पूरी दुनिया में इसकी मार्केटिंग की जा सकती है और इससे किसानों समेत देश की आमदनी भी बढ़ाई जा सकती है।

भारत दुनिया में सबसे समृद्ध प्राकृतिक संपदा वाले देशों में से एक है। बांस एक ऐसी वनस्पति है, जिसके करीब 1,500 उपयोग रिकॉर्ड किए जा चुके हैं। राष्ट्रीय बांस मिशन योजना का मुख्य उद्देश्य भी यही है कि वर्ष 2022 तक किसानों की आमदनी को दोगुना किया जाए। इसके लिए किसानों को बांस की खेती तथा उससे जुड़े लघु तथा कुटीर उद्योगों के लिए 50 प्रतिशत तक अनुदान भी दिया जा रहा है। बांस उत्पादन में अग्रणी होने के बावजूद हमारा देश इसका निर्यात नहीं के बराबर कर पाता है। राष्ट्रीय बांस मिशन को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए अलग अलग तरीकों से प्रावधान किया है जिसका फायदा किसानों को हो सकता है।

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