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उपवास की महिमा

उपवास अर्थात् सूक्ष्म शरीर के पास आकर नजदीक रहने का अभ्यास। हमारा शरीर दो स्तरों पर है-एक है स्थूल शरीर और दूसरा सूक्ष्म शरीर। स्थूल शरीर में अस्थि, मज्जा, खून आदि सत तत्व है। दूसरा शरीर है प्राण-शरीर। सूक्ष्म शरीर प्राणों के बल पर चलता है, और प्राण होते हैं दस-श्रोत्रेंद्रिय बलप्राण, चक्षुरेंद्रिय बलप्राण, स्पर्शेंद्रिय बलप्राण, मन बलप्राण, वचन बलप्राण, काया बलप्राण, सोच्छवास बलप्राण, आयु बलप्राण। ये दस प्राण शरीर की गाड़ी चलाते है। इन प्राणों को चलाने वाला है-सूक्ष्म शरीर। शरीर के साथ दो शरीर और जुड़े है-तैजस शरीर और कार्मण शरीर।

हमारे अंदर ऊर्जा प्रवाहित होती है। मस्तिष्क में करोड़ों सेल्स है, जिनके साथ तैजस शरीर जुड़ा है। कार्मण अर्थात् कर्मो का शरीर। मन, वचन, और काया से जितने पापों को हमने संपन्न किया है वे सारे कर्म शरीर बनकर स्थूल रूप से सूक्ष्म चेतना से जुड़ गए है। तैजस शरीर है प्रकाश-जो गति देता है, जो श्वास लेता है, जो आंखों से ऊर्जा फेंकता है, जो शरीर में चमक देता है। प्राचीन समय में श्रद्धा से ही हम तैजस और कार्मण को कंठस्थ करके बोलते थे। यही सूक्ष्म, तैजस और प्राण शरीर हमें प्रकाश और गति देते है। व्यक्ति प्राण-शरीर को अज्ञान के कारण मुरझा देता है और ज्ञान के कारण फिर खिला देता है। यह तैजस अगर बढ़ जाए तो पाप घट जाएंगे। यदि हमने पापों की मात्रा बढ़ा दी, तो प्राणों का शरीर गंदा हो जाता है। तैजस को बढ़ाकर, कार्मण को फिल्टर करना चाहिए। इसके लिए उपवास बड़ा उपकारी होता है। कम खाने से, सात्विक आहार लेने से ऊर्जा फिल्टर होती जाती है। उपवास से शरीर दुबला होता है, पर शरीर निरोग हो जाता है। आत्मा पर हिंसा और झूठ के द्वारा जिन पापों को संबद्ध करके रखा है उन पापों को साफ करने का मार्ग है-उपवास। यह अंतत: हमें ईश्वर से जोड़ता है। तप से आत्मा साफ होती है, जिसको कहते है निर्जरा। हमारा सिद्धांत होना चाहिए-आवश्यक करो और अनावश्यक को टालो। अनुभूति अगर शांतिमय है तो गरीबी में भी सुख है। और अनुभूति अगर दु:खद है तो सुख-सुविधाएं भी दु:खमय है। 6 [रमेश गुप्ता]

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