Tokyo Olympics 2020: खेलों में भारतीय महिलाओं का जमीं से आसमां तक का सफर....

छोटे से शहर गांव या कस्‍बे से निकली लडकी को अपने पैशन के खेल में आगे बढ़ने के लिए किस तरह की मुसीबतें झेलनी पड़ सकती हैं यह कल्‍पनाओं से परे है लेकिन हमारे देश की मीराबाई चानू जैसी लड़कियां आत्‍मविश्‍वास से आसमान को चूमती हैं।

Sanjay PokhriyalPublish:Sat, 31 Jul 2021 11:31 AM (IST) Updated:Sat, 31 Jul 2021 04:30 PM (IST)
Tokyo Olympics 2020: खेलों में भारतीय महिलाओं का जमीं से आसमां तक का सफर....
Tokyo Olympics 2020: खेलों में भारतीय महिलाओं का जमीं से आसमां तक का सफर....

यशा माथुर, अंशु सिंह। एक छोटी-सी दिखने वाली लड़की जो मणिपुर के छोटे से गांव नोंगपेक काकचिंग से आती है, बचपन में अपने भाई बहनों के साथ जंगलों से लकडिय़ों के गट्ठर सर पर उठाकर लाती है, तीरंदाज बनने का सपना पालती है लेकिन आखिर में वेटलिफ्टर बन जाती है। अपने खेल करियर के शिखर पर पहुंचती है और वहां बुरी तरह से असफल हो जाती है।

चोट और मानसिक परेशानी झेलती है और अंतत: फिर उबर कर 49 किलो भार वर्ग की श्रेणी में टोक्‍यो ओलिंपिक में 202 किलो भार उठाकर चांदी का तमगा हासिल कर लेती है। असफलता से टूट कर उबरने और बचपन में ढेरों संघर्ष करने पर अपना हौसला नहीं छोडऩे की कहानी है मीराबाई चानू की। हमारा देश है ही ऐसा। यहां जमीन से जुड़ी और विश्व के शिखर पर पहुंचने वाली महिला खिलाडिय़ों की ऐसी कहानियां हैं जो सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि कैसे इन जुझारू लड़कियों ने अपना रास्ता बनाया होगा? कैसे वे संसाधनों की कमी से जूझी होंगी लेकिन लगन को न छोड़कर सफलता के आसमान पर पहुंची होंगी।

अपने मन का सुनकर आई वेटलिफ्टिंग में : आंध्र प्रदेश के छोटे से गांव से निकलकर 2000 के सिडनी ओलिंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली भारत की पहली महिला वेटलिफ्टर कर्णम मल्लेश्वरी के सफर में उतार-चढ़ाव कम नहीं रहे। पांचवीं-छठी कक्षा में थीं, जब पहली बार वेटलिफ्टिंग के बारे में सुना। स्कूल के करीब ही एक सेंटर था, जहां इसका प्रशिक्षण दिया जाता था। लेकिन जब वह वहां पहुंचीं, तो कोच ने साफ कह दिया कि वह वेटलिफ्टिंग नहीं कर सकतीं। कर्णम के बाल मन को यह स्वीकार नहीं हुआ। कर्णम बताती हैं, 'कोई और कैसे मेरे खेलने अथवा न खेलने का निर्णय ले सकता है? मैं भी जिद्दी थी। एक निजी जिम में प्रशिक्षण करना शुरू कर दिया। चोरी-छिपे सब चलता रहा। इसके बाद 1990 में जूनियर नेशनल प्रतियोगिता में जाने का अवसर मिला। वहां तीन स्वर्ण पदक जीतने के अलावा नौ नये राष्ट्रीय रिकार्ड बनाए। फिर कभी पीछे मुड़कर देखना नहीं हुआ।'

कर्णम के पिता रेलवे पुलिस में थे और मां गृहिणी। घर की आर्थिक स्थिति अच्‍छी न होने के बावजूद उन्होंने बेटी को हमेशा खेलने के लिए प्रोत्साहित किया। पिता की मृत्यु के बाद हालांकि कर्णम ने खेल से संन्यास ले लिया। इस समय वह दिल्ली स्पोट्र्स यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर हैं। वह कहती हैं, 'खेल में लड़के-लड़कियां काफी अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। मीरा बाई चानू की ओलिंपिक में जीत से भी देश में वेटलिफ्टिंग के प्रति दिलचस्पी विकसित होगी, इसकी काफी उम्मीद है। हालांकि जमीनी स्तर पर और अधिक बदलाव की आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में ट्रेनिंग की सुविधाएं बढ़ानी होंगी। इस समय हमारी यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने वाले बच्चे न सिर्फ विश्वस्तरीय प्रशिक्षण का लाभ ले सकते हैं, बल्कि विशेषज्ञ कोच की निगरानी में ओलिंपिक जैसे खेलों की तैयारी भी कर सकते हैं।'

बाक्सिंग ने दिया नाम और आत्मविश्वास : आठ भाई-बहनों में छठे नंबर की लैशराम सरिता को बचपन में बाक्सिंग की कोई जानकारी नहीं थी। खेल में भविष्य बनाया जा सकता है, यह भी मालूम नहीं था। वह तो मणिपुर के एक छोटे से गांव थौबाल में रहती थीं, जहां अधिकतर लोग खेती करते हैं। उनके पिता भी किसान थे, जिन्हें उन्होंने मात्र 13 वर्ष की आयु में खो दिया था। मां ने अकेले सभी बच्चों की परवरिश की। सरिता बताती हैं, 'मां ने कभी लड़की व लड़के में भेदभाव नहीं किया। इसलिए जब भाई ने ताइक्वांडो खेलने के लिए कहा, तो कोई दिक्कत नहीं आई। कुछ दिन उसमें हाथ आजमाया। फिर कुंगफू सीखने लगीं। कुंगफू के प्रशिक्षण के दौरान ही हाथों के मूवमेंट को सीखने के लिए कोच एक बाक्सिंग एकेडमी में लेकर गए। इस प्रकार 15-16 वर्ष की आयु में पहली बार मैंने बाक्सिंग के बारे में जाना। शुरू में तो खेल को देखकर डर गई थी।

बाक्सरों के शरीर से निकलने वाले लाल रंग के पसीने (रक्त) को देख लगा कि यह कितना खतरनाक खेल है। लेकिन कुंगफू में सुधार लाने के लिए मुझे एक हफ्ते बाद इसे सीखने जाना पड़ा। खेलने पर बाक्सिंग में दिलचस्प जागी। सरिता रोज सुबह तीन-साढ़े तीन किलोमीटर पैदल और बस से प्रैक्टिस ग्राउंड पर पहुंचतीं। तब प्रदेश में विद्रोहियों का आंदोलन भी चलता था। शहर में आए दिन कर्फ्यू लग जाता था। उस कठिन माहौल में भी उन्होंने हिम्मत को टूटने नहीं दिया। उनकी मेहनत का सुनहरा परिणाम वर्ष 2001 में बैंकाक में हुए एशियन बाक्सिंग चैंपियनशिप में देखने को मिला, जब उन्होंने लाइट वेट क्लास में सिल्वर मेडल प्राप्त किया। 2006 में वह वर्ल्‍ड चैंपियन बनीं और उसके आठ वर्ष बाद 2014 के ग्लासगो कामनवेल्थ गेम्स में 60 किलोग्राम श्रेणी में सिल्वर मेडल जीतकर देशवासियों का मान बढ़ा दिया। वह ऐसी बाक्सर हैं, जिन्होंने चार अलग-अलग वर्गों में स्वर्ण पदक हासिल किया है। सरिता ने बताया, 'बाक्सिंग ऐसा खेल है, जो आपमें एक अद्भुत आत्मविश्वास भरता है। मैंने कभी सोचा नहीं था कि छोटे से गांव से निकलकर दुनिया के अलग-अलग देशों में खेलूंगी। शादी के बाद या बच्चा होने के बाद भी खेल जारी रहेगा। लेकिन परिवार एवं पति के समर्थन से मैं ऐसा कर पाई।'

लड़के बोलते लड़की को नहीं खिलाएंगे : लड़कों से लड़-लड़ कर नगंगोम बाला देवी ने फुटबाल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी महत्वपूर्ण जगह बनाई। वे पांच साल तक भारतीय महिला फुटबाल टीम की कप्तान रहीं। हाल ही में वे स्काटिश फुटबाल क्लब रेंजर्स एफसी के साथ 18 महीने का अनुबंध साइन कर काफी चर्चा में आईं। इस उपलब्धि से वह पहली भारतीय प्रोफेशनल फुटबालर बन गईं। बालादेवी जब दस साल की थीं तो मणिपुर के एक स्‍थानीय क्लब में उन्होंने लड़कों को फुटबाल खेलते देखा। उस समय कोई लड़की फुटबाल नहीं खेल रही थी। लेकिन उन्हें लगा कि वह भी इनकी तरह फुटबाल खेलें। फिर क्या था वह अपने मिशन में जुट गईं और फुटबाल को ही अपना जुनून बना लिया।

मणिपुर के बिष्णुपुर जिले की रहने वाली बालादेवी बताती हैं, 'पहले कुछ पता नहीं था। जब लड़कों के साथ फुटबाल खेलने जाती तो कुछ लड़के बोलते कि लड़की को नहीं खिलाएंगे और कुछ कहते कि ये अच्छा खेलती है इसको खिलाएंगे। उनके साथ लड़-लड़कर खेलते हुए मैं आगे बढ़ी। एक साल में ही मेरा अंडर-19 में सेलेक्शन हो गया। इसके बाद स्टेट टीम में आ गई। जब स्टेट टीम जीती तब मेरी उम्र कम थी। 2014 में मैं नेशनल टीम की कप्तान बनी।' किसान पिता की इस बेटी के पास सुविधाओं की काफी कमी थी लेकिन इसने मात्र पंद्रह साल की उम्र में भारतीय टीम के लिए अपना पहला मैच खेल लिया और अपने आसमान की ओर कदम बढ़ा दिए। बाला देवी कहती हैं कि उन्हें कई बार नकारात्‍मक बातें सुनने को मिलती हैं लेकिन इनके चलते वे रूकती नहीं है बल्कि इससे उनके अंदर ख़ुद को साबित करने की चाह और मजबूत हो जाती है। भले ही 15 साल की उम्र से खेल रही हैं वह लेकिन अब भी हर एक मैच को अपना पहला मैच मानकर ही खेलती हैं।

शाट्र्स पहनने की थी मनाही : महिला कबड्डी वर्ल्‍ड कप टीम की कप्तान रही ममता पुजारी ने जब कबड्डी खेलना शुरू किया तो उन्‍हें शाट्र्स पहनने से परहेज था लेकिन वे सलवार और कुर्ते में खेलीं और चैंपियन के सफर पर निकल पड़ी। कहती हैं ममता, 'जब मैंने कालेज ज्वाइन किया तो मुझे कबड्डी खेलने के लिए कहा गया। शुरू में तो मैंने मना कर दिया क्योंकि मुझे शाट्सर् पहनने से परहेज था लेकिन मुझसे कहा गया कि तुम सूट पहन कर ही खेल लेना। मैं बहुत अच्छा खेली। मुझे चोट भी लगी थी। खेलकर जब लौटी तो घरवालों ने बोला यह क्या करके आई है। नहीं खेलनी है कबड्डी। बारहवीं के बाद उनका शादी करने का विचार था। जब कोच घर आए तो उन्होंने समझाया कि इसे खेलने दें। हम इसे मुफ्त में शिक्षा भी दिलवाएंगे। घर की स्थिति ऐसी नहीं थी कि मुझे आगे पढ़ा सकें। भाई भी दसवीं के बाद काम पर लग गया। घरवाले पढ़ाई और जॉब मिलने की उम्मीद में मान गए। 2006 में मैंने रेलवे ज्वाइन किया। भारत का भी प्रतिनिधित्व किया। 13 साल से लगातार खेल रही हूं। रेलवे के लिए 10 और भारत के लिए 11 गोल्ड जीते। वल्र्ड कप की कैप्टन थी मैं। दो एशियन गेम्स खेले। 2014 में अर्जुन अवार्ड मिला।'

लोग पूछते लड़की होकर इस खेल में क्यों आई : दिल्ली स्‍पोर्ट्स यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर सिडनी ओलिंपिक में कांस्य पदक विजेता वेटलिफ्टर कर्णम मल्लेश्वरी ने बताया कि मैं एक सामान्य परिवार से आती हूं जहां खुद की मेहनत से ही सब कुछ हासिल करना पड़ता था। हम किसी और पर निर्भर नहीं रह सकते थे और न ही किसी के समर्थन की उम्मीद थी। इसलिए 11 वर्ष की उम्र से, जब से खेलना शुरू किया, तब से कभी किसी पर निर्भर नहीं रही। अपनी मेहनत पर विश्वास रखा। वेटलिफ्टिंग को चुनने का कारण सिर्फ यह था कि स्कूल के पास ही इसकी ट्रेनिंग होती थी। मुझे लोगों से यह जरूर सुनने को मिला कि लड़की होकर क्यों इस क्षेत्र को चुना? लेकिन मैं हमेशा अपने मन की सुनती आई हूं। 1994 तक कोई लड़की विश्व चैंपियन नहीं बनी थी। मैंने 1994 एवं 1995 में 54 किलोग्राम श्रेणी में पहला वल्र्ड टाइटल जीता। उसके बाद 1998 के एशियन गेम्स (बैंकाक) में मैंने सिल्वर मेडल जीता। हालांकि, मैं न तो सफलता और न ही असफलता से प्रभावित होती हूं। जीवन में हमेशा संतुलन बनाकर चली हूं।

अच्छे जूते भी नहीं होते, पर जूनून कम नहीं हुआ : पद्मश्री बास्केटबाल खिलाड़ी प्रशांति सिंह ने बताया कि आप सोच लीजिए कि बनारस जैसी छोटी जगह पर तीस साल पहले कैसी सुविधाएं हमें मिली होंगक? मेरा खेल इनडोर है लेकिन बनारस में रहते मैंने यह गेम आउटडोर में ही खेला। जब मैं दिल्ली आई तब मैंने पहली बार इनडोर ग्राउंड देखा। ज्यादा संघर्ष तो मेरी मां का रहा। मेरे पिता बैंक में थे और मम्मी अध्यापिका थीं। उन्होंने हमारे लिए नौकरी छोड़ दी लेकिन काफी पढ़ी-लिखी होने के कारण वे चाहती थीं कि मेरे बच्चे कुछ बन कर दिखाएं। वे हमेशा कहती पढ़-लिख कर कुछ बनो। हम पांच बहनें हैं। हम पास के सेंटर में खेलने लगे जो लड़कों का सेंटर था। मेरी मां को आसपास के लोग कहते कि लड़कियों को इस तरह से खेलने के लिए मत भेजो। लड़कों के साथ खेलती हैं, इन्हें चोट लग जाएगी, आपको डर नहीं लगता। पापा अकेले कमाने वाले थे। हमारे पास संसाधन कम थे, विकल्प कम थे लेकिन हम फोकस्ड थे।

लाइट नहीं भी होती तो हम थककर मच्छरदानी में सो जाते। अलग जुनून था। मेरी मां शिक्षित थीं इसलिए किसी की बातों में नहीं आती थीं। बाल छोटे रखती थीं ताकि हम ज्यादा सुंदर न लगें और लोग हमें देखकर चकित न हों। जब हम शाम को शॉट्स पहन कर, खेल कर घर आते तो लोग बातें बनाते। हम खेलते-खेलते काले हो जाते थे। कई बार हमारे पास अच्छे जूते नहीं होते थे लेकिन हम खेल पर ही ध्यान रखते। भारतीय बॉस्केटबाल टीम की कप्तान रहते हुए मुझे पद्मश्री पुरस्कार मिला। मैं भारत की पहली खिलाड़ी रही जिसे बास्केटबाल में पद्मश्री पुरस्कार मिला। मैं भारतीय बास्केटबाल टीम के लिए अर्जुन पुरस्कार के लिए चुनी जाने वाली उत्तर प्रदेश की पहली बास्केटबाल खिलाड़ी हूं। मुझे राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक पुरस्कार मिले हैं और उत्तर प्रदेश सरकार ने भी प्रतिष्ठित महारानी लक्ष्मी बाई वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया है। मैं पांच बहनों में तीसरे नंबर पर हूं। हम पांचों बहनें प्रियंका, दिव्या, प्रशांति, प्रतिमा और आकांक्षा बास्केटबाल खिलाड़ी हैं। हमने मुश्किलों से जूझ कर नाम कमाया है। हमारा एक भाई है विक्रांत, जो फुटबाल खिलाड़ी है।

घर बेचकर बेटी को तीरंदाज बनाया : कोमालिका की मां लक्ष्मी बारी ने बताया कि हम झारखंड के जमशेदपुर के एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं। कोमालिका (तीरंदाजी की अंतरराष्‍ट्रीय खिलाड़ी) के पिता एलआइसी के एजेंट हैं, छोटी सी दुकान है और मैं आंगनबाड़ी सेविका हूं। कोमालिका ने कभी सोचा नहीं था कि वह तीरंदाजी में भविष्य बनाएंगी। हम तो उन्हेंं अच्छी शिक्षा दिलाना चाहते थे। हमेंं अंदाजा नहीं था कि यह खेल के जरिये संभव हो सकेगा। वर्ष 2012 की घटना है। जमशेदपुर के आइएसडब्ल्यूपी ट्रेनिंग सेंटर में कोच सुशांतो पात्रो बच्चों को तीरंदाजी सिखाया करते थे। कोमालिका ने भी वहां जाना शुरू किया। वह साइकिल से घर से करीब 18 किलोमीटर दूर ट्रेनिंग सेंटर जातीं। लेकिन जल्द ही कोच को उनमें छिपी प्रतिभा का अंदाजा हो गया। चार साल की ट्रेनिंग के बाद आखिरकार 2016 में टाटा आर्चरी एकेडमी में कोमालिका का दाखिला हो गया। इससे उन्हें न सिर्फ गुणवत्तापरक शिक्षा, बल्कि विश्व स्तरीय प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर मिला।

हमने कल्पना नहीं की थी कि एक दिन बेटी और हमारे सपने ऐसे पूरे होंगे। वह भारतीय महिला रिकर्व दल का हिस्सा बनेंगी। लेकिन उसने काफी मेहनत की। फोकस रही। इसका परिणाम यह हुआ कि 2019 में मैड्रिड में आयोजित विश्व युवा आर्चरी एवं कैडेट चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक हासिल किया। इसके बाद, देहरादून में हुए 41वें एनटीपीसी जूनियर नेशनल आर्चरी चैंपियनशिप में गोल्ड जीता। कुछ समय पहले ग्वाटेमाला में संपन्न आर्चरी वल्र्ड कप स्टेज 1 में भी उसने स्वर्ण पदक प्राप्त किया। इसके बाद, पेरिस में हुए वल्र्ड कप स्टेज-3 में वह गोल्ड जीतने वाली टीम का हिस्सा थीं। हालांकि, ओलिंपिक के लिए वह क्वालीफाई नहीं कर सकी। इसका उसे थोड़ा दुख है। हमने उसे अपना आत्मविश्वास बनाए रखने को कहा है, क्योंकि खेल में जीत और हार तो होती ही रहती है। तीरंदाजी में प्रयोग होने वाले उपकऱण महंगे होते हैं। शुरुआती दिनों में कोमालिका परेशान होती थीं कि पिता (घनश्‍याम बारी) उनकी जरूरतें कैसे पूरी करेंगे। लेकिन पिता भी कहां मानने वाले थे। उन्होंने अपना घर बेचकर पैसे का इंतजाम किया और बेटी को जरूरी उपकरण लाकर दिए। उन्‍हें भी इस बात का पूरा भरोसा है कि उनकी बेटी आगे जरूर बेहतर प्रदर्शन करते हुए मेडल जीतेगी।