सूनी कैंटीन, ऑडिटोरियम में पसरा है सन्नाटा; कोरोना काल में यही रह गई है डीयू की पहचान

कुछ ऐसे ही दृश्य होते थे। उत्साह होता था। कैंपस आने के बहाने होते थे। कभी फार्म लेने कभी कटआफ देखने फार्म जमा करने तो कभी फीस भरने। हर बार नए दोस्त बन जाते थे। अब दो साल से कोरोना संक्रमण ने जीवनशैली को बदल दिया है । जागरण आर्काइव

Sanjay PokhriyalSat, 31 Jul 2021 03:44 PM (IST)
कालेज लाइफ को जीने का अंदाज गायब हो गया। जागरण आर्काइव

नई दिल्‍ली/ गुरुग्राम प्रियंका दुबे मेहता। ये उन दिनों की बात है। जब मीलों का सफर तय कर दिल्ली आया करते थे। सपनों की पोटली सिरहाने लिए दिल्ली नापने चले आया करते थे। नार्थ कैंपस के किसी कालेज में अंकों की विवशता में किसी कम पसंद विषय में भी दाखिला ले लिया करते थे। चिलचिलाती धूप में कतार में खड़े होकर मिशन एडमिशन का गणित समझा करते थे। सेशन के पहले दिन कालेज के गेट पर इतराते हुए, एक कदम आत्मविश्वास का तो दूसरा घबराते हुए आगे बढ़ाते थे।

दिल्ली विवि एक शैक्षणिक इकाई ही नहीं बल्कि एक अलग संसार है। सांस्कृतिक विविधता का मंच, सपनों को पूरा कर लेने वाला आकाश और नए अनुभवों का जहान है। आफलाइन दाखिला प्रक्रिया की वह जिद्दोजहद और आनलाइन की सुगमता, यहां की संस्कृति, कैंटीन की गपशप और आयोजनों के उन अनुभवों को वह विद्यार्थी नहीं ले सके हैं जिन्होंने पिछले दो वर्षों में डीयू में दाखिला तो लिया लेकिन कालेज का मुंह नहीं देख सके।

दिल्ली यूनिवर्सिटी खामोश दीवारें हैं। मौन हैं क्लास रूम। मैदान में सन्नाटा है। गुमसुम हैं कैंटीन के चाय और समोसा। कभी चटख रंगों के पोस्टर से सजी रहने वाली दीवारें उदासी से भरी हैं। अब कोई इन पर नई बात नहीं कहता। नया नोटिस एक नए रूप, आकार में दमखम नहीं भरता। पोस्टर नहीं चिपकते। हो-हल्ला तो दो साल से मानो मौन साधना में है। उन छात्रों से पूछो जरा उन पर क्या गुजरी है जिन्होंने बड़े सपने को पूरा करने के लिए यहां दाखिला लिया। डीयू में दाखिला मतलब आपका स्टेटस सिंबल तो बनता है। नार्थ कैंपस में दाखिला हो जाए तो कहना ही क्या? छात्र के पांव कुछ दिन तो उत्साह के मारे जमीं से दो फीट ऊपर ही रहते हैं। लेकिन दो साल से ये सब कोरोना महामारी के अंधेरे में विलुप्त हो गया। पिछले वर्ष दाखिला लेने वाले छात्र दूसरे वर्ष में आ गए लेकिन कालेज की शक्ल तक नहीं देखी। जिस कैंपस में आने को, यहां की चकाचौंध में जीने को उतावले थे। अब तो घर बैठे ही क्लास चलती हैं, पढ़ाई होती है। न कोई क्लास में वेलकम और न कोई फ्रेशर पार्टी। उफ, ये कोरोना कैसी रूखी सूखी क्लास का टाइम आ गया। लेडी श्रीराम कालेज की छात्रा उज्जैन की रागिनी जैन का कहना है कि उन्होंने ग्यारहवीं कक्षा से ही बड़े ख्वाब सजाए थे कि वे डीयू जाएंगी और वहां के विस्तार से अपने भविष्य को आकार देंगी लेकिन पूरा सत्र ऐसे ही निकल गया और वे घर पर बैठकर केवल विषयों के अध्ययन से अधिक कुछ नहीं कर पाईं।

मिस कर रहे हैं सोसायटी फ्लेवर : द्वितीय वर्ष के छात्र राजीव राघव को दुख है कि वे अपने शैक्षणिक जीवन के सबसे महत्वपूर्ण और खूबसूरत पड़ाव को नहीं जी पाए। दो वर्ष पहले दाखिला लिया और अभी कालेज को समझ ही रहे थे कि होली की छुट्टी हो गईं और उसके बाद से अभी तक कालेज नहीं लौट पाए। डीयू की राजनीति, स्ट्रीट फूड, घूमना और सबसे बड़ी चीज जो वे ही नहीं बल्कि अन्य छात्र भी सबसे अधिक मिस कर रहे हैं और वह है डीयू की सोसायटीज और वहां का माहौल। इन सोसायटीज के आयोजन और सेमिनार ही वह विशेषताएं हैं जो डीयू के विद्यार्थियों का व्यक्तित्व गढ़कर उन्हेंं भीड़ से अलग खड़ा करते हैं।

दाखिले की दौड़, वह आनंद : आज तो दाखिले आनलाइन हो गए हैं लेकिन कुछ ही वर्षों पहले दिल्ली विश्वविद्यालय दाखिले के महाकुंभ सा रूप लिए देशभर से आए विद्याॢथयों और उनकी संस्कृतियों की खुशबू से महक उठता था। पहले फार्म भरने की गहमागहमी और फिर कटआफ लिस्ट की वह प्रतीक्षा और उत्सुकता। फिर शुरू होता था कागजात सत्यापन से लेकर उन्हेंं जमा करवाने तक का सिलसिला। कैंपस में इसी आने-जाने के बीच छोटी-छोटी मुलाकातों के साथ दोस्ती के नए बीज भी फूटने लगते थे। हफ्तों इन कार्यों में बिताने के बाद विद्यार्थी को मिलता था कालेज का विद्यार्थी होने का वह बहुप्रीतीक्षित गौरव। किरोड़ीमल कालेज से फिजिक्स में मास्टर डिग्री कर रहीं मुस्कान यादव कालेज के पहले दिन को याद करते हुए बताती हैं कि जब उन्होंने डीयू में 2017 में स्नातक प्रथम वर्ष में दाखिला लिया था तब कैसे मन में मिश्रित भावनाओं का समंदर उमड़ रहा था। वे बताती हैं कि आफलाइन दाखिलों के दौर में रात को एक बजे वेबसाइट पर कटआफ आती थी और सुबह-सुबह दिल्ली के लिए निकल जाते थे। दाखिले के लिए विवि में प्रवेश करते हैं तो भावनाओं के कई रंग दिखते थे। किसी के चेहरे पर खुशी है, किसी के परेशानी, तो कोई उहापोह की स्थिति में और कोई संकोच का भाव लिए नजर आता था। कोई कुछ अंकों से चूक गया, किसी का लिस्ट में नाम आया तो रजिस्ट्रेशन की भागदौड़ की लंबी प्रक्रिया और समयाभाव। लिस्ट में नाम आने के बाद भी डर लगा रहता था कि कागजात पूरे होंगे या नहीं। आनलाइन के दौर के विद्यार्थी इन चीजों का अनुभव नहीं ले पाए जो कि कालेज लाइफ की सबसे महत्वपूर्ण होता है।

दिल्ली आने की खुशी : दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला लेना महज उच्चतर शिक्षा में जाना नहीं, बल्कि एक नई दुनिया में कदम रखने जैसा था। विद्यार्थी यहां आते थे तो लगता था कि दाखिलों के साथ-साथ दिल्ली भ्रमण भी कर पा रहे हैं। एलएसआर से स्नातक कर रहीं असम की छात्रा आसिन का कहना है कि जब वे पहली बार दिल्ली आईं तो लगा, जैसे किसी नए ग्रह पर कदम रख दिया हो। यहां की खूबसूरती, भव्यता और कालेजों में हरियाली की चादर देखकर मन खुश था लेकिन उन्हेंं इस बात का डर था कि क्या उन्होंने अपने अंक सही जोड़े थे, क्योंकि हर कालेज का अपना अलग क्राइटेरिया होता था और अधिकतर ऐसा होता था कि विवि की गणना विद्याॢथयों की गणना से भिन्न होती थी। आसिन कटआफ लिस्ट निकलने के पहले आ गई थीं और दो हफ्ते तक अपने माता-पिता के साथ होटल में रुकी थीं। जब दाखिला हुआ तो उन्हें लगा मानो उनके पांव जमीन पर नहीं टिक रहे थे। उनकी बहन कुमुद के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ। उन्होंने दाखिला लिया लेकिन अभी तक कालेज की कक्षा तक नहीं देखी है।

फ्रेशर्स जश्न की वो गर्मजोशी : दाखिले के बाद कालेजों में पहुंचे विद्यार्थियों की चाल और उनके चेहरों पर फैली मुस्कान उनकी लक्ष्य प्राप्ति की गौरवमयी कहानी कहती है। उनका स्वागत और वरिष्ठ विद्यार्थियों द्वारा उनका मार्गदर्शन, परिचय का सिलसिला महीनों की खुमारी दे जाता था। जाकिर हुसैन महाविद्यालय में एमए द्वितीय वर्ष के जोधपुर, राजस्थान के छात्र महेंद्र सिंह बताते हैं कि जब पहले दिन कालेज पहुंचे तो उनके लिए सब नया था। वे बताते हैं कि दाखिले के बाद फ्रेशर्स और चुनाव एक साथ होते थे। ऐसे में डीयू पूरी तरह से संस्कृति और प्रतिस्पर्धा के सौम्य रंगों में रंग जाता था। शिक्षक भी उसी माहौल में ढल जाते थे और वे कक्षाएं न लेकर फ्रेशर पार्टी की तैयारी का समय दे देते थे।

पिछले सत्र से विद्यार्थी उस सामाजिक और सांस्कृतिक माहौल से रूबरू नहीं हो पा रहे हैं। फ्रेशर, फेस्ट और फेयरवेल का ही रंग नहीं देखा तो क्या देखा। इनमें संस्कृतियों का अमलगम तैयार होता था तो जो इंद्रधनुषी रंग बिखरता था, उसके आगे सब फीका होता था। पार्टी की एक खास बात होती थी कि हर कोई अपने प्रदेश की पारंपरिक वेषभूषा में आता था। ऐसे में लोग वेशभूषा से पहचान कर दूसरे राज्यों के विद्यार्थियों से दोस्ती का हाथ बढ़ाते थे। मिनी इंडिया दिखाते हुए की संस्कृतियों के यह रंग नए विद्यार्थियों को मयस्सर ही नहीं हुए। पीजीडीएवी कालेज में स्नातक के पहले वर्ष में पढ़ रहे मेरठ के अभिषेक सोम का कहना है कि यह पूरा वर्ष उन्हें लगा ही नहीं कि उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है। न तो माहौल देखा, न कक्षाओं की पढ़ाई और न फेस्ट के रंग।

कब लौटेगी रंग बिरंगी जिंदगी : आज आनलाइन कक्षाएं कर रहे विद्यार्थियों में तनाव हावी हो रहा है तो इसका कारण यह नहीं कि उन्हेंं आनलाइन कक्षाओं में पढऩा पड़ रहा है। इसका कारण यह है कि विद्यार्थी डीयू के उस रंग से रूबरू नहीं हो पा रहे हैं जो कि पढ़ाई के बीच फेस्ट तो कभी सांस्कृतिक और कभी राजनीतिक गतिविधियों के रूप में बिखरते थे। महेंद्र बताते हैं कि डीयू में तीन से चार महीने में कुछ न कुछ होता रहता था। ऐसे में विद्यार्थी अपने शौक को जीते थे तो पढ़ाई का इतना तनाव नहीं रहता था। ऐसे में पढ़ाई का दबाव महसूस नहीं होता था। कुछ समय से विद्याॢथयों में स्ट्रेस लेवल बढ़ रहा है तो उसका कारण यह है कि उन्हेंं पढ़ाई से ब्रेक नहीं मिल रहा है।

गुरु-शिक्षक का वह समीकरण : कक्षा में पढ़ाते हुए शिक्षकों अनुभव साझा करते थे, विद्यार्थी अपने विचार रखते थे। एक व्यक्तिगत रिश्ता बन जाया करता था। प्रथम वर्ष के छात्र अभिषेक का कहना है कि आज आनलाइन में वह चीजें बिलकुल खत्म हो गई हैं। परस्पर विचारों और अनुभवों का आदान-प्रदान नहीं हो पाता। अब विद्यार्थी और शिक्षक केवल पठन-पाठन से ही मतलब रखते हैं। अब केवल पढ़ाई की बातें होती हैं।

कुछ ऐसे ही दृश्य होते थे। उत्साह होता था। कैंपस आने के बहाने होते थे। कभी फार्म लेने, कभी कटआफ देखने, फार्म जमा करने तो कभी फीस भरने। हर बार नए-नए दोस्त भी बन जाते थे। अब दो साल से कोरोना संक्रमण ने जीवनशैली में ऐसा बदलाव किया कि दाखिला से लेकर क्लास और परीक्षा सब आनलाइन ही हो गया मानो कालेज लाइफ को जीने का अंदाज गायब हो गया। जागरण आर्काइव

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