समय के साथ विलुप्त हो रहा है जामा मस्जिद के निकट मुगलकालीन ‘अदब का संसार’ उर्दू बाजार

उर्दू बाजार स्थित अपनी दुकान में किताबों को दिखाते निजामुद्दीन। फोटो- जागरण

दरियागंज से ऐतिहासिक जामा मस्जिद को जाने वाली सड़क कभी किताबों की खुशबू से महका करती थी। सड़क से लगी दुकानों में किताबों का संसार खुलता था। इसके तले शेरो-शायरी किस्सागोई धार्मिक ज्ञान व विमशरें का दौर भी चलता रहता था।

Vinay Kumar TiwariThu, 04 Mar 2021 12:58 PM (IST)

नेमिष हेमंत, नई दिल्ली। दरियागंज से ऐतिहासिक जामा मस्जिद को जाने वाली सड़क कभी किताबों की खुशबू से महका करती थी। सड़क से लगी दुकानों में किताबों का संसार खुलता था। इसके तले शेरो-शायरी, किस्सागोई, धार्मिक ज्ञान व विमशरें का दौर भी चलता रहता था।

चायखानों में देश के मशहूर शायर, साहित्यकार, राजनेताओं, शिक्षाविदों और धार्मिक विद्वानों का जमावाड़ा लगा रहता था। पर समय के साथ अब जामा मस्जिद के नजदीक स्थित मुगलकालीन ‘अदब का संसार’ विलुप्त होने लगा है। वर्ष पुराने जामा मस्जिद के सामने स्थित इस बाजार में बची हैं अब मात्र चंद किताब की दुकानें। 

उर्दू बाजार 

मटिया महल में स्थित यह बाजार अब भी उर्दू बाजार के नाम से जाना जाता है, पर इस बाजार में बढ़ते रेस्तरां व उनसे निकलती मुगलई व्यंजनों की खुशबू के आगे किताब घरों का वजूद मिटने लगा है। कभी इस बाजार में 80 से अधिक किताब की दुकानें हुआ करती थीं। तब यहां अधिकतर प्रकाशन हाउस थे। छपाईखाना भी यहीं था, पर अब मुश्किल से सात-आठ दुकानें बची है। 

ऐसा नहीं है कि पहली बार इस बाजार पर संकट आया हो, इसके पहले बंटवारे के समय भी यह करीब-करीब उजड़ गया था, क्योंकि बंटवारे में इस इलाके में काफी उथल-पुथल मची थी। काफी लोग यहां से पाकिस्तान चले गए थे। जानकार कहते हैं कि किताबों का यह उर्दू बाजार मुगल सल्तनत के जमाने से है। मुगल बादशाह शाहजहां की पहल पर यह करीब 360 वर्ष पहले वजूद में आया था। 

यहां अरबी, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी व हिंदी में किताबें मिलती हैं। इसमें उपन्यास, धर्म, शायरी, यात्र वृतांत, इतिहास, दर्शन, पाक कला, प्रतियोगिता परीक्षा व पाठ्यक्रम की पुस्तकें मिलती है। यहां से पुस्तकें देश के विभिन्न भागों के साथ खाड़ी देश, ब्रिटेन, श्रीलंका व बांग्लादेश समेत अन्य देशों में जाती हैं। 

गांधी-नेहरू आते थे इस बाजार में 

अंजुमन-ए-तरक्की-ए-उर्दू दुकान पर तीसरी पीढ़ी के बैठे निजामुद्दीन गर्व से बताते हैं कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी व देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू इस बाजार में आते थे। यह बाजार स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन का अहम ठिकाना था। कई प्रकाशन इसमें सक्रिय थे। पत्र-पत्रिकाएं छपती थीं, जिनमें देशभक्ति का जोश था। इसलिए यहां इन नेताओं का जमावाड़ा रहता था।

इसमें सुभाष चंद बोस, अबुल कलाम आजाद भी थे। शायरों में गुलजार देहलवी, दाग देहलवी, जोश मलीहाबादी, जिगर मुरादाबादी, आनन्द नारायण मुल्ला, नरेश कुमार शाद, निर्माता- निर्देशक रामानंद सागर, अभिनेता फारुख शेख, बलराज साहनी, कादर खान, दिलीप कुमार, शबाना आजमी, राहत इंदौरी व मुनव्वर राणा समेत ऐसे नामों की भी लंबी फेहरिस्त है, जिनका लगाव इस बाजार से था। 

ई-बुक्स ने बढ़ाईं मुश्किलें 

यहां के दुकानदार शाहिद के मुताबिक ई-बुक्स ने काफी मुश्किलें बढ़ाई हैं, लोगों को पुस्तकें अब मोबाइल फोन पर ही मिल जा रही हैं। इसी तरह किताबों को बढ़ावा देने की नीति भी सरकारों के पास नहीं है। 

 

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