आखिर मौसम का मिजाज क्यों बदल रहा है और इसके लिए कौन है जिम्मेदार ?

Delhi Air Pollution यदि हमें अपने भविष्य को सुरक्षित रखना है एवं भावी पीढ़ी के लिए प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी है तो प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन छोड़कर उनके संरक्षण एवं उचित प्रबंधन पर ध्यान देना होगा।

Sanjay PokhriyalTue, 07 Dec 2021 10:58 AM (IST)
वाहनों की संख्या को चरणबद्ध रूप से नियंत्रित किए बिना राजधानी दिल्ली में वायु गुणवत्ता को बढ़ाना संभव नहीं। फाइल

डा. सुनील कुमार मिश्र। Delhi Air Pollution पिछले कुछ वर्षो में मौसम के मिजाज में जिस तरह से बदलाव आया है, उससे आने वाले खतरे का अंदेशा होने लगा है। अनियमित बारिश की मार कई राज्यों में कठिन चुनौती पेश कर रही है। प्रकृति से हो रहे छेड़छाड़ ने समग्र पारिस्थितिकी को बदल दिया है जिससे प्रतिदिन एक नई चुनौती जन्म ले रही है। प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन एक तरफ इन संसाधनों की भविष्य में उपलब्धता पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है तो वहीं दूसरी तरफ विभिन्न प्रकार की समस्याओं को भी जन्म दे रहा है।

आज मनुष्य की भौतिकवादी जीवनशैली की कीमत पृथ्वी पर रहने वाला प्रत्येक जीव किसी न किसी रूप में चुका रहा है। आर्थिक प्रगति को विकास की धुरी मान बैठा मानव जिस प्रकार से प्रकृति रूपी उसी डाल को काट रहा है, जिस पर उसका अस्तित्व टिका है, निश्चित तौर पर उसकी सेहत के लिए यह शुभ संकेत नहीं है। विगत कुछ वर्षो से देश में बारिश की कमी की वजह से जहां कई राज्य सूखे का दंश झेल चुके हैं, वहीं भारी बारिश ने कुछ राज्यों को जल प्रलय की आहट महसूस कराने का कार्य किया है।

अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर मौसम का मिजाज क्यों बदल रहा है और इसके लिए जिम्मेदार कौन है? इस प्रश्न का उत्तर निश्चित तौर पर प्रकृति के प्रति हमारे संवेदनहीन रवैये की तरफ इशारा करता है। प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कर हम विकास की जिस प्रक्रिया को गति देने में लगे हैं, वह प्रक्रिया हमें धीरे-धीरे विनाश की तरफ ले जाती दिख रही है और आज भी हम कागजी नीतियों के अलावा धरातल से कोसों दूर खड़े दिखते हैं। सरकार पर्यावरण संबंधी नीतियों के क्रियान्वयन में आज भी पूरी तरह से सफल होती नहीं दिख रही है, क्योंकि सरकारी नीतियां विकास एवं पर्यावरण संरक्षण के बीच सामंजस्य स्थापित करने में पूरी तरह से सफल नहीं हो पा रही हैं। विकास की पश्चिमी अवधारणा से प्रभावित सरकारी तंत्र, रोग होने पर उसके उपचार की बात करता है, जबकि रोग ही न हो, ऐसी व्यवस्था करने की आवश्यकता प्रतीत होती है।

आज निश्चित रूप से हम ऐसे दोराहे पर खड़े हैं, जहां एक ओर अर्थव्यवस्था का मकड़जाल है तो दूसरी ओर सृजन का कारक प्रकृति है। इस बात का निर्णय स्वयं लेना होगा कि हमें मजबूत अर्थव्यवस्था की भट्ठी में जीवन को झोंकना है या हमारी प्रत्येक आवश्यकता का ध्यान रखने वाली प्रकृति की तरफ सम्मान की दृष्टि से देखना है। जीवन के सुविधाभोगी बनते जाने के कारण बढ़ते लालच से हम बच नहीं पाते।

बोतलबंद पानी और आक्सीजन सिलेंडर के साथ कुछ समय तक तो जीवन की कल्पना संभव है, परंतु प्रकृति द्वारा प्रदत्त संसाधन के साथ ही जीवन का सच्चा अस्तित्व है। उद्योग को मजबूती देने एवं आधुनिक जीवन के संसाधन जुटाने के चक्कर में हमने जिस प्रकार से पृथ्वी, जल एवं वायु को दूषित किया है, उसकी भरपाई करना अत्यंत आवश्यक है। हांफता शहरी जन-जीवन हो या फिर आधुनिकता की चकाचौंध में प्रकृति से दूर होता ग्रामीण जीवन, दोनों को ही मृग मरीचिका से निकलना होगा एवं उन उपायों को आत्मसात करना होगा जिनके माध्यम से हमारे पूर्वज प्रकृति के वात्सल्य स्नेह को महसूस करते थे।

यदि हम चाहते हैं कि प्रकृति हमें मां का प्यार दे तो हमें भी बेटे का फर्ज निभाना होगा। प्राकृतिक संसाधनों के प्रति सम्मान की भावना ही हमें आने वाले खतरे से बचा सकती है। समय आ गया है कि हमें धारणीय विकास की अवधारणा को आत्मसात करना होगा। यदि हमें अपने भविष्य को सुरक्षित रखना है एवं भावी पीढ़ी के लिए प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी है तो प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन छोड़कर उनके संरक्षण एवं उचित प्रबंधन पर ध्यान देना होगा।

[असिस्टेंट प्रोफेसर, विवेकानंद इंस्टीट्यूट आफ प्रोफेशनल स्टडीज, नई दिल्ली]

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