बच्चों-किशोरों में संस्कार के बीज बोने में शिक्षकों की होती है अहम भूमिका

वन की प्रथम पाठशाला ‘परिवार’ के बाद बच्चों-किशोरों में संस्कार के बीज बोने के साथ-साथ अपनी संस्कृति और इतिहास से परिचित कराते हुए इसके प्रति गौरव बोध का भाव शिक्षक ही भरते हैं। हर व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई ऐसा शिक्षक जरूर होता है।

Pooja SinghSat, 04 Sep 2021 10:45 AM (IST)
बच्चों-किशोरों में संस्कार के बीज बोने में शिक्षकों की अहम भूमिका, होती है बड़ी जिम्मेदारी

अरुण श्रीवास्तव। वन की प्रथम पाठशाला ‘परिवार’ के बाद बच्चों-किशोरों में संस्कार के बीज बोने के साथ-साथ अपनी संस्कृति और इतिहास से परिचित कराते हुए इसके प्रति गौरव बोध का भाव शिक्षक ही भरते हैं। हर व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई ऐसा शिक्षक जरूर होता है, जिसके व्यक्तित्व और विचारों की गहन छाप उस पर पड़ती है। जिनकी सीख को हम आजीवन याद रखते हैं और याद रखते हैं अपने उन शिक्षकों को भी, जो विद्यार्थियों को अपने जीवन में आत्मविश्वास के साथ हर परिस्थिति का सामना करने में सक्षम बनाते हैं।

गढ़ते हैं गुरु

शिक्षक बेशक कक्षा के सभी छात्रों को सामूहिक रूप से पढ़ाते-सिखाते हैं, पर सच यह भी है कि वे अपनी कक्षा के हर छात्र के स्वभाव से बखूबी परिचित होते हैं। जाहिर है कक्षा में जहां कुछ तेज-तर्रार बच्चे होते हैं, तो वहीं कुछ शरारती भी। उनके स्वभाव से परिचित होने के कारण ही एक जिम्मेदार शिक्षक बड़ी होशियारी से उन्हें संभालता है। शिक्षकों की फटकार में कभी कोई विद्वेष का भाव नहीं होता। यही कारण है कि शरारती से शरारती छात्र भी  बड़े होने पर उनकी डांट-फटकार को बड़े सम्मान से याद करते हैं और यह स्वीकार करते हैं कि उन्होंने ऐसा उन्हें सिखाने और संस्कारित करने के लिए ही किया। देखा जाए तो सही मायने में संस्कारों की सीख बचपन में शिक्षकों द्वारा ही मिलती है।

संस्कार-संस्कृति-इतिहास की सीख

शुरुआती कक्षाओं में विद्यार्थियों के कोमल मन के सादे पन्ने पर शिक्षक कहानियों और पाठ्यपुस्तकों के जरिए नैतिक शिक्षा का जो पाठ लिखते हैं, उसे वे आजीवन नहीं भूलते। आज जब हम आजादी के 75वें वर्ष को लेकर रोमांचित हैं और इसे ‘अमृत महोत्सव’ के रूप में मना रहे हैं, ऐसे में शिक्षकों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे इस अवसर पर विद्याíथयों को देश के इतिहास से रूबरू कराएं।

सपने सच करने का लें संकल्प

यह बड़े सौभाग्य की बात है कि हम सभी को आजादी के 75वें वर्ष से होकर गुजरने, इसे देखने, इसे सेलिब्रेट करने और इस बहाने आजादी के नायकों को याद करने का बड़ा अवसर मिला है। आजादी के नायकों, स्वतंत्रता सेनानियों का नि:स्वार्थ संघर्ष और त्याग हमारे भीतर गौरव का भाव भरने के साथ-साथ हमें यह संकल्प लेने के लिए भी प्रेरित करता है कि हम सभी स्वाभिमान के साथ अपनी स्वाधीनता की लड़ाई का स्मरण करते हुए स्वावलंबन की राह पर सतत आगे बढ़ते रहें। इसके लिए शिक्षक अपने विद्याíथयों को भी संकल्प दिलाएं, ताकि वे आगे चलकर नवाचार की दिशा में गहन प्रयास करें और देश को स्वावलंबन की राह पर कहीं अधिक तेजी से आगे बढ़ाएं।

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