आओ बचाएं नीम नदी अभियान को मिल रहा जनसर्मथन, धर्म ग्रंथों में नदी व तालाब पूजनीय

नदियों और तालाबों की हो रही अनदेखी से भूजल का संकट पैदा।

नीम नदी पर चर्चा करते हुए नदी के जानकार मदन सैनी ने कहा कि धर्म ग्रंथों में नदियों और तालाबों को पूजनीय कहा गया है। उसके पीछे कारण भी साफ है कि यदि जल है तो जीवन है। इसलिए हमारे पूर्वजों ने नदियों को मां की संज्ञा दी है।

Prateek KumarSat, 10 Apr 2021 06:45 AM (IST)

नई दिल्ली, हापुड़ [मनोज त्यागी]। दैनिक जागरण की टीम हापुड़ के एसएसपी पीजी कालेज में पहुंची जहां बीएड के छात्र-छात्राओं से नीम नदी पर चर्चा हुई। नीम नदी पर चर्चा करते हुए नदी के जानकार मदन सैनी ने कहा कि धर्म ग्रंथों में नदियों और तालाबों को पूजनीय कहा गया है। उसके पीछे कारण भी साफ है कि यदि जल है तो जीवन है। इसलिए हमारे पूर्वजों ने नदियों को मां की संज्ञा दी है। ताकि लोग उसे अपनी मां की तरह ही प्यार करें और संजोये, लेकिन आधुनिकता की दौड़ में हम आगे तो बढ़ गए पर अपनी प्राचीन संस्कृति से दूर हो गए। यही कारण है कि हमने नदी और तालाबों की अनदेखी कर दी और तमाम नदियों का अस्तित्व ही खत्म हो गया। उसी का जीता जागता उदाहरण नीम नदी है। यही कारण है कि आज भूजल का संकट खड़ा हो गया है। नीम नदी को पुनर्जीवित करने के लिए दैनिक जागरण ने मुहिम छेड़ी है। इसमें हम सभी मिलकर श्रमदान करें और नदी को पुनर्जीवित करें।

नीम नदी के बारे में दैनिक जागरण लगातार अभियान चला रहा है। इसके लिए जागरण को साधुवाद जो नदी को बचाने के लिए आगे आया। यह सच है कि नदियों के बिना हम सभी का जीवन सुना है, क्योंकि भूजल का नियंत्रित करने में नदियों का बहुत बड़ा योगदान होता है। हम इस अभियान में साथ हैं।

सुरेश संपादक, सचिव, शिक्षा प्रसार समिति

मैं दैनिक जागरण में लगातार नीम नदी के बारे में पढ़ रहा हूं। आज जब यह जानकारी मिली कि दैनिक जागरण की टीम हमारे कालेज में आ रही है, तो बहुत खुशी हुई। नीम नदी के बहाने में दूसरी नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए काम करेंं। नीम नदी एक उदाहरण बनकर उभरे।

प्रकाश शर्मा, अध्यापक

मैं तो नीम नदी के बारे में जानकर बहुत खुश हूं। हमारे छात्र-छात्राओं को इससे सीख मिलेगी और ये आगे जाकर आने वाली पीढ़ी को नदियों के बारे में बताएंगे। इससे बहुत अच्छा जन जागरण होगा और लोग नदी और तालाबों के प्रति जागरुक होंगे।

वंदना वशिष्ठ, प्रवक्ता

हम इस मुहिम में दैनिक जागरण के साथ हैं। यह खुशी की बात है कि कोई तो इस समाज के काम में आगे आया। सही बात यह है कि अब से पहले नीम नदी के बारे में जानकारी नहीं थी। अब हमें लग रहा है कि कब हमें मौका मिले और हम जाकर श्रमदान करें।

डा. सीमा तनेजा, प्रवक्ता

सही बात यह है कि नदी से सिर्फ भूजल का स्तर नहीं बढ़ेगा, बल्कि पर्यावरण भी शुद्ध होगा। क्योंकि नदी है तो उसके किनारे पेड़ पौधे लगेंगे और पर्यावरण शुद्ध होगा। जब भी हम लोगों को मौका मिलेगा वहां जाएंगे और पौधरोपण में आगे बढ़कर काम करेंगे।

संजीव, प्रवक्ता

मै कभी ये नहीं समझ पाती हूं कि लोग क्यों इस तरह से नदी और तालाबों पर कब्जा कर लेते हैं। जबकि वे लोग भी जानते हैं कि इससे किसी का भला नहीं होने वाला। हां बुरा सभी को होगा, क्योंकि पानी के बिना किसी का काम नहीं चलने वाला है। जिन लोगों ने अतिक्रमण किया है वह स्वयं ही उसे हटाएं और मिसाल कायम करें।

राहुल बंसल, वरिष्ठ लेखाकार

यह बात सच है कि हम नदियों को मां के रूप में ही देखते हैं और उन्हें पूजते भी हैं। पूर्णिमा और अमावस्या के दिन लाखों लोग गंगा में स्नान करते है और पूण्य कमाते हैं। नीम नदी भी गंगा की सहायक नदी में से एक है, तो जाहिर है कि वह भी गंगा की तरह ही पवित्र है।

डा. शिखा अग्रवाल, प्रवक्ता

 

पौराणिक आधार पर नदियों की उपयोगिता

पौराणिक और जनश्रुतियों के आधार पर नदी पुत्र रमन कांत त्यागी द्वारा खोजा गया नीम नदी का इतिहास को लेकर दैनिक जागरण ने सीरिज शुरू की है। शुक्रवार के अंक से आगे की जानकारीः-

गांव चाहे जितना विशाल हो लेकिन सभी गांव के पशु उसके भीतर जाकर नहाने के साथ ही प्यास भी बुझा लेते थे। पशु नहा भी लिये और पानी भी कम नहीं हुआ। ग्रामीणों ने कपड़े धोये वह पानी भी वापस उसी में चला गया और जो साबुन कपड़ों के साथ तालाब में गया वह पानी को स्वच्छ करने के काम में आ गया। पशुओं के साथ-साथ पशु मालिकों का स्नान भी हो गया। बच्चे उसमें तैरे तो उनका व्यायाम हो गया। पशुओं के खुरों से तालाब के तल की मिट्टी मली गई तो तालाब की पानी सोखने की और पानी निकालने की क्षमता बढ़ी।

कुछ घण्टों के लिए समस्त-आधा या चतुर्थांश गांव तालाब पर आ जाता था इससे उनमें आपसी सुख-दुख एवं कार्य कलापों की बातें भी हो जाती थीं। उनमें एकता और समरसता बढ़ती थी। छुआछूत और सांप्रदायिकता पर प्रहार होता था। लाखों वर्षों से गंगाजी में हम लोग अपने पाप धोते आ रहे हैं क्या कभी छुआछूत का प्रश्न खड़ा हुआ? नहीं! फिर आडम्बर क्यों? वर्षा में कच्ची मिट्टी के बने घरों में टूट-फूट होती थी तो बरसात बाद अथवा आगामी वर्षा से पूर्व (विशेषकर सितम्बर-अक्तूबर में दीपावली से पूर्व या मई-जून में) उन्हीं तालाबों से विशिष्ट चिकनी मिट्टी को लाकर घरों की मरम्मत की जाती थी। मरम्मत भी हो गई और तालाब गहरा भी हो गया। उसकी पानी सोखने की क्षमता बढ़ गई। उसी समय कुम्हार (कुम्भकार अथवा प्रजापति, मिट्टी के बर्तन बनाने वाले) भी तालाबों से अपनी एक वर्ष की आपूर्ति के योग्य मिट्टी ले आते थे और निश्चित होकर मिट्टी के बर्तन बनाते रहते थे। उसी में धोबी कपड़े धोते थे।

अधिक बड़े तालाबों से सिंचाई की जाती थी तो तालाबों पर कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं को आर्थिक लाभ होता था। उसी तालाब के किनारे एक वृक्ष की शीतल-सुखद छाया में नाई दाढ़ी-बाल आदि बनाता रहता था। तालाब के किनारे मन्दिर पर गांव वाले पूजा करने आते तो पुजारी को रोजी-रोटी प्राप्त होती और ग्रामीणों को धर्म लाभ। कोई संत महात्मा आ जाते तो ग्रामीणों को प्रवचन भी वहीं करते थे। अर्थात वह तालाब ग्रामीणों के लिए जीवनदायी सिद्ध होता था इसीलिए जल को जीवन कहा और जहां जीवन को आश्रय प्राप्त हो वह जीवनाश्रय अथवा जलाशय। इतना ही नहीं बल्कि रात्रि में दूर-दूर तक के रजनीचर पशु-पक्षी आदि भी उस तालाब में पानी पीकर भगवान से उस गांव की खुशहाली की प्रार्थना करते। सारांश यह है कि जलाशय के कारण ही वृक्ष-पशु-पक्षी आदि जीवन प्राप्त करते और समस्त पर्यावरण साफ-स्वच्छ एवं प्रदूषण रहित रहता। सभी कार्य भी सम्पन्न हो जाते और पानी का अपव्यय भी नहीं होता। पानी कम ही नहीं हो पाता था। यह थी हमारी जल संस्कृति। 

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