केंद्रीय वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग को सौंपी गई रिपोर्ट, दूसरे राज्यों में लागू करने की मांग

पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने कहा कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और वह जल्द ही केंद्रीय पर्यावरण मंत्री से भी मिलेंगे और उन्हें वाप्कोस की आडिट रिपोर्ट सौंपेंगे। उन्होंने कहा कि हर साल दिल्ली को पड़ोसी राज्यों में जलाई जाने वाली पराली के धुएं की समस्या से जूझना पड़ता है।

Prateek KumarFri, 17 Sep 2021 06:10 AM (IST)
केंद्रीय वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग को सौंपी गई रिपोर्ट।

नई दिल्ली, राज्य ब्यूरो। दिल्ली सरकार के पर्यावरण एवं विकास विभाग के अधिकारियों ने बायो डि-कंपोजर से पराली गलाने से संबंधित थर्ड पार्टी आडिट रिपोर्ट शुक्रवार को केंद्रीय वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएमसी) को सौंप दी। अधिकारियों के मुताबिक केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के अधीन काम करने वाली वाप्कोस एजेंसी ने यह रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें बायो डि-कंपोजर को पराली गलाने का एक बेहतर समाधान बताया गया है। पर्यावरण विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने आयोग से इस तकनीक को दूसरे राज्यों में भी लागू करने की मांग की है।

सीएम करेंगे पर्यावरण मंत्री से मुलाकात

पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने कहा कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और वह जल्द ही केंद्रीय पर्यावरण मंत्री से भी मिलेंगे और उन्हें वाप्कोस की आडिट रिपोर्ट सौंपेंगे। उन्होंने कहा कि हर साल दिल्ली को पड़ोसी राज्यों में जलाई जाने वाली पराली के धुएं की समस्या से जूझना पड़ता है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री से इस संबंध में हस्तक्षेप करने और समय रहते पड़ोसी राज्यों में भी बायो डि-कंपोजर का उपयोग कराने की मांग की जाएगी।

करीब 310 किसानों के खेतों में प्रभाव को देख कर तैयार की गयी रिपोर्ट

दिल्ली सरकार के अधिकारियों ने बताया कि वाप्कोस ने राजधानी के 39 गांवों में जाकर 310 किसानों के करीब 1935 एकड़ गैर-बासमती धान के खेतों में बायो डि-कंपोजर के छिड़काव के प्रभाव को अपनी आडिट रिपोर्ट में शामिल किया है। वहीं, दिल्ली सरकार के विकास विभाग ने भी किसानों द्वारा बायो डि-कंपोजर के उपयोग पर सकारात्मक प्रभाव और प्रतिक्रिया का आकलन करने के लिए एक फील्ड सर्वे किया था, जो बहुत ही उत्साहजनक था।

वाप्कोस की टीम ने निकाला यह निष्कर्ष

1. 90 फीसद किसानों ने कहा, बायो डि-कंपोजर के छिड़काव के बाद 15 से 20 दिनों में पराली गल जाती है, पहले लगते थे 40-45 दिन

2. किसानों को गेहूं की बुआई से पहले छह सात बार खेत की जुताई करनी पड़ती थी, अब केवल एक-दो बार ही करनी पड़ी।

3. मिट्टी में आर्गेनिक कार्बन की मात्रा 05 फीसद से बढ़कर 42 फीसद हो गई है।

4. मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा 24 फीसद तक बढ़ गई है।

5. मिट्टी में बैक्टीरिया की संख्या और फंगल (कवकों) की संख्या में सात गुना और तीन गुना की वृद्धि हुई है।

6. मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार के कारण गेहूं के बीजों का अंकुरण 17 फीसद से बढ़कर 20 फीसदी हो गया।

7. 45 फीसदी किसानों ने स्वीकारा, बायो डि-कंपोजर इस्तेमाल के बाद डीएपी की मात्रा 46 किलो प्रति एकड़ से घटकर 36 से 40 किलो हो गई।

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