पढ़िये दिल्ली के ऐतिहासिक गेट की कहानी और जानिये सूरज डूबते ही क्यों बंद हो जाते थे इनके दरवाजे

सोहेल हाशमी बताते हैं कि शहर के चारों तरफ खाई थी और सूरज डूबते ही यह सारे दरवाजे बंद कर दिए जाते थे। मोरी गेट की तरफ से यमुना से पानी लिया जाता था और पूरे शहर का चक्कर लगाकर राजघाट दरवाजे के पास दोबारा यमुना में गिर जाता था।

Jp YadavSat, 25 Sep 2021 10:20 AM (IST)
पढ़िये दिल्ली के एतिहासिक गेट की कहानी और जानिये सूरज डूबते ही क्यों बंद हो जाते थे इनके दरवाजे

नई दिल्ली। अब भले दिल्ली में दरवाजों का इतिहास चुनिंदा दरवाजों में सिमट कर रह गया है। लेकिन कभी शाहजहांनाबाद के 14 के अलावे दिल्ली 52 द्वार में थी। इतिहास के पन्नों में उनके बनने की कहानियां और नामों के पीछे के तर्क हैं लेकिन अब वे दरवाजे केवल इतिहास के अलावा कुछ नहीं हैं। अब जो ऐतिहासिक धरोहर बची है उसे संरक्षित करने की कोशिशें हो रही हैं। इससे उम्मीद जगती है कि इतिहास के गर्भ से और दरवाजे भी मिलें। फिलवक्त दिल्ली गेट, अजमेरी गेट, तुर्कमान गेट, लाहौरी गेट (अब सिर्फ नाम का दरवाजा), त्रिपोलिया गेट, शेरशाह गेट को पुनर्जीवित करने में पुरातत्व विभाग जुटा है। सबरंग के इस अंक में दरवाजों के इतिहास से रूबरू करा रही हैं प्रियंका दुबे मेहता :

शाहजहांनाबाद के चौदह दरवाजों के अलावा शहर में 52 दरवाजे होते थे। जो शाहजहांनाबाद के पहले, तो कुछ बाद के शासकों द्वारा बनाए गए थे। इतिहासकार सोहेल हाशमी का कहना है कि दिल्ली दरवाजे से शुरू करें तो घड़ी की सुई की दिशा में चलने पर दिल्ली दरवाजे के बाद तुर्कमान दरवाजा, अजमेरी दरवाजा, लाहौरी दरवाजा, काबुली दरवाजा, बदरौ दरवाजा (बद-गंदा, रौ- नाला, बाद में मोरी गेट कहलाया।) कश्मीरी, निगमबोध, केला घाट, बेला घाट, पत्थरघटी, पानी, राजघाट दरवाजा पड़ते हैं। यह सब जमुना(यमुना) की तरफ खुलते थे। बाद में 1911 में कलकत्ता(अब कोलकाता) के दिल्ली आए अंग्रेजों ने एक कलकत्ता दरवाजा जोड़ा था जो हनुमान मंदिर के पास, जमुना बाजार में था।

शाहजहांनाबाद का हिस्सा नहीं था त्रिपोलिया गेट

शाहजहांनाबाद के चौदह दरवाजों में त्रिपोलिया दरवाजे की गिनती नहीं होती थी। इतिहासकार सोहेल हाशमी का कहना है कि त्रिपोलिया दरवाजा शाहजहांनाबाद का हिस्सा नहीं था। यह तो दिल्ली के पश्चिम में स्थित है। जीटी करनाल रोड स्थित गुड़ मंडी और महाराणा प्रताप बाग के निकट बने दो त्रिपोलिया गेट कभी अपनी भव्यता और वास्तुशिल्प के अनूठेपन के लिए जाने जाते हैं। त्रिपोलिया गेट यानी कि तीन प्रवेश वाला दरवाजा। कभी शान से खड़ा यह अद्भुत दरवाजा 17वीं शताब्दी में नजीब महलदार खां द्वारा बनवाया गया था। महलदार खां मुहम्मद शाह के वजीर थे। इनके निर्माण की कहानी इन दरवाजों पर 1728-1729 के अभिलेखों से मिलती है। मुगलकाल के अंत तक यह दरवाजा बाजार के तौर पर मशहूर रहा। इस तरह का वास्तुशिल्प दिल्ली के किसी दरवाजे में नहीं मिलता। हालांकि बाद में दरवाजे की लंबाई कम होती गई, या यूं कहें कि सड़क ऊंची होती गई और दरवाजा नीचा होता गया। पुरातत्ववेत्ताओं का कहना है कि जीटी करनाल रोड लगातार बनती रही जिसकी वजह से इस दरवाजे की ऊंचाई उतनी प्रभावशाली नहीं रह गई।

चुनौती बनी शेरशाह गेट की बनावट की जटिलता

छठी दिल्ली के जीवित दरवाजों में से एक, शेरशाह दरवाजे के पुन?नर्माण की प्रक्रिया ने लंबे समय बाद फिर से गति पकड़ी है। पुरातत्व विभाग ने इस दरवाजे के मरम्मत की तैयारियां तेज कर दी हैं। इस दरवाजे की भव्यता का अंदाजा इसके जर्जर स्वरूप को देखकर भी लगाया जा सकता है कि एक समय में यह कितना खूबसूरत रहा होगा। चौकोर पत्थर और रोड़ी से बना शानदार नमूना 2012 में बारिश से लगभग 50 फीसद क्षतिग्रस्त हो गया था। वर्ष 2016 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) ने एक वर्ष के भीतर इसकी मरम्मत का जिम्मा लिया लेकिन दरवाजे की बनावट की जटिलता और कुशल कामगार न मिल पाने की वजह से यह काम नियत अवधि में पूरा नहीं हो सका था।

पुराना किला के क्या कहने

1540 में शेरशाह सूरी ने पुराना किला में इस दरवाजे का निर्माण करवाया था। मथुरा रोड पर लाल पत्थरों से बने इस दरवाजे की ऊपरी मंजिल स्लेटी क्वार्टाइज से बनाई गई है। इसीलिए इसका नाम लाल दरवाजा भी था। इतिहासकार लूसी पेक लिखती हैं कि हालांकि इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल है कि किले का कितना हिस्सा और दरवाजा शेरशाह सूरी ने बनवाया था और कितना उससे पहले हुमायूं ने बनवाया था। गेट के सामने के हिस्से में झरोखे और कंगूरे हैं, दरवाजा गढ़ की तरह बना है। यहां पर ऊपरी हिस्से में जाने के लिए सीढ़ियां भी बनी हुई हैं। इन्हें मूल स्वरूप में रखते हुए कुछ बदलाव के जरिए फिर से खड़ा करने की योजना है। पुरातत्व विभाग ने इसके संरक्षण का जिम्मा उठाया है तो उम्मीद लगाई जा रही है कि इस दरवाजे की खूबसूरती फिर से लौट सकेगी।

सूरज डूबते ही बंद हो जाते थे दरवाजे

यह दरवाजे सुरक्षा के लिए बनवाए गए थे। सोहेल हाशमी बताते हैं कि शहर के चारों तरफ खाई थी और सूरज डूबते ही यह सारे दरवाजे बंद कर दिए जाते थे। मोरी गेट की तरफ से यमुना से पानी लिया जाता था और पूरे शहर का चक्कर लगाकर राजघाट दरवाजे के पास दोबारा यमुना में गिर जाता था। अब उन दरवाजों में से दिल्ली दरवाजा, तुर्कमान दरवाजा, कश्मीरी दरवाजा, निगमबोध दरवाजे (नई शक्ल में) बचा है। बाकी सभी दरवाजे अंग्रेजों ने तुड़वाकर दीवार खड़ी कर दी थी। क्योंकि 1803 में मराठों को हराने के बाद अंग्रेजों को डर था कि मराठा दोबारा हमला करेंगे। ऐसा हुआ भी होल्कर के नेतृत्व में दिल्ली पर हमला हुआ लेकिन अंग्रेजों ने उन्हें हरा दिया।

लाहौरी गेट और अजमेरी गेट

पुस्तक चांदनी चौक ‘द मुगल सिटी आफ ओल्ड दिल्ली’ में इतिहासकार स्वप्ना लिड्ले लिखती हैं कि लाल किले की दीवार के अंतिम छोर पर दो प्रमुख दरवाजे थे जिसमें से पश्चिम की तरफ का दरवाजा लाहौरी गेट कहलाया। यह दरवाजा लाहौरी की तरफ खुलता था इसलिए यह लाहौरी गेट कहलाने लगा। दक्षिण की तरफ का दरवाजा दिल्ली दरवाजा या अकबराबादी दरवाजा था। इस दरवाजे का नाम भी इसके प्रवेश कसी दिशा और स्थान के आधार पर पड़ा। दक्षिण की तरफ यानी कि जहां पुरानी दिल्ली और अकबराबाद (आगरा का मुगल नाम) पड़ता था। इसके अलावा इस दरवाजे पर दो हाथी लगे होने के कारण इसे हाथीपोल भी कहा जाता है। दीवान-ए-आम में बैठे बादशाह को लाहौरी दरवाजे से पूरा चांदनी चौक नजर आता था। औरंगजेब ने उस दरवाजे को बंद करवा कर उसके दाएं तरफ एक नया दरवाजा बनाया था। मीना बाजार इसी दरवाजे के अंदर के रास्ते में है। 1644 में बनवाए गए अजमेरी गेट का नाम भी अन्य दरवाजों की तरह उस सड़क के नाम से पड़ी जो अजमेर की ओर जाती थी। यह दरवाजा 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का भी गवाह बना था। ‘लिंगरिंग चार्म आफ दिल्ली’ में इतिहासकार आरवी स्मिथ लिखते हैं कि कश्मीरी गेट, मोरी गेट और लाहौरी गेट सबसे अधिक युद्धों के गवाह रहे थे।

सूफी संत के नाम पर बना, बर्बरता का पर्याय बना तुर्कमान गेट

अगर कनाट प्लेस से पुरानी दिल्ली की ओर रुख करें तो रामलीला मैदान के पास एक ऐतिहासिक दरवाजा नजर आता है। यह है तुर्कमान दरवाजा। यह दरवाजा सूफी संत शाह तुर्कमान बयाबानी के नाम पर है। ‘दिल्ली-अ थाउजेंट ईयर्स आफ बिल्डिंग’ में इतिहासकार लूसी पेक ने लिखा है कि इल्तुतमिश के शासनकाल में शाह तुर्कमान भारत आए थे। समाज में न रहने जंगलों मे जीवन बिताने के कारण वे बियाबानी के नाम से भी जाने जाते थे। रजिया सुल्तान भी शाह तुर्कमान की अनुयायी थीं। 1240 में शाह तुर्कमान को उस समय दिल्ली से कुछ दूर पड़ने वाले इस हिस्से में दफनाया गया था। तुर्कमान दरवाजा 1658 में बनवाया गया था। आपातकाल के नरसंहार के बाद 1976 में यह नाम क्रूरता और भय का पर्याय बन गया और पूरे देश में जाना जाने लगा।

दिल्ली गेट से ही दाखिल हुआ था कर्नल लार्ड लेक

दरियागंज के प्रवेश पर बना यह दरवाजा शाहजहां द्वारा बनवाए चौदह दरवाजों में से एक था। भले ही अन्य दरवाजे लगातार संघर्षो की भीषण तपिश महसूस करते रहे हों लेकिन दिल्ली गेट ने 1804 से पहले तक कोई बड़ी घटना नहीं देखी थी। 1804 जब मराठा जसवंत राव होल्कर ने दिल्ली पर आक्रमण किया तो इस गेट और दीवार की सुरक्षा कर रहे कर्नल आक्टरलनी उनकी घेरेबंदी तोड़ी थी। कहा जाता है कि पड़पड़गंज के युद्ध (1803) के बाद लार्ड लेक इसी द्वार से शहर में दाखिल हुआ था और शाह आलम से मिला था। इतिहासकार आरवी स्मिथ ‘टेल आफ टू दिल्ली गेट्स’ में लिखते हैं हालांकि इस बात पर इतिहासकारों के मत भिन्न हैं। आरवी स्मिथ ने लिखा है कि दिल्ली गेट की अहमियत शाहजहां के लिए क्या थी, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लाल किले में एक दिल्ली दरवाजा होने के बावजूद भी दूसरे दिल्ली गेट को वह शानदार तरीके से बनवाना चाहते थे।

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