बातों ही बातों में अपने पुराने साथियों के लिए बड़ी बात कह गए कवि कुमार विश्वास, पढ़िए क्या कहा?

आंदोलनकारी और पुलिस की धक्का-मुक्की में घायल होने के समाचार तो सुनने को मिल जाते थे मगर ऐसी नृशंस घटना कभी सुनने को नहीं मिली थी। घटना के बाद से पूरे देश में किसानों के आंदोलन और वहां हो रही चीजों को लेकर बयानबाजी का दौर शुरू हो चुका है।

Vinay Kumar TiwariSun, 17 Oct 2021 12:43 PM (IST)
किसानों के आंदोलन और वहां हो रही चीजों को लेकर बयानबाजी का दौर शुरू हो चुका है।

नई दिल्ली, आनलाइन डेस्क। कुंडली बार्डर पर एक युवक की नृशंस हत्या ने सभी को चौका दिया था। किसी धरना स्थल पर वहीं मौजूद लोगों के द्वारा किया गया ये अब तक का घृणित अपराध कहा जा सकता है। इससे पहले भी आंदोलन स्थलों पर अपराध होते रहे हैं मगर किसी का हाथ-पैर काटकर उसे टांग देना फिर उसकी मौत पर तमाशा करना दिल्ली-एनसीआर में तो पहली बार देखने को मिला है। आंदोलनकारी और पुलिस की धक्का-मुक्की में घायल होने के समाचार तो सुनने को मिल जाते थे मगर ऐसी नृशंस घटना कभी सुनने को नहीं मिली थी। खैर इस घटना के बाद से पूरे देश में किसानों के आंदोलन और वहां हो रही चीजों को लेकर बयानबाजी का दौर शुरू हो चुका है।

किसान संगठन अपने को इस तरह की घटना से एकदम अलग कर रहे हैं तो राजनीतिक हलके निहंगों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं। हर बार बढ़ चढ़कर बयान देने वाले संयुक्त किसान मोर्चा ने तो अपने को इससे एकदम ही अलग कर लिया है। कुछ राजनीतिक दल भी इस पर कुछ भी बोलने से बच रहे हैं। कवि कुमार विश्वास ने अपने इंटरनेट मीडिया एकाउंट पर ट्वीट कर ऐसे लोगों को घेरा, साथ ही कहा कि जो लोग पहले जरा-जरा सी बात पर संविधान की बात करने लगते थे वो अब इतना बड़ा हादसा हो जाने के बाद बयान तक जारी नहीं कर रहे कि कहीं उनका वोटबैंक न खराब हो जाए।

उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा कि क़ानून को कबीले में बदलते हुए मध्ययुगीन बर्बरता से एक आदमी के हाथ-पैर काट कर टाँग दिया गया तो पंजाब हड़पने के लालची आत्ममुग्ध बौने से लेकर चुटकुलों पर आहत हो जाने वाले तथाकथित धर्मनिरपेक्षों तक, सब के मुँह में दही जम गया कि निंदा की तो वोट कट जाएँगे।संविधान का आदर कहाँ गया अब।

इससे पहले उन्होंने एक और ट्वीट किया था जिसमें लिखा था कि जब तक अपने-अपने धर्म को देश और अपने-अपने धर्मग्रंथ को संविधान से ऊपर मानते रहोगे तब तक बस एक उन्मादी भीड़ वाले कबीले बने रहोगे। राजनीति यही चाहती है कि तुम एक विवेकहीन भीड़ से आगे कभी बढ़ ही न सको, ताकि वो तुम्हें नारों-चीख़ों के सहारे अपने अजेंडे के हिसाब से हाँक सकें। कब समझोगे?

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