अब एआइ की मदद से अंधेरे में सिर्फ हुलिया देख हो जाएगी अपराधी की पहचान

भारतीय पुलिस सेवा अधिकारी (सेवानिवृत्त) आरके चतुर्वेदी ने बताया कि देश के हर एयरपोर्ट पर इसका उपयोग किया जा सकता है। यदि कोई आतंकवादी हुलिया बदलकर देश में घुसने का प्रयास करता है तो उसको भी आसानी से पकड़ा जा सकेगा।

Sanjay PokhriyalMon, 21 Jun 2021 09:15 AM (IST)
एआइ आधारित सॉफ्टवेयर बनेगा संदिग्ध की पहचान का माध्यम, एक वर्ष का समय लगा तैयार करने में

नई दिल्ली/नोएडा [सुनाक्षी गुप्ता]। दिन ब दिन बेहतर हो रही तकनीक का इस्तेमाल कर अपराधियों को पकड़ने के नए-नए तरीके ईजाद किए जा रहे हैं। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) की मदद से शारीरिक बनावट के आधार पर अंधेरे में भी अपराधियों की पहचान की जा सकेगी। अभी तक जो अपराधी वेष बदलकर या मुंह ढककर बच निकलते थे, उनकी पहचान की जा सकेगी।

नोएडा की विज्ञानी डा. शिवानी वर्मा एक ऐसा सॉफ्टवेयर तैयार कर रही हैं जिसमें अगर किसी घटना की फोटो या वीडियो डाली जाए तो घटना में शामिल उस व्यक्ति की पहचान हो सकेगी जिसका ब्योरा आपराधिक रिकार्ड में दर्ज है। यह सॉफ्टवेयर पुलिस और सुरक्षा से जुड़ी सभी संस्थाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित होगा। इससे सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस के लिए अपराधी की पहचान करना न केवल आसान होगा, बल्कि इसके जरिये वह अपराधियों को ट्रैक कर उन तक पहुंच भी सकेंगे।

सामान्य कंप्यूटर में भी चल सकेगा सॉफ्टवेयर: नोएडा के एमिटी विश्वविद्यालय के एमिटी इंस्टीट्यूट आफ स्पेस साइंस एंड टेक्नोलाजी की असिस्टेंट प्रोफेसर डा. शिवानी वर्मा ने बताया कि विभाग के निदेशक डा. एमएस प्रसाद के मार्गदर्शन में उच्च सटीकता के साथ एक व्यक्ति के शारीरिक मापदंडों के आधार पर पहचान करने की प्रणाली विकसित की गई है। इसका उद्देश्य है कि ज्यादा से ज्यादा अपराधियों को पकड़ा जा सके। वह इस सॉफ्टवेयर को इस तरह तैयार कर रही हैं ताकि इसे स्थापित करने में ज्यादा खर्च न आए और सामान्य कंप्यूटर में इसे इंस्टाल कर आसानी से प्रयोग किया जा सके। फिलहाल इसका माडल तैयार कर लिया गया है।

डीआरडीओ से अनुदान प्रक्रिया जारी डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट आर्गनाइजेशन (डीआरडीओ) से अनुदान मिलने पर दो साल में प्रोजेक्ट तैयार होगा। आत्मनिर्भर भारत मिशन के तहत डीआरडीओ ने डेयर टू ड्रीम 2.0 प्रतियोगिता का आयोजन किया था। जिसमें जीवन विज्ञान प्रौद्योगिकी डोमेन में डा. शिवानी ने प्रथम स्थान हासिल किया। उन्होंने डीआरडीओ की टेक्नोलाजी डेवलपमेंट फंड (टीडीएफ) योजना के लिए परियोजना प्रस्ताव का विवरण भेजा है। अनुमोदित होने के बाद डीआरडीओ तकनीकी विकास के लिए 90 फीसद अनुदान सहायता प्रदान करेगा या 24 माह में तकनीक तैयार करने के लिए अधिकतम 10 करोड़ रुपये परियोजना मूल्य प्रदान करेगा। डा. शिवानी बताती हैं कि इस तकनीक को पेटेंट कराने की प्रक्रिया भी जारी है।

वीहांत टेक्नोलाजीज के सीईओ कपिल बरडेजा ने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) के लिए डाटाबेस तैयार करना पड़ता है। जितनी विशेषताएं सॉफ्टवेयर में जोड़ी जाएंगी, व्यक्ति को पहचानने की संभावना भी उतनी ही बढ़ जाएगी।

भारतीय पुलिस सेवा अधिकारी (सेवानिवृत्त) आरके चतुर्वेदी ने बताया कि देश के हर एयरपोर्ट पर इसका उपयोग किया जा सकता है। यदि कोई आतंकवादी हुलिया बदलकर देश में घुसने का प्रयास करता है तो उसको भी आसानी से पकड़ा जा सकेगा। जिलों में मिलने वाले अज्ञात शवों की पहचान में भी यह मदद करेगा।

सॉफ्टवेयर में चार तरीके से पकड़ में आएगा अपराधी

1 हड्डियों का ढांचा: हुलिया बदलने पर भी अपराधी अपने शरीर की हड्डियों का ढांचा नहीं बदल सकता। इसी ढांचे की मदद से उसे पहचाना जा सकेगा।

2 गैट रिकग्निशन: अगर कोई व्यक्ति जान बूझकर लंगड़ाकर चल रहा है तो भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से उसे पहचाना जा सकेगा।

3 मूवमेंट पैरामीटर: शरीर की प्रतिक्रिया के आधार पर बैठने-उठने से लेकर हर हरकत को जांचा जा सकेगा।

4 आक्लूडिड फेस रिकग्निशन: बंद/ढके हुए चेहरे की भी पहचान की जा सकेगी। कोई व्यक्ति मास्क, गमछा या किसी अन्य चीज से चेहरा छिपाता है तो भी उसका पता लगाया जा सकेगा।

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