Ebrahim Alkazi Passes Away: नेहरू, अटल और आडवाणी भी आते थे इस दिग्गज रंगकर्मी का नाटक देखने

Ebrahim Alkazi Passes Away: नेहरू, अटल और आडवाणी भी आते थे इस दिग्गज रंगकर्मी का नाटक देखने
Publish Date:Wed, 05 Aug 2020 01:37 PM (IST) Author: JP Yadav

नई दिल्ली [संजीव कुमार मिश्र]। Ebrahim Alkazi Passes Away:  इब्राहिम अल्काजी की जिंदगी किसी नाटक की कहानी की मानिंद थी। अंग्रेजी में पढ़ाई की, शुरूआती नाटक भी अंग्रेजी में ही किए। लेकिन दिल्ली में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की कमान संभाली तो हिंदुस्तानी भाषा में ही नाटक मंचित करने का निर्णय लिया। जिस दौर में नाटकों काे रेडियो के नजरिए से देखने का चलन था। यह अल्काजी ही थे, जो रंगमंच को खुले में लेकर आए। मंच बना पुराना किला, तालकटोरा, फिरोजशाह किला। अल्काजी समय के बड़े पाबंद थेे। एक सेकेंड भी लेट होना उन्हें पसंद नहीं था। एक कदम आगे बढ़कर अभिनव प्रयोगों को प्रोत्साहित करने वाले तो थे ही अपने विचारों को दूसरों पर थोपते नहीं थे। छात्रों व सहकर्मियों के विचारों को पूरी तवज्जो देते थेे।

मुंबई से दिल्ली का सफर

नाट्य समीक्षक जयदेव तनेजा कहते हैं कि मुंबई में अल्काजी जी अंग्रेजी थियेटर करते थे। बाद में वो राडा(रॉयल अकादमी आफ ड्रामेटिक आर्ट) लंदन चले गए। वहां से जब भारत लौटे तो अपना थियेटर ग्रुप भी बनाया। जिसके जरिए अंग्रेजी में नाटकों का मंचन करते। सन 1962 में वो दिल्ली आए। उन्हें राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का निदेशक बनाया गया। एनएसडी के पूर्व निदेशक राम गोपाल बजाज कहते हैं कि पहले इसे एशियन थियेटर इंस्टीट्यूट के नाम से जाना जाता था। यह अल्काजी ही थे, जिन्होने इसे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नाम दिया। अल्काजी दिल्ली तो आ गए लेकिन चुनौतिया कम नहीं थी। जयदेव कहते हैं कि हिंदी वालों की नजरों में वो बाहरी ही थे। लेकिन दिल्ली आने पर अल्काजी ने सुनिश्चित किया कि नाटक अब हिंदी-उर्दू मिश्रित हिंदुस्तानी में ही बनाएंगे। मोहन राकेश के आषाढ़ के एक दिन के मंचन ने लोगों की धारणा बदलने में मदद की।

समय के पाबंद

राम गोपाल बजाज अल्काजी के निदेशक बनने के बाद पहले बैच के छात्र थे। कहते हैं, पटना में हिंदी से स्नातकोत्तर कर रहा था। नाटकों का शौक था। अल्काजी जी ने चुन लिया। उस समय ओमपुरी हमारे सीनियर थे। अल्काजी जी समय के पाबंद थे। कक्षा में जब वो प्रवेश करते थे तो हम समझ जाते थे कि पांच सेकेंड ही बचा है। उनकी विश्व साहित्य, आर्किटेक्चर, कलाओं पर जबरदस्त पकड़ थी। वो नाटकों के दौरान पात्रों की वेशभूषा से लेकर विभिन्न सामानों के रंग, आकृति तक खुद ही तैयार करवाते। उन्होने अपने कार्यकाल में नाट्य उत्सव शुरू करवाया।

नेहरू, इंदिरा ने पूरा नाटक देखा

नाटकों को उन दिनों रेडियो की सीमा में बांधा जा रहा था। अंधायुग सरीखे कहानियाें को रेडियो, टीवी के मुफीद ही माना जाता था। लेकिन अल्काजी ने सबकी सोच ही बदल दी। 10 अक्टूबर 1963 को फिरोजशाह कोटला में अंधायुग नाटक का मंचन हुआ। दिल्ली एक रंगमंचीय क्रांति का गवाह बनी। नाटक प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी देखने आने वाले थे। तय था कि नेहरू जी 25-30 मिनट ही नाटक देखेंगे। अंधायुग में विदुर की भूमिका निभाने वाले रामगोपाल बजाज कहते हैं कि अल्काजी परेशान थे। बोले, नेहरू जी नाटक के बीच में से उठकर जाएंगे तो व्यवधान पड़ेगा। खैर, नेहरू जी के साथ इंदिरा गांधी भी नाटक देखने आयीं थी। नाटक शुरू हुआ। करीब 25 मिनट बाद सुरक्षाकर्मी ने लाइट जलाकर जलाकर नेहरू और इंदिरा को चलने का इशारा किया। लेकिन नाटक इतना प्रभावी था कि नेहरू और इंदिरा ने जाने से मना कर दिया। अंधायुग में एनएसडी के छात्रों ने ही अभिनय किया था, ओम शिवपुरी सहायक निर्देशक थे। इसके बाद तुगलक, कंजूस सरीखे नाटकों को खूब पसंद किया गया। अटल जी, आडवाणी और शीली दीक्षित सरीखे दिग्गज नेता भी टिकट खरीदकर नाटक देखने आते। 

इन कलाकारों ने सीखे अभिनय के गुर

अल्काजी की छत्रछाया में अभिनय की बारीकियां सीखने वालों में ओम शिवपुरी, नसीरुद्​दीन शाह, सुधा शर्मा, मनोहर सिंह, अनुपम खेर, बलराज पंडित, उत्तरा बोकर, ज्योति सुभाष, सुहास जोशी, बी. जयश्री, विजय मेहता आदि शामिल हैं।

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