Air Pollution: संसदीय समिति ने भी वायु प्रदूषण पर राज्यों को आड़े हाथों लिया

पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की अध्यक्षता वाली 30 सदस्यीय की ड्राफ्ट रिपोर्ट में ‌र्प्रदूषण से जंग में दिल्ली हरियाणा राजस्थान उत्तर प्रदेश एवं पंजाब की लापरवाहियों को गिनाने के साथ-साथ अनेक सिफारिशें भी की गई हैं।

Jp YadavFri, 03 Dec 2021 07:25 AM (IST)
Air Pollution: संसदीय समिति ने भी वायु प्रदूषण पर राज्यों को आड़े हाथों लिया

नई दिल्ली [संजीव गुप्ता]। दिल्ली-एनसीआर में लगातार खतरनाक स्तर पर चल रहे वायु प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने तो नाराजगी जताई ही है, संसदीय समिति ने भी सभी संबंधित राज्यों को आड़े हाथों लिया है। पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की अध्यक्षता वाली 30 सदस्यीय इस समिति ने बुधवार को ही लोकसभा और राज्यसभा में सदन पटल पर अपनी 35 पृष्ठों की ड्राफ्ट रिपोर्ट पेश की है। इस रिपोर्ट में ‌र्प्रदूषण से जंग में दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश एवं पंजाब की लापरवाहियों को गिनाने के साथ-साथ अनेक सिफारिशें भी की गई हैं। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए किए गए उपायों, बनाई गई योजनाओं एवं की गई कार्रवाई की जानकारी भी समिति को केवल दिल्ली से मिल पाई, अन्य राज्यों से नहीं।

वायु प्रदूषण की मुख्य वजह पराली और वाहनों का धुआं, टूटी सड़कों एवं निर्माण-विध्वंस कार्यों से उड़ने वाली धूल है, लेकिन स्वास्थ्य पर इसके पड़ने वाले दुष्प्रभाव को लेकर किसी राज्य ने कोई अध्ययन तक नहीं कराया है। इसी तरह यातायात जाम और ओवरलोड पार्किंग से किस तरह प्रदूषण बढ़ रहा है, इसे लेकर भी अब तक कोई अध्ययन नहीं हुआ है।

संसदीय समिति की रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली में लैंडफिल साइट प्रदूषण की एक बड़ी वजह हैं। इनमें अक्सर आग भी लगती रहती है, बावजूद इसके आज भी 46 प्रतिशत कचरे का नगर निगमों द्वारा निस्तारण ही नहीं किया जा रहा। निर्माण एवं विध्वंस गतिविधियों से उड़ने वाली धूल की रोकथाम के लिए भी पुख्ता नियम नहीं हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली के मुख्य सचिव से 2016 में इस बाबत एक प्रेजेंटेशन देने को कहा गया था, लेकिन अभी तक नहीं दिया गया।

समिति की रिपोर्ट बताती है कि प्रदूषण से निपटने के बारे में सोच विचार भी केवल सर्दियों के दिनों में ही किया जाता है जबकि दिल्ली एनसीआर में यह वर्ष भर रहने लगा है। इसी तरह प्रदूषण से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर का आकलन भी पिछली बार 2013 में ही किया गया था, उसके बाद नहीं। तब यह .84 प्रतिशत था जबकि अब कहीं ज्यादा हो गया होगा।

रिपोर्ट के मुताबिक विभिन्न विभागों द्वारा एक्शन टेकन रिपोर्ट जमा करा दी जाती है, लेकिन यह जांचा ही नहीं जाता कि कार्रवाई का असर क्या पड़ा। प्रदूषण से जंग में वन क्षेत्र बहुत उपयोगी भूमिका निभाता है, लेकिन राज्य सरकारें अपने वन क्षेत्र का अस्तित्व बचाए रखने और उसे बढ़ाने के लिए भी बहुत गंभीर नहीं है। समिति ने सुझाव दिया है कि सभी संबंधित राज्य एकीकृत कार्ययोजना बनाएं और उसे ईमानदारी व सख्ती से अमल में लाएं। ईस्टर्न और वेस्टर्न पैरीफिरल एक्सप्रेस वे के दोनों ओर ज्यादा से ज्यादा वृक्षारोपण करें। पराली के धुएं की समस्या से निजात दिलाने के लिए ऐसी योजना बनाएं कि उसका निस्तारण खेतों में ही हो जाए।

योजना तैयार करते समय कुछ किसानों और कृषि विज्ञानियों को भी अवश्य साथ लें। इसके अलावा समिति की ओर से एक अहम सिफारिश यह की गई है कि प्रदूषण बढ़ने पर भी निर्माण एवं विध्वंस कार्यों पर रोक नहीं लगानी चाहिए। वजह, इससे बड़ी संख्या में मजदूरों को रोजगार मिलता है और उनकी आजीविका चलती है। इस पर रोक से उनके जीवनयापन और आजीविका के अधिकार का भी हनन होता है जो कतई सही नहीं है। रोक की बजाए इन कार्यों से उड़ने वाली धूल की रोकथाम के इंतजाम किए जाने चाहिए। 

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