Delhi: अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के लिए अपराजिता ने पकड़ी वकालत की राह

कड़कड़डूमा कोर्ट में वकालत कर रही हैं अपराजिता
Publish Date:Mon, 19 Oct 2020 10:17 PM (IST) Author:

नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। पीड़ित लोगों को न्याय दिलाने के लिए दयालपुर निवासी अधिवक्ता अपराजिता शर्मा ने वकालत की राह पकड़ी। 10 वर्ष से वे वकालत कर रही हैं। अपराजिता उन लोगों के लिए उम्मीद की किरण हैं जो शोषण का शिकार हो रहे हैं, लेकिन आर्थिक तंगी के चलते अपने हक की लड़ाई नहीं लड़ पाते। वे आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को न्याय की लड़ाई में जीत दिलाने के लिए आगे बढ़कर काम कर रही हैं। उनके पास मदद की गुहार लेकर आने वाले कई जरूरतमंद लोगों को वे निश्शुल्क कानूनी सलाह भी देती हैं।

कड़कड़डूमा कोर्ट में वकालत कर रही अपराजिता ने बताया कि स्कूली शिक्षा के दौरान ही अपने राजनीतिक विज्ञान के शिक्षक शशि भूषण की बातों से प्रेरित होकर उन्होंने वकालत करने का मन बना लिया था। उन्होंने कहा कि एक वकील के पास बहुत ताकत होती है, बशर्ते वह उसका सही जगह इस्तेमाल करे। अपराजिता ने बताया कि स्कूल के बाद जब उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज में दाखिला लिया तो जाना कि महिलाओं के साथ कितना शोषण व अन्याय होता है।

इसके बाद तो उन्होंने प्रण किया कि वे अब वकालत करेंगी। उन्होंने स्नातक के बाद मेवाड़ लॉ इंस्टीट्यूट से वकालत की पढ़ाई की। इसके बाद अब वे पीड़ितों की मदद कर रही हैं। महिला व पुरुष में नहीं किया भेदभाव भले ही अपराजिता ने वकालत महिलाओं पर हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज उठाने के लिए की, लेकिन उन्होंने देखा कि समाज में कहीं न कहीं पुरुषों का भी शोषण होता है। फिर उन्होंने समान रूप से सोचकर व परिस्थिति को समझकर पीड़ित का साथ दिया। उन्होंने बताया कि 2014 में उनके पास एक घरेलू हिंसा का मामला आया और 2019 में जाकर उसमें दोनों पक्ष के बीच समझौता हुआ।

करीब पांच वर्ष तक चले इस केस की लड़ाई लड़ने के लिए उन्होंने अपने मुवक्किल से कोई फीस नहीं ली। उन्होंने बताया कि नेहरू विहार क्षेत्र में आफताब नाम के लड़के पर उसकी पत्नी ने दहेज व घरेलू हिंसा का आरोप लगाया था। इस कारण आफताब कई बार जेल भी गया, क्योंकि वह पत्नी को गुजारा भत्ता देने की स्थिति में नहीं था। उन्होंने बताया कि वह दिहाड़ी मजदूर था और मुश्किल से उसका गुजारा चलता था। बाद में 80 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने की शर्त पर उसकी पत्नी ने कड़कड़डूमा कोर्ट के मध्यस्थता केंद्र में समझौता किया और दोनों का तलाक हुआ। अब दोनों ने दूसरी शादी कर ली है और अपने जीवन में खुश हैं। इसी तरह उन्होंने कई महिलाओं के केस भी लड़े, जिनके साथ घरेलू हिंसा होती थी। उन्होंने बिना फीस लिए उन महिलाओं के लिए हक की लड़ाई लड़ी।

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