दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण को रोकने के लिए किए जा रहे उपायों में कागजी ज्यादा और जमीनी कम, जानिए अन्य कारण

Delhi-NCR Air Pollution News Update प्रदूषण के औसत स्तर में 25 प्रतिशत तक की कमी भी दर्ज की गई है। लेकिन अभी भी दिल्ली की हवा स्वच्छ नहीं कही जा सकती। सांस लेने के लिए प्रदूषण के कण में 60 से 65 प्रतिशत तक और कमी लाने की जरूरत है।

Vinay Kumar TiwariPublish:Wed, 24 Nov 2021 11:52 AM (IST) Updated:Wed, 24 Nov 2021 11:52 AM (IST)
दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण को रोकने के लिए किए जा रहे उपायों में कागजी ज्यादा और जमीनी कम, जानिए अन्य कारण
दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण को रोकने के लिए किए जा रहे उपायों में कागजी ज्यादा और जमीनी कम, जानिए अन्य कारण

नई दिल्ली [संजीव गुप्ता]। वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए जन सहयोग अत्यंत आवश्यक है। हालांकि, दिल्ली-एनसीआर में अब थोड़े बहुत प्रयास होने लगे हैं और इन प्रयासों का आमूलचूल असर भी नजर आने लगा है। यही वजह है कि मौजूदा दशक के शुरुआती सालों के मुकाबले प्रदूषण के औसत स्तर में 25 प्रतिशत तक की कमी भी दर्ज की गई है। लेकिन अभी भी दिल्ली की हवा स्वच्छ नहीं कही जा सकती और खुलकर सांस लेने के लिए इसमें प्रदूषण के कण में 60 से 65 प्रतिशत तक और कमी लाने की जरूरत है।

दरअसल, समस्या यह है कि प्रदूषण की रोकथाम के लिए जो भी उपाय किए जाते रहे हैं, उनमें कागजी ज्यादा और जमीनी कम हैं। प्रतिबंध के बावजूद जगह-जगह सड़कों पर मलबा डंप किया जाता रहा है जो अभी भी बदस्तूर जारी है। कचरे में आग तो लगाई ही जा रही है, पूर्वी और बाहरी दिल्ली सहित एनसीआर के विभिन्न हिस्सों में प्लास्टिक भी खूब जलाया जाता है। तांबा निकालने के लिए रबड़ जलाने तक की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। इन मामलों में सख्त कार्रवाई का प्रविधान जरूर है, लेकिन वोट बैंक के लालच में अमूमन की नहीं जाती।

दिल्ली में प्रदूषण के लिए पराली का धुआं और बायोमास जलना ही नहीं, वाहनों का धुआं भी बहुत हद तक जिम्मेदार है। साल दर साल 5.81 प्रतिशत की दर से राजधानी में निजी वाहनों की संख्या बढ़ती जा रही है। यह संख्या एक करोड़ 32 लाख के आंकड़े को छू रही है। दिल्ली में सबसे अधिक दोपहिया वाहन और उसके बाद कार पंजीकृत हैं। जहां तक डीजल वाहनों की बात है तो इनकी संख्या निजी वाहनों में अच्छी खासी है जो प्रदूषण में इजाफे के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है। स्पष्ट है कि वाहनों की इस बढ़ी संख्या और इससे वायुमंडल पर हो रहे असर को कतई नहीं नकारा जा सकता।

कोरोना महामारी के दौरान देशव्यापी लाकडाउन के दौरान यह एकदम स्पष्ट हो गया है कि निजी वाहनों की संख्या कम करने, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने, औद्योगिक इकाइयों के प्रदूषण पर लगाम लगाने और विभिन्न स्तरों पर अंकुश लगाने से किस हद तक वायु, ध्वनि और जल प्रदूषण को कम किया जा सकता है। अत: भविष्य में इस दिशा में जो भी योजनाएं बनाई जाएं, उनमें लाकडाउन के अनुभव का समावेश अवश्य रहे। वैसे मेरा मानना है कि हालात सामान्य हो जाने पर भी विभिन्न स्तरों पर नियम-कायदों के साथ अंकुश बरकरार रखा जा सकता है।

लाकडाउन में यह भी सामने आया कि अगर संस्थागत स्तर पर निजी वाहनों के प्रयोग को कम करके कार पूल को बढ़ावा दिया जाए और सरकार भी सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करे तो हालात तेजी से सुधर सकते हैं। याद रखिए, छोटे छोटे प्रयास ही बाद में बड़ा प्रभाव दे जाते हैं। यह एक ऐसा छोटा प्रयास साबित होगा जो आगे चलकर दिल्ली और दिल्ली वासियों दोनों की ही सेहत को बेहतर बनाएगा। अगर दिल्ली एनसीआर के प्रदूषण को और कम करना है तो इसके लिए गंभीर रुख अपनाना होगा।

केवल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ही नहीं, दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए), केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी), लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी), नगर निगम (एमसीडी) और नई दिल्ली नगर पालिका परिषद (एनडीएमसी), दिल्ली कैंट सभी को मिलकर काम करना होगा। राज्य और केंद्र सरकार को भी निगरानी व जवाबदेही दोनों तय करनी होगी। सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को मजबूत करना होगा। इलेक्टिक वाहनों और साइकिल को भी बढ़ावा देना चाहिए। राज्य सरकारों की भूमिका काफी मायने रखती है। सरकारों को चाहिए कि वोट बैंक की नहीं बल्कि अपने मतदाताओं के स्वास्थ्य की भी चिंता करें।