शौर्यगाथा: दुर्गम र्गम रास्तों से भोजन-हथियार पहुंचाते थे कर्नल संत पाल

युद्ध के दौरान कर्नल संत पाल मेजर पद पर कार्यरत थे। उन्हें लाजिस्टिक डिपार्टमेंट में काम मिला था जिसके तहत उन्हें जवानों के लिए भोजन हथियार व अन्य जरूरी सामान को सही स्थानों पर पहुंचाना था। श्रीनगर से चलते हुए जब नेशनल हाइवे पहुंचते तो चुनौतियां बढ़ जाती थीं।

Mangal YadavSat, 31 Jul 2021 04:21 PM (IST)
सेना से सेवानिवृत्त कर्नल संत पाल ’ सौजन्य-स्वयं

नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। कारगिल युद्ध के दौरान सिपाहियों के लिए हथियार, भोजन और अन्य जरूरी सामान को पहुंचाने का काम मौत के मुंह में जाने के बराबर था। सेवानिवृत्त कर्नल संत पाल अपने अनुभवों को बयां करते हुए कहते हैं कि यह युद्ध उन्हें आजीवन याद रहेगा। आकस्मिक घोषित हुए इस युद्ध के लिए अधिक तैयारी करने का मौका नहीं मिला, लेकिन देश के बहादुर सिपाहियों ने दुश्मनों के छक्के छुड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। युद्ध में अडिग खड़े सिपाहियों को हथियार व अन्य सामग्री की कमी न हो, इसके लिए उन्होंने न दिन देखा न रात और अपनी टीम के साथ जुटे रहे।

दुर्गम रास्तों पर दुश्मनों का सामना

युद्ध के दौरान कर्नल संत पाल मेजर पद पर कार्यरत थे। उन्हें लाजिस्टिक डिपार्टमेंट में काम मिला था, जिसके तहत उन्हें जवानों के लिए भोजन, हथियार व अन्य जरूरी सामान को सही स्थानों पर पहुंचाना था। श्रीनगर से चलते हुए जब नेशनल हाइवे पहुंचते तो चुनौतियां बढ़ जाती थीं। इसके लिए लेह लद्दाख हाइवे के दुर्गम रास्तों से गुजरते हुए जाना था। करीब 300 किमी का लंबा रास्ता था।

कठिन डगर, लेकिन दिलों में हौसला

दुश्मन ऊंचाई पर थे इसलिए आसानी से हाइवे पर बमबारी कर रहे थे। इसलिए रात के अंधेरे में 250-300 वाहनों के जत्थे को बगैर किसी आवाज के धीरे-धीरे ले जाना होता था। सभी वाहनों की हेडलाइट बंद होती थी। कर्नल संत पाल ने बताया कि इन गाड़ियों में हथियार, इंजीनियर स्टोर, वायर, टेंट व भोजन शामिल होते थे। लगातार हो रही फायरिंग से कई बार गाड़ियां ध्वस्त हो जाती थीं। इसके बीच वाहनों के खराब होने पर किसी से संपर्क भी नहीं कर सकते थे। इन कठिनाइयों के बावजूद हौसले की कोई कमी नहीं थी, क्योंकि यह देश की आन बान और शान की लड़ाई थी। 

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