जानें- कौन है लिसीप्रिया कांगुजम, छोटी सी उम्र में बनाई अपनी वैश्विक पहचान, ये है सुर्खियों में आने की वजह

लिसीप्रिया कांगुजम ने बेहद कम उम्र में अपनी वैश्विक पहचान बनाई है।
Publish Date:Sun, 25 Oct 2020 08:53 AM (IST) Author: Kamal Verma

गुरुग्राम (प्रियंका दुबे मेहता)। प्रतिबद्धता देश और विश्व कल्याण के प्रति, जिद लोगों के कान और आंखें खोल जलवायु परिवर्तन के खतरे से आगाह करने की, दृढ़ निश्चय बदलाव की बयार लाने का और उम्मीद बेहतर और सुरक्षित भविष्य की नींव रखने की..। यह विशेषताएं किसी रिचर्स स्कॉलर या विज्ञानी की नहीं, बल्कि नौ वर्ष की लिसीप्रिया कांगुजम की हैं। इनकी उपलब्धियों की इबारत उम्र से कहीं आगे है। जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूकता फैलाने वाली दिल्ली के सफदरजंग निवासी लिसीप्रिया ने राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जिस तीव्रता और प्रभावशाली तरीके से अपनी बात रखी है, उसमें हर कोई उनकी प्रतिबद्धता का कायल हो गया।

लिसीप्रिया का नाम एक बार फिर चर्चा में उस वक्त आया जब उन्होंने गत दिनों राष्ट्रपति भवन के सामने रात में दिल्ली के लिए साफ आबोहवा की मांग करते हुए प्रदर्शन किया। उन्होंने इस दौरान मांग की कि दिल्ली में साफ हवा के लिए त्वरित कदम उठाए जाएं। जून 2019 में जब एक हफ्ते के अभियान के तहत लिसीप्रिया ने संसद भवन के सामने प्रदर्शन किया तो संसद में पहली बार छह राज्यसभा सदस्यों ने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को गंभीरता से उठाया। मार्च 2019 में लिसीप्रिया ने प्रधानमंत्री के ‘शी इंस्पार्स अस’ के सम्मान को यह कहकर लेने से इन्कार कर दिया कि उनकी बात नहीं सुनी जा रही थी। उन्होंने अपने प्रयासों से यह साबित कर दिखाया है कि बड़ा बदलाव लाने में उम्र का कोई लेना देना नहीं होता।

ऐसे हुई शुरुआत :

मणिपुर के एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखने वाली लिसीप्रिया को प्राकृतिक आपदाओं ने इस ओर खींचा। जलवायु परिवर्तन, 2015 में नेपाल में आए भूंकप के खबरें देखकर नन्ही लिसीप्रिया का दिल दहल गया। उन्होंने परिवार के साथ इंफाल से काठमांडू तक सहायता पहुंचाई। प्राकृतिक वादियों से घिरे उत्तर पूर्व हिस्से से 2016 में दिल्ली आईं तो यहां की आबोहवा में प्रदूषण देखकर उन्होंने मन बनाया कि वह इसे सुधारने की मुहिम छेड़ेंगी। इसके बाद वह ओडिशा गईं तो वहां पर लगातार टिटी और फेनी तूफानों ने उन्हें प्राकृतिक आपदाओं के कारणों को खोजने पर मजबूर कर दिया। उन्हें पता चला कि तूफान के खतरे का संबंध तापमान से है और तापमान जलवायु परिवर्तन का परिणाम है।

छह वर्ष की उम्र में यूएन सम्मेलन का हिस्सा:

2018 में लिसीप्रिया को मंगोलिया में हुए संयुक्त राष्ट्र आपदा सम्मेलन में हिस्सा लेने का मौका मिला। उन्होंने बताया कि यह मौका उनके लिए जीवन बदलने वाला साबित हुआ। स्वदेश लौटने के बाद पृथ्वी को बचाने के लिए विश्व के नेताओं तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए लिसीप्रिया ने ‘द चाइल्ड मूवमेंट’ नाम से संस्था की शुरुआत की। उन्होंने मांग की कि विश्व के नेता इस बात को गंभीरता से लें। बाद में 2019 में लिसीप्रिया ने स्पेन में हुए संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में विश्व नेताओं को संबोधित भी किया।

जन्मदिन पर ढाई लाख पौधों का तोहफा :

दो अक्टूबर को अपने जन्मदिन पर लोगों से ट्विटर पर अपने लिए शुभकामनाओं की जगह पेड़ लगाने की अपील की। लोग इससे प्रेरित हुए और विश्वभर में ढाई लाख पौधे लगाए गए। डॉ. केके सिंह और बिद्यारानी अपनी बेटी के प्रयासों में हमेशा उनका सहयोग करते हैं। लिसीप्रिया को इस लड़ाई में अपना स्कूल छोड़ना पड़ा। वह भुवनेश्वर में पढ़ाई कर रही थीं, लेकिन दिल्ली में प्रदर्शन, सम्मेलनों और चर्चाओं में हिस्सा लेने के कारण उन्हें स्कूली शिक्षा से वंचित रहना पड़ रहा है। इस खाई को मिटाने के लिए वह कभी फ्लाइट में पढ़ती हैं तो कभी पेड़ के नीचे बैठकर।

सम्मान व उपलब्धियां

लिसीप्रिया ने शुरुआत अपने घर से कर के दिखा दिया है कि वह केवल खोखले प्रदर्शन और बातें ही नहीं करतीं। उन्होंने अगस्त 2018 में केरल में बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए मुख्यमंत्री फंड को अपनी बचत से एक लाख रुपये का योगदान दिया। संयुक्त राष्ट्र और आइआइटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों सहित कई वैश्विक मंचों पर संबोधन के अलावा पृथ्वी दिवस की 50वीं वर्षगांठ पर वाशिंगटन डीसी में पोप फ्रांसिस सहित अन्य गणमान्य व्यक्तियों के साथ डिजिटल मंच पर आमंत्रित किया गया था। ग्लोबल चाइल्ड प्रोडिगी अवॉर्ड 2020, नोबल सिटीजन अवॉर्ड, विश्व बाल शांति सम्मान (2019) सहित दर्जनों सम्मान प्राप्त लिसीप्रिया को स्विडन की ग्रेटा थनबर्ग सहित चार अन्य बच्चों के साथ पहचान भी मिली है।

 

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