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मिसालः परों को खोल क्यों शर्मिंदा है तू, मेरे दोस्त ऊंची उड़ान का परिंदा है तू

नई दिल्ली [रीतिका मिश्रा]। यकीनन एक गुरु हमारे जीवन को गढ़ने में अहम योगदान रखते है। लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं कि गुरु कोई भी हो सकता है। आपके माता-पिता, रिश्तेदार, पड़ोसी या फिर आपके हमउम्र के दोस्त। और दोस्तों से जो बाते हमें जल्दी सीखने को मिलती है वो शायद ही कोई और उतनी जल्दी सीखा पाए। राजधानी दिल्ली के द्वारका सेक्टर 18 स्थित श्री वेंकटेशवर इंटरनेशनल स्कूल की छात्राएं ने एक अनूठी पहल शुरु की है। इसके तहत विद्यालय की कक्षा नौवीं से 12वीं तक की 48 छात्राओं ने श्री वेंकटेश्वर इंटरनेशनल स्कूल और उदयन संस्था के सहयोग से ‘उड़ान’ कार्यक्रम आयोजित किया।

जिसके तहत वह दिल्ली-एनसीआर के सरकारी स्कूलों की कक्षा 12वीं की 50 छात्राओं की ऑनलाइन वार्तालाप के जरिए अंग्रेजी सुधारने के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व को निखारने का काम कर रही हैं। इस कार्यक्रम में निजी स्कूल की छात्राएं गुरु की भूमिका निभा रही हैं और सरकारी स्कूल की छात्राएं शिष्य बन ज्ञान हासिल कर रही है। सरकारी स्कूलों की छात्राओं का मानना है कि कहीं व कहीं इस कार्यक्रम से उन्हें लाभ मिल रहा है। उनकी अंग्रेजी की हिचक दूर हो रही है। वो कहती है कि निजी स्कूलों की छात्राएं अंग्रेजी तो अच्छी कर ही रही है। साथ ही साथ उनके सुनहरे भविष्य को गढ़ने में भी अहम योगदान दे रही हैं।

रोजाना फोन पर होती है कक्षाएं

श्री वेंकटेशवर इंटरनेशनल स्कूल की कक्षा 11वीं की छात्रा मुस्कान ने बताया कि एक दिन उनकी शिक्षिका ने उन्हें फोन पर इस कार्यक्रम के बारें में बताया। जैसे हीं, उन्हें पता चला कि इसमें रोजाना एक घंटा सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राओं को अंग्रेजी सीखानी होगी। तो उन्होंने तुरंत हामी भर दी। और अगले ही दिन शिक्षिका की तरफ से सरकारी स्कूल में पढ़ने वाली छात्रा को फोन मिला दिया।

उन्होंने कहा कि शुरुआती बातचीत में तो लगा कि थोड़ा मुश्किल है लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे उस छात्रा की हिचक दूर की। मुस्कान बताती हैं कि पहले तो सिर्फ वो 10 से 15 मिनट ही बात करती थी। लेकिन अब बातचीत कई बार एक घंटे तक भी हो जाती है। इस दौरान वो एक दूसरे की पसंद-नापसंद, वातावरण, राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा करती हैं। मुस्कान के मुताबिक उनको बातचीत में पता चला कि सरकारी स्कूल में पढ़ रही छात्राओं को अक्सर वो सहपाठी नहीं मिल पाते जो लंबे समय तक अंग्रेजी में बात कर पाएं। और अंग्रेजी बोलने की इसी हिचक के चलते ये छात्राएं कई प्रतियोगी परीक्षाएं तो पास कर लेती है लेकिन साक्षात्कार में रह जाती हैं। उन्होंने कहा कि उनकी पूरी कोशिश है कि वो अंग्रेजी सीखाने में कामयाब हो।

आशा की किरण के जरिए एक दूसरे को जानने का मिला मौका

श्री वेंकटेशवर इंटरनेशनल स्कूल की कक्षा 11वीं की छात्रा महक ने बताया कि यह कार्यक्रम एक जुलाई से रखा गया था। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम करीब एक माह चलेगा। तो एक हफ्ता बीत जाने के बाद उन्होंने अपनी कुछ सहपाठियो के साथ मिलकर कार्यक्रम को और रोचक बनाने के लिए एक प्रतियोगिता आयोजित की। प्रतियोगिता का नाम था आशा की एक किरण। ये प्रतियोगिता जूम एप पर की गई। जिसके तहत सरकारी स्कूल और निजी स्कूल की छात्राओं को बताना था कि वो एक दूसरे के बारें में अब तक कितना जान पाई हैं।

उन्होंने बताया कि प्रतियोगिता को उन्होंने दो चरणों में बांटा था पहला चरण सपनों का उदयन जो कि एक समूह चरण था। दूसरा चरण था जीत के उदयन जो कि अंतिम चरण था। उन्होंने प्रत्येक चरण में दो राउंड रखे थे। पहला सामान्य ज्ञान बजर राउंड और दूसरा सरप्राइज राउंड। महक के मुताबिक कि फोन और जूम एप में बातचीत में अंग्रेजी सीखाने के साथ-साथ इस तरह की प्रतियोगिताओं से कहीं न कहीं उन छात्राओं में सीखने की ललक भी बढ़ेगी। और एक दूसरे को और बेहतर जानने का मौका मिलेगा।

कई मुद्दों पर होती है बात

सरकारी स्कूल में पढ़ने वाली कक्षा 12वीं की छात्रा पीयूष बताती हैं कि इस कार्यक्रम के तहत वो कमियां दूर हो रही है जो स्कूली शिक्षा के दौरान रह गई थी या नहीं पूरी हो पाई थी। उन्होंने बताया कि वो नेशनल प्लेयर रह चुकी है और उनका सपना एक आर्मी ऑफिसर बनने का है। उन्होंने कहा कि जब वो किसी को अंग्रेजी में बात करते देखती थी तो उन्हें लगता था कि अंग्रेजी बोलना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है।

पीयूष के मुताबिक अगर उन्हें उदयन संस्था द्वारा शुरु की गई उदयन शॉलिनी फेलोशिप प्राप्त करने का मौका नहीं मिलता तो शायद वो अंग्रेजी सीखने और अपने व्यक्तित्व का बेहतर विकास करने से वंचित रह जाती। पीयूष के मुताबिक उन्होंने निजी स्कूल की छात्रा से सबसे पहले खेलों को लेकर बातचीत की थी। बाद में, धीरे-धीरे कई और मुद्दों पर जैसे लॉकडाउन नहीं होता तो क्या स्थिति होती या वातावरण कितना साफ हुआ जैसे तमाम पहलुओं पर बातचीत होती।

वहीं, सरकारी स्कूल की छात्रा भावना ने बताया कि निजी स्कूल की छात्राएं बहुत संयम से और प्यार से अंग्रेजी सीखाती है। उन्होंने बताया कि उनको अंग्रेजी में भूतकाल और भविष्यकाल आज तक समझ नहीं आए। लेकिन, जबसे उनकी निजी स्कूल की छात्रा से रोजाना फोन पर बातचीत शुरु हुई है तबसे सारी दिक्कत और हिचक मानों गायब हो गई है। उन्होंने बताया कि अब तो वह अपने छोटे भाई-बहनों से भी अंग्रेजी में बात करती हैं ताकि वो भी अंग्रेजी सीख पाएं।

श्री वेंकटेशवर इंटरनेशनल स्कूल की प्रधानाचार्या नीता अरोड़ा ने बताया कि उदयर केयर संस्था द्वारा शुरु की गई उदयन शालिनी फेलोशिप के तहत उनके स्कूल की छात्राओं ने इसमें सहभागिता की। उन्होंने बताया कि इस कार्यक्रम को शुरु करने से पहले उन्होंने अपने स्कूल की छात्राओं को यही सीख दी कि वह कम विशेषाधिकार प्राप्त छात्राओं के व्यक्तित्व के विकास में प्रभावी योगदान दे सकती हैं। उन्होंने कहा कि आज स्कूलों को जरुरत है कि वो अपने छात्रों को यह एहसास दिलाए कि उनकी शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक संपत्ति साझा करने से और ज्यादा बढ़ती है। उन्होंने कहा कि छात्रों को लगातार ऐसे कार्यक्रमों में भाग लेना चाहिए जिससे दूसरों को उन पर पर गर्व होने का अहसास हो।

उदयन केयर की संरक्षक और उदयन शालिनी फेलोशिप, ग्रेटर नोएडा चैप्टर के संरक्षक दीपक शर्मा ने बताया कि इस फेलोशिप के तहत वो कक्षा 11वीं से स्नातक तक छात्राओं के व्यक्तित्व को निखारने का, उनको पढ़ाई में मदद करने का काम करते हैं। उन्होंने बताया कि सरकारी स्कूलों की छात्राओं को अंग्रेजी तो अंग्रेजी के शिक्षक भी सिखा सकते थे। लेकिन हम उम्र में अक्सर छात्राओं को गलत अंग्रेजी बोल जाने में भी हिचक नहीं होती। और वो हम उम्र की छात्राओं से जल्दी सीख पाती हैं।

इसलिए इस कार्यक्रम में ऐसी छात्राएं चुनी गई तो अंग्रेजी में निपुण हो और सरकारी स्कूलों की छात्राओं को अंग्रेजी सिखा पाएं। उन्होंने कहा कि उन्हें बहुत खुशी है कि इस तरह के कार्यक्रम से सरकारी स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियों को लाभ मिल रहा है।

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