बढ़ती जा रही आबादी, नहीं बढ़े अस्पताल और डॉक्टर, झोलाछाप डॉक्टर निकाल रहे लोगों का दम

क्लीनिक नर्सिग होम व अस्पतालों का भी मानकीकरण होना चाहिए और क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के प्रावधानों के अनुरूप सुविधाएं होनी चाहिए। वहीं झुग्गी व जेजे कालोनियों समेत गांवों में झोलाछाप डाक्टरों की भरमार है। डाक्टरों की कमी से झोलाछाप डाक्टर लोगों के जीवन से खिलवाड़ कर रहे हैं।

Vinay Kumar TiwariFri, 23 Jul 2021 01:06 PM (IST)
सरकारी अस्पताल केवल छह हैं और बड़े प्राइवेट अस्पतालों की संख्या करीब 10 है।

नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। पिछले कुछ वर्षो में दिल्ली की आबादी में तेजी से वृद्धि हुई है, लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी पहले भी थी और आज भी है। उत्तरी पश्चिम दिल्ली क्षेत्र की आबादी करीब 45 लाख है, लेकिन सरकारी अस्पताल केवल छह हैं और बड़े प्राइवेट अस्पतालों की संख्या करीब 10 है। सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं की कमी और प्राइवेट अस्पतालों के भारी-भरकम बिल लोगों के लिए हमेशा चुनौती बने रहते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानकों के अनुसार, प्रति एक हजार व्यक्तियों पर एक डाक्टर होना चाहिए। लेकिन दिल्ली के ग्रामीण क्षेत्रों की बात करें तो नरेला व बवाना के अस्पतालों पर न केवल विधानसभा क्षेत्र के सैकड़ों गांव के लोगों की जिम्मेदारी है, बल्कि हरियाणा के दर्जनों गांव का भार भी इन्हीं पर है। ऐसे में दवाइयों व स्टाफ की कमी से अस्पताल लगातार जूझ रहे हैं, जिसका खामियाजा लोगों को भुगतना पड़ता है।

पांच लाख की आबादी लेकिन अस्पताल एक भी नहीं

किराड़ी विधानसभा क्षेत्र में करीब पांच लाख की आबादी है, लेकिन यहां के लोग छोटे-छोटे क्लीनिक और डिस्पेंसरी से ही अपना इलाज करवा रहे हैं क्योंकि इतने बड़े क्षेत्र में एक भी बड़ा अस्पताल नहीं है। दूसरी ओर बुराड़ी क्षेत्र में अस्पताल के नाम पर केवल कोविड अस्पताल है, जिसे कोरोना काल में बनाया गया। दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं के लिए यहां भी लोग केवल गलियों में चलने छोटे क्लीनिक और चैरिटेबल सेंटर ही सहारा हैं। घनी आबादी वाले क्षेत्रों में किराड़ी, बुराड़ी, मंगोलपुरी, जहांगीरपुरी जैसे क्षेत्र शामिल हैं जहां आबादी के लिहाज अस्पतालों की संख्या बढ़ाने की जरूरत है।

झोला छाप डाक्टरों की चांदी

इंटीग्रेटेड मेडिकल एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष और आयुर्वेद विशेषज्ञ डाक्टर आरपी पाराशर ने बताया कि तय मानकों के अनुसार पहले स्तर पर पांच हजार की आबादी पर एक डिस्पेंसरी या मोहल्ला क्लीनिक होना चाहिए। दूसरे स्तर पर दस हजार से पंद्रह हजार की आबादी पर एक कालोनी अस्पताल की जरूरत होती है। अगले स्तर पर 20 से 25 हजार की आबादी के लिए एक मल्टीस्पेशियलिटी हास्पिटल की आवश्यकता होती है।

इसी तरह क्लीनिक, नर्सिग होम व अस्पतालों का भी मानकीकरण होना चाहिए और क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के प्रावधानों के अनुरूप सुविधाएं होनी चाहिए। वहीं, झुग्गी व जेजे कालोनियों समेत गांवों में झोलाछाप डाक्टरों की भरमार है। इन्हें किसी का भय नहीं है। सुल्तानपुरी में गैर सरकारी संगठन से जुड़े दशरथ भारद्वाज का कहना है कि डाक्टरों की कमी से झोलाछाप डाक्टर लोगों के जीवन से खिलवाड़ कर रहे हैं।

आकस्मिक स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए नहीं है कोई व्यवस्था

कुछ गांवों में लोग आकस्मिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आज भी डिस्पेंसरी पर निर्भर है। इनमें कुतुबगढ़, पंजाब खोड़, बाजितपुर, कटेवड़ा, मुंगेशपुर, औचंदी, गढ़ी, रंठाला, टटेसर, नांगल ठाकरान, सुल्तानपुरी डबास, खेड़ा कलां, पल्ला जैसे गांव शामिल हैं। इस वजह से मरीजों की जान पर बन आती है। या यूं कहें कि राम भरोसे ही लोगों का इलाज हो रहा है। जठखोड़ गांव में आजादी के बाद अब तक एक भी डिस्पेंसरी या अन्य तरह की स्वास्थ्य सुविधा की शुरूआत नहीं हुई है।

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