मानसून में पिकनिक के लिए मशहूर थे ये स्थान, मुगल रानियों का वाटर पार्क बनता था महरौली

मेघ मल्हार मोहब्बत और झूले...दिल्ली का दिल है जो हर रंग समेटे। इतिहास है। परंपरा है। मौसम है तो प्रेम है। परंपराओं के साथ समृद्धि और आधुनिकता है। इन सभी रंगों का संयोजन ही तो राजधानी की उस तस्वीर को मुकम्मल करता है जिसमें हर कोई सराबोर हो जाता है।

Sanjay PokhriyalSat, 24 Jul 2021 03:16 PM (IST)
सावन की बारिश में दिल्ली कैसे इठलाती और इतराती रही

नई दिल्‍ली/गुरुग्राम [प्रियंका दुबे मेहता]। बात 1950 और 1960 के दौर की हो रही है। उन दिनों दिल्ली में मानसून मतलब पिकनिक हुआ करता था। गर्मी से परेशान लोग पहली बारिश से ही घरों से चींटियों की मानिंद निकलते थे। यहां पर कई लोकप्रिय पिकनिक स्पाट थे। इतिहासकार सोहेल हाशमी याद करते हुए बताते हैं कि दिल्ली का अंधेरिया मोड़ जो अब छतरपुर मेट्रो स्टेशन कहलाता है। यहां पर बहुत से आम के बाग थे। बीसवीं सदी के साठ के शुरुआती दौर में मानसून में लोग यहां दिन भर पिकनिक मनाने आते थे। उन दिनों चूंकि परिवार भी सह कुटुंब की भांति होते थे सो सभी एक साथ दिन भर के लिए तांगा किराए पर लेते थे, पुरानी दिल्ली से यहां पहुंच जाते थे। एक-एक परिवार पांच-छह तांगों में आता था। मांसाहारी लोग कीमा और दही में पकी हरी मिर्च की डिश और बेसन के पराठे साथ लेकर आते थे। इसके अलावा अपने साथ लोग बड़े-बड़े टबों में बर्फ डालकर लाते थे और फिर यहां के बागों से आम खरीदते थे।

माली से अपनी पसंद के आम तोडऩे को कहते थे और माली तोड़ दिया करता था। यहां आम ठेके पर उठते थे, ठेकेदारों को मंडी के बजाय इस तरह से आम बेचने में अधिक फायदा होता था। लोग दिन भर रहते, खानपान करते और इन आम की डालियों पर झूले डालते थे। बच्चे झूला झूलते और बड़े दरियों पर बैठ जाते थे। बचे हुए आम शाम को टब में भरकर अपने घरों को लौट जाते। शाकाहारी लोग अपने साथ खाना पकाने का सामान लाते थे। यहीं आकर आलू, सीताफल की सब्जी और पूरियां बनाते थे। अंधेरिया मोड़ का नाम ही इन पेड़ों की छांव से पसरे घने अंधेरे से पड़ा था। बहादुर शाह जफर के पिता द्वारा बनवाए इस बाग के पेड़ इतने सघन थे कि पूरे हिस्से में अंधेरा फैला रहता था, इसलिए इसे अंधेरिया बाग कहा जाने लगा। लोग शाम के समय यहां जाने में डरते थे।

मानसून में दूसरा पिकनिक स्पाट था हौज खास और तीसरा कुतुब मीनार। यहां लोग अंदर खाने पीने का सामान ले जाते थे। तब यहां पर इतने सैलानी नहीं होते थे तो परिसर खाली रहता था। आज जैसी पाबंदी भी नहीं होती थीं। वहां की जामा मस्जिद में तीन कोनों में स्थान बने थे जहां महिलाएं नमाज पढ़ सकती थीं। दिन में गर्मी के समय लोग वहां बैठ जाते थे, आसमान पर बादल होते तो लान में आ जाते थे।

नौका दौड़ का दौर : मानसूनी स्मृतियों में एक और सैर सपाटा स्थल होता था। जिसे ओखला कहा जाता है। यहां पर यमुना पर बैराज है जिसे आगरा कैनाल कहते हैं। यहीं पर सिंचाई विभाग ने विशालकाय और बेहद खूबसूरत बाग बनाया था जिसमें सैकड़ों परिवार आते थे। बैराज से पानी गिरता और वहां पर लोग बैठकर मछली पकड़ा करते थे। मानसून में एक दिन यहां सेल बोट रेसिंग की प्रतियोगिता होती थी जो 'देह्ली रिगेटा' कहलाती थी। इसे देखने के लिए दिल्ली भर से लोग आते थे। घोड़ा गाडिय़ों की भी एक रेस इसी मौसम में होती थी। गाडिय़ां सवारी के लिए नहीं होती थीं। उसमें बहुत बड़े पहिए होते थे। पुरानी दिल्ली से तिलक मार्ग से होकर रेस शुरू होती थी।

सावन की वो झड़ी... : दिल्ली गेट से निकलते ही कोटला फिरोजशाह भी पिकनिक स्पाट था। आसपास के लोग भोजन और दरियां लेकर पैदल चले आते थे। सोहेल बताते हैं कि वे लोदी स्टेट में रहते थे। ऐसे में खान मार्केट और दयाल सिंह कालेज को जाने वाली सड़क पर बरसात में गिल्ली-डंडा खेला करते थे। उस समय राहें जरूर संकरी थीं लेकिन ट्रैफिक नहीं ता। पंद्रह-बीस मिनट में कोई एक कार आ जाती थी। उस समय बरसात लगातार होती थी। उन दिनों बरसात होती थी तो पांच-छह दिन लगातार होती थी। आसमान हर समय काली बदरी से ढका रहता था। कभी जोर की बारिश तो कभी फुहारें...इसी को तो बरसात की झड़ी कहते थे। पुराने शहर में जब पांच-छह दिन बाद सूरज निकलता था तब पुराने घर गिरने की आवाज आती थी। पता चलता था कि फलां गली में घर गिर गया।

बारिश...इंडिया गेट और इतवार : भले ही दिल्ली को अपनी बेहतरीन आकिटेक्चर से खूबसूरत बनाने वाले एडविन लुटियंस की इंडिया गेट के पास झील बनाकर उसे यमुना से जोडऩे की योजना फलीभूत नहीं हो सकी लेकिन मानसून आते ही इंडिया गेट के विभिन्न हिस्से किसी झील से कम प्रतीत नहीं होते थे। इस मौसम का लुत्फ होने की बात हो तो लोग सबसे पहले इंडिया गेट का ही रुख करते हैं। हालांकि इस बार इस हिस्से में वह चहल-पहल नहीं होगी लेकिन लंबे समय से इंडिया गेट पर बरसात के मौसम में खुशनुमा मौसम का नजारा लेने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते थे। लोग हल्की फुहारों के बीच निकल पड़ते थे अपने पसंदीदा स्थानों पर। इतिहासकार सोहेल हाशमी बताते हैं कि मानसून में लोग इंडिया गेट के लान में बैठे रहते थे। वहां से इंडिया गेट तक वाक किया करते थे। लोग पहले ही सोच लेते थे कि फलां इतवार को फलां जगह जाना है, तांगा दिनभर के लिए हायर होता था।

ऋतु नहीं, जलसा था मानसून : इतिहासकार राणा सफवी का कहना है कि दिल्ली के लिए वर्षा ऋतु फूलों का उत्सव हुआ करती थी। फूलवालों की सैर और अमीर खुसरो के कलामों से यह मौसम प्रेममय और संगीतमय हो उठता था। सावन के झूलों की वह मस्ती और रंग-बिरंगे फूलों से महकती फिजा मानसून में अपने शबाब पर हुआ करती थी। दिल्ली में मानसून का उल्लास हर दौर में देखने को मिलता है। तभी तो हजरत निजामुद्दीन औलिया रहे हों या फिर बहादुर शाह जफर का दौर, हर दौर में सावन एक रुत नहीं बल्कि एक जलसा था, एक उत्सव हुआ करता था। गंगा-जमुनी तहजीब के बेमिसाल नमूने का गवाह थी दिल्ली की बरसात। आज भी दिल्ली में झूलों की पींगे पड़ती हैं, आज भी मल्हार के सुर बिखरते हैं और आज भी लोगों में वही उत्साह नजर आता है।

मानसून का मतलब महरौली : इतिहासकार स्वपना लिडले कहती हैं कि एक वक्त था मानसून मतलब ही महरौली होता था। मुगल काल में लोग महरौली जाते थे, वहां आम के बाग में झूले लगाते थे और इस मौसम का लुत्फ उठाते थे। स्वप्ना बताती हैं कि हौज-ए-शम्सी के पास स्थित झरना स्मारक के पास पहले झरने के रूप में पानी बहता था। असल में होता ऐसा था कि वहां पर स्थित हौज-ए-शम्सी मानसून में उफन आता था और एक झरने का रूप ले लेता था। उस समय शाही मुगल रानियां और उनकी सहेलियां यहां आती थीं और मानसून में नहाने और जल क्रीड़ा का आनंद लेती थीं। मानसून में उस इलाके को चारो तरफ से बंद कर दिया जाता था केवल शाही परिवार की महिलाएं मानसून का उत्सव मनाती थीं। दिलचस्प बात यह है कि झरने के नीचे एक पत्थर भी था जिसे महिलाएं वाटर स्लाइड की तरह फिसलने के लिए उपयोग में लाती थीं। दूसरी बात यह कि आज बसंत में होने वाली फूलवालों की सैर उस समय मानसून में हुआ करती थी। फूलवालों की सैर और मानसून उत्सव का हिस्सा बनने के लिए के लिए दूर-दूर से लोग आते थे और आसपास के घरों पर किराए पर रुका करते थे।

बादशाह के कलाम में दिल्ली और बरसात : दिल्ली की बरसात कितनी मोहक होती है। जरा सी बूंदे पड़ीं तो इंडिया गेट पर लोगों हुजूम उमड़ पड़ता है। दिल्ली में यह उत्साह केवल आज ही नहीं बल्कि पहले ऐसा ही थी। इतिहासकार स्वपना लिडले कहती हैं कि दिल्ली में मानसून आते ही उनके मन में अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर द्वारा लिखी कविता याद आ जाती है। वे कहती हैं कि बहुत लोगों को यह पता नहीं होगा कि मुगल बादशाह ने अपनी कविताएं फारसी और उर्दू के अलावा ब्रज और पंजाबी भाषा में भी लिखी थीं। उनकी लिखी एक कविता में दिल्ली और मानसून की खुमारी का संबंध मिलता है। 'झूला किन्ने डालो री अमराइयां, बाग अंधेरी ताल किनारे, मोर झंगारे, बादर कारे, बरसन लगीं बूंदें, फुइयां-फुइयां झूला किन्ने डारो री अमराइयां...।' मानसून में महरौली पर यह कविता बादशाह की पंजाबी रचना थी। इस कविता में दिल्ली के महरौली इलाके के नाम हैं, जैसे बाग अंधेरी आज का अंधेरिया मोड़, ताल को शम्सी तालाब और भूल भुलैया यानी की आज आदम खान की कब्र के लिए लिखा गया है। दिल्ली में मानसून का एक अलग ही रंग हुआ करता था। झूले, मल्हार और प्रेम के जो रंग प्रस्फुटित होते थे उसमें पूरी दिल्ली सराबोर हो जाया करती थी।

सौंधी हवा में जायके की खुशबू : मालवीय नगर निवासी आरके शर्मा 1960 के दौर को याद करते हुए बताते हैं कि बारिश की बूंदें चांदनी चौक के ऐतिहासिक भवनों पर पड़ती थीं तो उसका एक अलग आकर्षण होता था। याद करते हुए बताते हैं कि कैसे चांदनी चौक में छोले भटूरे, समोसे और जलेबियों का लुत्फ उठाने के लिए दूर-दूर से दोस्तों को बुलाते थे। इतना अच्छा लगता था कि वह मजा आज की पार्टियों और क्लब में तलाशने से भी नहीं मिल सकता।

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