सराय से जेल और फिर बना अस्पताल, लाहौर से जुड़ा है लेडी हार्डिंग का इतिहास, एक पैसे में रखी गई थी नींव

दिल्ली के तीन बड़े अस्पताल एलएनजेपी, डीडीयू और लेडी हार्डिंग की विरासत से रूबरू होंगे :

अब वक्त आ गया है इस स्वास्थ्य ढांचे का और विस्तार हो इतिहास के ढांचे को और समृद्ध किया जाए। इस कड़ी में दिल्ली के तीन बड़े अस्पताल एलएनजेपी डीडीयू और लेडी हार्डिंग की विरासत से रूबरू होंगे

Sanjay PokhriyalSat, 08 May 2021 10:11 AM (IST)

प्रियंका दुबे मेहता, भगवान झा। दिल्ली के प्रमुख अस्पतालों के इतिहास की बात करें तो कभी वे सराय थे, कभी जेल तो कभी स्वतंत्रता सेनानियों को सजा देने के स्थल। अस्पतालों के मुगलकालीन भवन हों या फिर अंग्रेजों के समय में बने अस्पताल, आज सभी एकजुट होकर महामारी को हराने और लोगों को बचाने का काम कर रहे हैं। शुरुआत करते हैं। दिल्ली के नामी अस्पताल एलएनजेपी यानी लोक नायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल से। यहां कभी जेल हुआ करती थी। केंद्रीय जेल कभी 30 एकड़ इलाके में फैली थी। बताया जाता है कि इसी जेल में 1912 में लार्ड हार्डिंग को मारने की साजिश करने वालों को मृत्युदंड देने से पहले रखा गया था।

बंटवारे के बाद पाकिस्तान से आए शरणार्थी: इतिहासकार सोहेल हाशमी का कहना है कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 1942 में उनके पिता को भी दो वर्षों के कारावास में वहां रखा गया था। 10 जनवरी 1930 को एक अस्पताल बनाया गया जिसकी आधारशिला उस समय के वायसराय लार्ड इरविन ने रखी थी। बंटवारे के बाद पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के लिए 350 बेड का यह अस्पताल छोटा साबित होने लगा और इसमें संसाधनों का विकास किया गया। भाजपा के वरिष्ठ नेता रहे प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा का कहना है कि जब उनका परिवार पाकिस्तान से दिल्ली आया था एक इरविन अस्पताल ही था जिसका नाम लिया जाता था। बढ़ती आबादी और शहर के विकास के साथ इस अस्पताल में चिकित्सा सुविधाएं, संसाधन और ढांचागत विकास हुए और इसी के साथ सन 1977 में इसका नाम इरविन से बदलकर लोक नायक जयप्रकाश नारायण के नाम पर रख दिया गया। मौलाना आजाद मेडिकल कालेज इसी अस्पताल का हिस्सा है।

मुगल शासक अकबर के समय में यहां सराय बनाई: सोहेल हाशमी बताते हैं कि जेल में बनी सेल का संरक्षण नहीं किया गया। सेंट्रल जेल तिहाड़ स्थानांतरित कर दी गई। कुछ समय पहले इस स्थान पर भूमिगत चैंबर भी मिले थे। एलएनजेपी अस्पताल अंग्रेजों के समय में तो सेंट्रल जेल थी लेकिन इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि मुगलों के दौर में यह जेल सराय के तौर पर उपयोग में लाई जाती थी। अनुमान लगाया जाता है 16वीं शताब्दी के अंत और 17वीं शताब्दी की शुरुआत में मुगल शासक अकबर और जहांगीर के समय में यहां सराय बनाई गई थी। यहां लोग यात्रा के दौरान विश्राम किया करते थे। कुछ जगहों पर सराय में तहखाने भी बने हुए थे। सोहेल हाशमी बताते हैं कि यह तहखाने गर्मी से बचाव के लिए बनाए गए थे। दिल्ली विवि में इतिहास की एसोसिएट प्रोफेसर शमा मित्रा चिनाय ने मिर्जा संगीन बेग की पुस्तक 'सैर-उल-मंजिल' का अनुवाद किया है, उसमें लिखा है कि इस स्थान पर 1821 में एक जेल थी, वह इसलिए कि सराय इतनी मजबूत थी कि वहां पर जेल बनाना सबसे मुनासिब लगा। यह जेल 20वीं शताब्दी के मध्य तक रही। इसका कुछ हिस्सा पुरातत्व विभाग के तहत भी आता है।

'एक पैसे' से रखी दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल की नींव: पश्चिमी दिल्ली के साथ ही हरियाणा के कई इलाकों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी संभाल रहे पंडित दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल का अतीत आज के हुक्मरानों के लिए कई तरह की नसीहत दे रहा है। अस्पताल की बुलंद इमारत यह बता रही है कि अगर किसी काम में शिद्दत से लग जाओ तो पूरी कायनात उसे मिलाने की कोशिश में जुट जाती है। 1970 तक पश्चिमी दिल्ली का इलाका स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा था। लोगों को छोटी-मोटी बीमारियों के इलाज के लिए भी नई दिल्ली के अस्पतालों का रुख करना पड़ता था। इससे लोग परेशान होते थे। उस दौरान भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा दिल्ली के चीफ एग्जीक्यूटिव काउंसलर थे। चीफ एग्जीक्यूटिव काउंसलर का अधिकार मुख्यमंत्री के समान होता था।

बिजली बिल पर प्रति यूनिट एक पैसे की बढ़ोतरी शामिल: प्रो. मल्होत्रा बताते हैं कि उन्होंने केंद्र सरकार से इलाके में अस्पताल बनवाने के लिए बजट की मांग की, लेकिन केंद्र ने उसे खारिज कर दिया था। उनके पास पैसे नहीं थे, लेकिन उन्होंने ठान लिया था कि अस्पताल ही नहीं, स्टेडियम और कालेज का भी निर्माण कर के रहेंगे और अपने इस सपने को साकार करने के लिए केंद्र सरकार से बराबर बातचीत जारी रखी। प्रो.मल्होत्रा ने बताया कि इसके बाद दो-तीन चीजों पर टैक्स बढ़ाया, जिसमें औद्योगिक क्षेत्रों में बिजली बिल पर प्रति यूनिट एक पैसे की बढ़ोतरी शामिल है। उस दौरान उद्यमियों ने भी हंसते-हंसते इस बात को स्वीकार किया और फिर बढ़े हुए टैक्स से आए पैसे का उपयोग वर्ष 1970 में दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल के अलावा दिल्ली के दो अन्य अस्पतालों के निर्माण में होने लगा।

हरि नगर में दिल्ली विकास प्राधिकरण की जमीन पर सबसे पहले टिनशेड में दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल की शुरुआत 50 बेड से की गई। धीरे-धीरे इलाके की आबादी बढ़ती गई और वर्ष 1987 में नई इमारत बनी, इस अस्पताल को 500 बेड का किया गया। इस दौरान आपातकालीन विभाग भी खोला गया, लेकिन तब तक इस विभाग ने 24 घंटे काम करना शुरू नहीं किया था। वर्ष 1998 में इस अस्पताल में 24 घंटे इमरजेंसी सेवा शुरू कर दी गई और यह दिल्ली के बड़े अस्पतालों में शुमार हो गया। अस्पताल का विस्तार यहीं नहीं रुका और वर्ष 2008 में नए ट्रामा सेंटर का निर्माण होने के साथ ही बेड की संख्या 640 हो गई। आज इस महामारी की घड़ी में मरीजों की आस तो बना हुआ ही है...और अगले विस्तार की गुहार भी लगा रहा है।

महिलाओं की मांग पर पर बना अस्पताल : अब बात करते हैं लेडी हाॄडग अस्पताल की। 1918 में बनकर तैयार हुआ एकमात्र महिला मेडिकल कालेज था। जिस समय इसकी नींव बतौर महिला मेडिकल कालेज रखी गई थी, उस समय तक महिला शिक्षा की क्या दशा थी, अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन तब लेडी हाॄडग देश का पहला महिला मेडिकल कालेज बना। हालांकि प्रशिक्षणाॢथयों और मेडिकल छात्राओं के लिए स्थितियां पहले कुछ परेशानी भरी रही थीं। शुरुआती दौर में परीक्षा देने के लिए छात्राओं को दूसरे कालेज में जाना होता था। इस कालेज की परीक्षाएं किंग एडवर्ड मेडिकल कालेज में हुआ करता थीं, जोकि अब लाहौर में है और उस समय तक यह कालेज पंजाब विश्वविद्यालय का हिस्सा हुआ करता था। विभाजन से पहले तक कालेज की छात्राओं को परीक्षा देने लाहौर जाना होता था। विभाजन के बाद इसे दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्धता मिली।

'कोलोनियल मेडिकल केयर इन नार्थ इंडिया - जेंडर, स्टेट एंड सोसाइटी': इतिहासकार सोहेल के मुताबिक सन 1912 में जब राजधानी दिल्ली शिफ्ट हुई तो दिल्ली के कुलीन तबके की महिलाओं ने अपनी समस्या रखी कि वे पुरुष चिकित्सकों से इलाज करवाने में सहज महसूस नहीं करतीं। सरकार के तमाम जागरूकता अभियानों के बाद भी उच्च व मध्यम वर्ग की महिलाएं प्रसूति के लिए भी अस्पताल नहीं जाती थीं। उन्हेंं यह सम्मानजनक नहीं लगता था। उस समय घरों पर पर दाई आती थी। लेखक व भारतीय इतिहासकार समीक्षा सहरावत की पुस्तक 'कोलोनियल मेडिकल केयर इन नार्थ इंडिया - जेंडर, स्टेट एंड सोसाइटी' पुस्तक में लिखा है कि उस दौर के अस्पतालों में 'जनाना' और 'पर्दा' वर्ग की महिलाएं नहीं जाया करती थीं। केवल बहुत कमजोर वर्ग की महिलाएं ही अस्पतालों में इलाज के लिए जाती थीं।

सरकार चाहती थी कि महिलाएं अस्पतालों में इलाज और प्रसूति के लिए जाएं, लेकिन महिलाओं की आपत्ति यह थी कि वे पुरुष डाक्टरों और स्टाफ से इलाज या जांच नहीं करवाएंगी। इस पर बीच का रास्ता कुछ यूं निकाला गया कि एक अस्पताल और एक प्रशिक्षण संस्थान खोला जाए, जहां घर-घर जाने वाली दाइयों को यूरोपियन मिडवाइफ की तरह प्रशिक्षित किया जाए। उस समय वायसराय डफरिन की पत्नी लेडी डफरिन के प्रयासों से एक राष्ट्रीय एसोसिएशन बनाया गया जिसके तहत लेडी डाक्टरों और स्टाफ को प्रशिक्षित किया जाने लगा। इसका जिक्र 'द पालिटिक्स आफ जेंडर एंड मेडिसिन इन कोलोनियल इंडिया' की लेखिका मनीषा लाल ने किया है।

भारतीय पितृ सत्तामकता के प्रभाव में कुलीन तबके की महिलाएं: तमाम प्रयासों और उपलब्धियों के बावजूद डफरिन फंड महिलाओं को चिकित्सा क्षेत्र में जाने और उन्हेंं प्रशिक्षित करवाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए नाकाफी साबित होने लगा था। समीक्षा सहरावत की पुस्तक में लिखा है कि भारतीय पितृ सत्तामकता के प्रभाव में कुलीन तबके की महिलाओं ने मेडिकल पेशे को नकार दिया था क्योंकि उस समय जो शिक्षा महिलाओं को इस क्षेत्र में दी जाती थी, पूर्ण रूप से चिकित्सकीय प्रशिक्षण नहीं, बल्कि शार्ट टर्म होती थी और केवल असिस्टेंट आदि के तौर पर उन्हेंं प्रशिक्षित किया जाता था, जिसके बाद महिलाओं को पुरुष चिकित्सकों के सहायक के तौर पर काम करना होता था। ऐसे में महिलाओं ने इस पेशे को मंजूर नहीं किया।

बाद में महिला चिकित्सकों का एक संघ 'एसोसिएशन फार मेडिकल वीमेन इन इंडिया' (एएमडब्ल्यूआइ) बना जिसमें शुरुआत में ब्रिटिश चिकित्सक ही थीं। 1911 में यह संघ मुखर हुआ और पूर्ण महिला मेडिकल कालेज बनाने की मांग की। इस संघ के नेतृत्व में महिलाओं ने लेडी हाॄडग को पत्र भी लिखा। बाद में लेडी हाॄडग ने इसे गंभीरता से लिया और उनके प्रयासों से 17 मार्च 1914 को फिर पूर्ण महिला मेडिकल कालेज की आधारशिला रखी गई। इसके कुछ ही महीनों बाद लेडी हार्डिंग की मृत्यु हो गई और इस कालेज का नाम उनके नाम पर रखा गया।

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