जोहड़ खत्म हो जाने से गिरता जा रहा भूजल स्तर, अब फिर से नया बनाने की तैयारी

बुढेला गांव में विकास कार्य के नाम पर दो दशक पहले जिस जोहड़ का अस्तित्व मिटा दिया गया था उसको पुनर्जीवित करने के लिए ग्रामीणों ने अभियान छेड़ा है। गांव वालों का कहना है कि जोहड़ की तली में डाली गई मिट्टी को हटाया जाएगा।

Vinay Kumar TiwariFri, 09 Apr 2021 02:56 PM (IST)
इसी जगह था बुढेला गांव का जोहड़ ’ सौजन्य-सुधी पाठक

जागरण संवाददाता, पश्चिमी दिल्ली। बुढेला गांव में विकास कार्य के नाम पर दो दशक पहले जिस जोहड़ का अस्तित्व मिटा दिया गया था, उसको पुनर्जीवित करने के लिए ग्रामीणों ने अब अभियान छेड़ा है। गांव वालों का कहना है कि हमारा अभियान तब तक जारी रहेगा जब तक जोहड़ की तली में डाली गई मिट्टी को हटा नहीं दिया जाता है।

पर्यावरण से जुड़े सरोकारों को ध्यान में रखकर बनाई गई संस्था ‘सेंटर फार यूथ कल्चर ला एंड एनवायरमेंट’ के संस्थापक पारस त्यागी बताते हैं कि मैं बुढेला गांव का रहने वाला हूं। मुझे याद है कि बारिश का पानी गांव की विभिन्न गलियों से होता हुआ इसी जोहड़ में बहकर पहुंचता था। जब तक ऐसा होता रहा यहां पर पानी के लगातार नीचे गिर रहे स्तर की समस्या नहीं हुई। समस्या तब हुई जब विकास कार्य के नाम पर यहां मिट्टी भरने का कार्य शुरू हुआ। तब मेट्रो का कार्य हो रहा था।

मेट्रो की साइट से जो मिट्टी निकलती थी, उसे यहां लाकर डाला जाता था। तब लोगों ने इसका विरोध नहीं किया। प्रशासन की ओर से कहा गया कि यहां पार्क बनाया जाएगा। लोगों को सैर करने की जगह मिलेगी, लेकिन जोहड़ को मिट्टी से भरे जाने के बाद इस जगह को उसके हाल पर छोड़ दिया गया। जब जोहड़ नहीं रहा तब गांव व आसपास की जमीन का भूजल स्तर नीचे जाने लगा। धीरे-धीरे लोगों को जोहड़ की अहमियत का पता चल गया। गांव में दो जोहड़ थे। एक जोहड़ को भरकर वहां सामुदायिक भवन बना दिया गया। इस जोहड़ को भरा गया, लेकिन यहां कोई इमारत नहीं बनी। अब गांव वाले चाहते हैं कि यहां फिर से जोहड़ बनाया जाए।

अभी क्या है हाल

फिलहाल, यह जमीन साहित्य कला परिषद के पास है। यहां जिला सांस्कृतिक केंद्र का निर्माण होना है। जमीन की चारदीवारी हो चुकी है। सांस्कृतिक केंद्र निर्माण की योजना भी लंबे समय से अधूरी पड़ी है।

गांव के लिए जोहड़ की अहमियत

गांव का विकास आमतौर पर अनियोजित होता है, लेकिन पूर्वज पर्यावरण का ध्यान रखते थे। इसलिए हर गांव में जल संरक्षण के उद्देश्य से जोहड़ बनाए जाते थे। पारस बताते हैं कि नियोजित इलाके में तो जोहड़ के बिना कार्य हो सकता है, लेकिन अनियोजित इलाके में जल संरक्षण के लिए जोहड़ का विकल्प नहीं है।

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