गाजीपुर लैंडफिल साइट: सतत व स्थायी व्यवस्था से ही निकलेगा समाधान

गाजीपुर लैंडफिल साइट 2002 में ही अपनी क्षमता पार कर चुकी है।

गाजीपुर लैंडफिल साइट की ही बात करें तो सन् 1984 में शुरू हुई यह लैंडफिल साइट 2002 में ही अपनी क्षमता पार कर चुकी है। यहां लगभग 140 लाख टन से अधिक कचरा जमा हो चुका है। इस लैंडफिल का स्लोप भी मेंटेन नहीं हो पा रहा है।

Publish Date:Wed, 02 Dec 2020 01:09 PM (IST) Author: Vinay Tiwari

नई दिल्ली, संजीव गुप्ता। गाजीपुर लैंडफिल साइट पर आग लगी तो एक बार फिर यह मुद्दा समसामयिक बन गया है। पहले लैंडफिल साइट्स को क्षमता से अधिक भरने पर बंद कर दिया जाता था एवं उन पर घास वगैरह उगा दी जाती थी। जबकि गाजीपुर, भलस्वा, ओखला लैंडफिल साइट की क्षमता पूरी हो जाने के बावजूद इन्हें न तो इन्हें बंद किया गया है और न इनका विकल्प खोजा जा सका है।

गाजीपुर लैंडफिल साइट की ही बात करें तो सन् 1984 में शुरू हुई यह लैंडफिल साइट 2002 में ही अपनी क्षमता पार कर चुकी है। यहां लगभग 140 लाख टन से अधिक कचरा जमा हो चुका है। आलम यह है कि इस लैंडफिल का स्लोप भी मेंटेन नहीं हो पा रहा है। इसी कारण सितंबर 2017 में यहां हुए एक हादसे में दो लोग की मौत हो गई थी। स्थिति यह हो चुकी है कि इस लैंडफिल के आसपास की जमीन तक अब खिसकने लगी है। बावजूद इसके आज भी यहां रोज करीब दो हजार टन कचरा डंप किया जा रहा है। 

दरअसल, लैंडफिल साइट्स दिल्ली-एनसीआर के लिए समस्या का सबब इसलिए भी बनी हुई हैं क्योंकि ठोस कचरा प्रबंधन के नियम कायदे अधिसूचित होने के बावजूद न तो आम जनता ही इनके प्रति गंभीर है और न ही नगर निगम का स्टाफ। अगर विज्ञानी तरीके से कचरे का निपटान किया जाए तो कहीं कोई समस्या ही न रह जाए। होता क्या है कि अभी लैंडफिल साइट पर जो कचरा डंप हो रहा है, उसमें गीला कूड़ा भी होता है और सूखा भी, प्लास्टिक कचरा भी रहता है और मलबा भी, यहां तक की धातुएं भी मिली रहती हैं। ऐसे में इनसे न केवल भूजल प्रदूषित होता है बल्कि वेस्ट टू एनर्जी प्लांट में इनका रिसाइकिल भी मुश्किल हो जाता है।

अब ऐसे मिश्रित कूड़े का ढेर बढ़ता जाता है, जमीन में दबे रहने पर समय बीतने के साथ-साथ धातुएं भी उसमें घुलने लगती हैं और भूजल को प्रदूषित करने लगती हैं। मर्करी और नाइट्रेट अवयव भी भूजल को दूषित करते हैं। आजकल लोग फ्लोरोसेंटलाइट और लैंप खराब होने पर कचरे में फेंक देते हैं। इनसे भी भूजल प्रदूषित होता है। इसी तरह कचरा जब सड़ने लगता है तो उससे एचटूएस यानी हाइड्रोजन सल्फाइड गैस निकलती है। इससे दरुगध ही नहीं फैलती बल्कि वातावरण भी प्रदूषित होता है।

लैंडफिल साइट पर मीथेन गैस के उत्सर्जन पर जब आग लगती है तो कार्बन डाइआक्साइड, सल्फर डाइआक्साइड और नाइट्रोजन डाइआक्साइड जैसी जहरीली गैस उत्पन्न होती हैं। इनसे भी वायु प्रदूषण होता है। जब आग लंबे समय तक सुलगती रहती है तो वीओसी वोलेटाइल आर्गेनिक कंपाउड (वाष्पशील या अदृश्य प्रदूषक तत्व) उत्पन्न होते हैं। इनसे भी वायुमंडल में प्रदूषण फैलता है। 

लैंडफिल साइट की समस्या की जड़ कचरा निपटान के प्रति जनजागरूकता का अभाव ही नहीं, नगर निगम की कायप्रणाली भी है। नगर निगम की इंजीनयरिंग विंग जहां टेंडर निकालने में रुचि रखती है वहीं सफाई शाखा के अधिकारी एवं कर्मचारी भी अपनी सुख सुविधाओं की पूíत में लगे रहते हैं। इस समस्या का समाधान किसी की भी प्राथिमकता में नहीं है। होना यह चाहिए कि कचरा चाहे घर का हो या दफ्तर का, अस्पताल का हो या किसी प्रतिष्ठान का, उसको अलग करने की व्यवस्था वहीं पर होनी चाहिए। इसके लिए एक पूरा अभियान भी चलाना होगा और जनता को जागरूक करने के साथ-साथ सफाई कíमयों को भी प्रशिक्षित करना होगा।

वार्ड स्तर पर कचरा निपटान के छोटे छोटे प्लांट लगाए जाने चाहिए ताकि हर वार्ड का कचरा वहीं पर निपटा दिया जाए। अगर इस तरह कचरा का निपटान किया जाएगा तो उसमें 55 से 60 फीसद गीला कूड़ा निकलेगा जो बिजली या गैस बनाने के काम आएगा। इसके बाद बचे हुए कचरे से धातु वगैरह अलग करके उन्हें बेचा जा सकता है या रिसाइकिल किया जा सकता है। आखिर में जो कचरा बच जाए, उसे इंसीनरेटर में जला दिया जाए। लैंडफिल साइट की समस्या खत्म करने के लिए हमें एक सतत एवं स्थायी व्यवस्था अपनानी होगी जो दुर्भाग्य से अभी तक अमल में नहीं लाई जा सकी है। इसके लिए नगर निगम को भी अपनी कार्यप्रणाली सुधारनी होगी और सरकार को भी राजनीतिक दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय देना होगा। (डा. एस के त्यागी, पूर्व अपर निदेशक,

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) 

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