DSSSB शिक्षक भर्ती परीक्षा में जातिगत प्रश्न पूछने वाले दोषी पर दर्ज करें मुकदमाः हाई कोर्ट

प्राथमिक शिक्षक नियुक्ति परीक्षा में जातीय आधारित प्रश्न पूछने के लिए जिम्मेदार लोगों पर एससी-एसटी एक्ट के तहत एफआइआर दर्ज करने के निचली अदालत के फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट ने बरकरार रखा है। छह अप्रैल को पीठ ने सभी पक्षाें को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।

Mangal YadavMon, 14 Jun 2021 08:59 PM (IST)
फैसले को चुनौती देने वाली डीएसएसएसबी की याचिका खारिज

नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। प्राथमिक शिक्षक नियुक्ति परीक्षा में जातीय आधारित प्रश्न पूछने के लिए जिम्मेदार लोगों पर एससी-एसटी एक्ट के तहत एफआइआर दर्ज करने के निचली अदालत के फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट ने बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति अनु मल्होत्रा की पीठ ने अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (डीएसएसएसबी) को निर्देश दिया कि जातिगत प्रश्न को तैयार करने वालों के खिलाफ एफआइआर दर्ज की जाये। पीठ ने इसके साथ ही मुकदमा दर्ज करने के कड़कड़डूमा कोर्ट के फैसले को निरस्त करने की डीएसएसएसबी की अपील को ठुकरा दिया है। छह अप्रैल को पीठ ने सभी पक्षाें को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।

अधिवक्ता सत्य प्रकाश गौतम समेत अन्य की याचिका पर कड़कड़डूमा कोर्ट ने 17 फरवरी को प्रश्न तैयार करने के लिए जिम्मेदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था। सत्य प्रकाश ने अर्जी में डीएसएसएसबी के चेयरमैन के खिलाफ परीक्षा में जातीय प्रश्न पूछे जाने पर एससी-एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज करने की मांग की थी। अर्जी में कहा गया था कि 13 अक्टूबर 2018 को आयोजित की गई परीक्षा में दलित समुदाय को लेकर कुछ आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल किया गया था। ऐसे में इस तरह के प्रश्न तैयार करने वाले संबंधित अधिकारियों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई का निर्देश दिया जाये। उन्होंने दलील दी थी कि इस तरह के प्रश्न से सामाजिक सौहार्द्र खराब होता है।

कड़कड़डूमा कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान डीएसएसएसबी के चेयरमैन ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया था कि जिस वक्त यह पेपर सेट किए गए उस वक्त वह चेयरमैन नहीं थे। वहीं, डीएसएसएसबी ने हाई कोर्ट में कहा कि प्रश्नपत्र में पूछे गए सवाल वही हैं जोकि किताब में हैं। ऐसे में एससी-एसटी एक्ट के तहत कोई अपराध नहीं बनता है। यह भी दलील दी गई कि उन्होंने इन शब्दों का इस्तेमाल किसी व्यक्ति का अपमान करने के लिए नहीं इस्तेमाल किए गए हैं।

डीएसएसएसबी ने कहा कि निचली अदालत यह देखने में नाकाम रही कि न तो ये पेपर डीएसएसएसबी की किसी आंतरिक कमेटी ने बनाया और न ही इसकी समीक्षा की। इतना ही नहीं सक्षम प्राधिकारियों द्वारा जारी किए जाने वाले जाति प्रमाण पत्र में भी जातिगत शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है।

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