Air Pollution: पर्यावरणविद सुनीता नारायण ने बताया प्रदूषण से जंग में क्या है सबसे बड़ी बाधा, गिनाई खामियां

Air Pollution पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाएं अभी भी सामने आ रही हैं। यहां भी राज्य सरकारों की भूमिका काफी मासने रखती है। सरकारों को चाहिए कि वोट बैंक की ही नहीं बल्कि अपने मतदाताओं के स्वास्थ्य की भी फिक्र करें। जन सहयोग भी बहुत महत्वपूर्ण है।

Mangal YadavWed, 20 Oct 2021 06:05 AM (IST)
सेंटर फार साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) की महानिदेशक सुनीता नारायण

नई दिल्ली। सालों की मेहनत के बाद भी दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण का अपेक्षित स्तर पर कम नहीं होना चिंताजनक है। अभी भी दिल्ली में कमोबेश हर नागरिक प्रदूषित हवा में ही सांस लेने को मजबूर है। हालांकि इससे निपटने के लिए योजनाएं बहुत बनाई गई हैं, लेकिन गंभीरता से उन पर अमल बहुत कम हो पाता है। यह अलग बात है कि बीते कुछ सालों में विभिन्न वजहों से दिल्ली के आवरआल प्रदूषण में कुछ कमी अवश्य आई है।

दरअसल, प्रदूषण से जंग में ईमानदारी और गंभीरता दोनों अनिवार्य हैं। सरकारी सक्रियता भी बहुत मायने रखती है। केद्र सरकार कार्ययोजनाएं तैयार करती है जबकि उन पर अमल करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है। प्रदूषण पर राजनीति ही नहीं, अमीर और गरीब का भेद खत्म करना भी जरूरी है। दीर्घकालिक उपायों को गति देनी होगी। निगरानी बढ़ानी होगी। जन जागरूकता के साथ-साथ सख्त रवैया भी अपनाना होगा।

ऐसा नहीं होने के कारण ही पहले केवल सर्दियों के मौसम में समस्या का सबब बनने वाला वायु प्रदूषण अब नासूर बनकर दिल्ली एनसीआर में वर्ष भर दर्द देता है। ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रेप) अधिसूचित होने के बावजूद दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण बढ़ने की वजह इसके पालन में हीलाहवाली भी है।

नियम-कायदे तो बन गए, लेकिन उन पर क्रियान्वयन करने वाली एजेंसियां अभी भी बहुत सक्रिय नहीं हैं। मसलन, डीजल जेनरेटर पर प्रतिबंध सुनिश्चित करने के लिए हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान हर साल हाथ खड़े कर देते हैं। ग्रेप के प्रावधान लागू करने के लिए राज्य सरकार से लेकर स्थानीय निकाय तक सभी जिम्मेदार हैं। लेकिन हकीकत में इनमें आपस में ही कोई तालमेल नहीं है। ग्रेप के प्रावधानों का पालन न होने की स्थिति में कार्रवाई आवश्यक है। लेकिन वह किसी भी स्तर पर ठीक से नहीं हो रही है।

सीपीसीबी और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) के अलावा किसी राज्य प्रदूषण बोर्ड ने ठीक से पेट्रोलिंग टीमों का गठन तक नहीं किया है। विडंबना यह कि सीपीसीबी की टीमें भी विभिन्न इलाकों का दौरा कर जो रिपोर्ट तैयार करती हैं, सीपीसीबी की ओर से कार्रवाई के लिए प्रदूषण बोर्डो को भेज दी जाती है।

उदाहरण के लिए दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इस रिपोर्ट को नगर निगमों के पास अग्रसारित कर देता है जबकि नगर निगम की ओर से न उस पर कार्रवाई होती है, न ही वापस जवाब भेजा जाता है। ग्रेप के पालन में राज्य सरकारें जहां राजनीतिक राग द्वेष भी साथ लेकर चल रही हैं वहीं प्रदूषण बोर्ड स्वयं को अधिकार विहीन बताते हुए लाचार महसूस कर रहे हैं। यही वजह है कि किसी को कोई भय नहीं है।

पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाएं अभी भी सामने आ रही हैं। यहां भी राज्य सरकारों की भूमिका काफी मासने रखती है। सरकारों को चाहिए कि वोट बैंक की ही नहीं बल्कि अपने मतदाताओं के स्वास्थ्य की भी फिक्र करें। जन सहयोग भी बहुत महत्वपूर्ण है। जनजागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए। जितनी जन जागरूकता बढ़ेगी, उतना ही सभी का सहयोग मिलेगा।

अगर दिल्ली एनसीआर के प्रदूषण को और कम करना है तो इसके लिए केवल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ही नहीं, दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए), केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी), लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी), नगर निगम (एमसीडी) और नई दिल्ली नगर पालिका परिषद (एनडीएमसी), दिल्ली कैंट सभी को मिलकर काम करना होगा। राज्य और केंद्र सरकार को भी निगरानी व जवाबदेही दोनों तय करनी होगी। सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को मजबूत करना होगा।

इलेक्टि्रक वाहनों और साइकिल को भी बढ़ावा देना चाहिए।हालांकि अब इस समस्या से निपटने के लिए 18 सदस्यीय एक आयोग बना दिया गया है तो उम्मीद है कि उक्त समस्याओं का समाधान भी निकल आएगा। ग्रेप का दायरा भी बढ़ जाएगा, क्योंकि आयोग का अधिकार क्षेत्र सिर्फ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र ही नहीं बल्कि समीवर्ती वे सभी इलाके हैं जो दिल्ली की हवा को प्रभावित करते हैं। आयोग को शक्तियां भी काफी दी गई हैं। ग्रेप के प्रावधानों का पालन नहीं होने की स्थिति में सख्त कार्रवाई करना भी अत्यंत आवश्यक है।

(सेंटर फार साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) की महानिदेशक सुनीता नारायण की संवाददाता संजीव गुप्ता से बातचीत पर आधारित)

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