दिल्ली में जलाशय संरक्षण के लिए शुरू हो सतत प्रक्रिया, डीयू के प्रोफेसर ने बताया तरीका

जल संचयन और भूजलस्तर में सुधार के लिए प्राकृतिक जल स्रोतों पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है। झील बावलियां जोहड़ एवं कुएं अनदेखी के कारण ही सूख रहे हैं। नदियों का जल स्तर भी घटता जा रहा है।

Mangal YadavWed, 14 Apr 2021 01:48 PM (IST)
50 किलोमीटर है राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में यमुना की लंबाई वो भी सिर्फ बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में।

नई दिल्ली। शहर हो या गांव बीते कुछ सालों में जिस तेजी से जलाशयों का अतिक्रमण हुआ है उससे जाहिर है कि शहरीकरण की होड़ में इनके संरक्षण को लेकर सही मायनों में प्रयास किए ही नहीं गए हैं। यहां तक कि अदालती हस्तक्षेप के बाद भी कागजी खानापूरी ही ज्यादा हुई है। पूर्व में कभी कोई ऐसी मुहिम भी नहीं चली जिसमें जनसाधारण को भागीदार बनाया जा सके। संरक्षण के लिए जलाशयों की सफाई या उसमें केवल पानी भर देने से कुछ नहीं होगा, इसका रखरखाव भी जरूरी है ताकि वे फिर से बदहाल न हो जाएं। सरकारी एजेंसियों के पास ऐसा पुख्ता प्लान होना चाहिए जिससे आधे अधूरे जलाशयों को बचाया जा सके, मृत हो चुके जोहड़ों को पुनर्जीवित कर सकें या लुप्त हो चुके जोहड़ों को खोज सकें।

प्राकृतिक स्रोतों में सुधार से दूर होगी पानीकी किल्लत

जल संचयन और भूजलस्तर में सुधार के लिए प्राकृतिक जल स्रोतों पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है। झील, बावलियां, जोहड़ एवं कुएं अनदेखी के कारण ही सूख रहे हैं। नदियों का जल स्तर भी घटता जा रहा है। दिल्ली की एकमात्र यमुना नदी मृतप्राय: हो चुकी है। इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि नदियों और इनके आसपास का बाढ़ग्रस्त क्षेत्र भी अब सूखने लगा है। यह सारा क्षेत्र मानसून के दौरान भूजल रिचार्ज के लिहाज से बेहतर विकल्प हो सकता है।

50 मीटर की गहराई पर पानी उपलब्ध है यहां हमने खुद शोध में पाया है कि यहां के भूजल में बालू रेत मिली हुई है, जो जल्द नीचे बैठ जाती है। यहां के भूजल में प्रदूषण भी अधिक नहीं है। इसीलिए जल बोर्ड भी पल्ला में रेनीवेल के जरिये भूजल का इस्तेमाल पेयजल के रूप में कर रहा है। यहां नलकूप के जरिये रोजाना 30 एमजीडी पानी निकाला जा रहा है, जिसे शोधित कर उत्तर पश्चिम क्षेत्र के इलाकों में सप्लाई किया जा रहा है। जिस तरह से पल्ला रेनीवेल से रोजाना 30 एमजीडी पानी उठाया जा रहा है, वैसा ही प्रयोग वजीराबाद और ओखला बैराज में भी किया जा सकता है। इससे पेयजल आपूर्ति तिगुनी हो जाएगी ।

ताकि जल संकट में काम आए यमुना

विचारणीय पहलू यह भी है कि यमुना को मौजूदा दौर में मानसूनी नदी (ऐसी नदियां जो वैसे भले सूखी रहती हों, लेकिन मानसून में वर्ष भर का पानी रिचार्ज कर लेती हैं) मानते हुए भी दिल्ली का जल संकट दूर करने में मददगार बनाया जा सकता है। जरूरत केवल इस पानी को सहेज कर रखने की है।

सुखद परिणाम को निरंतर करने होंगे प्रयास

देर आए, दुरुस्त आए की तर्ज पर अब अगर इस दिशा में विभिन्न एजेंसियां सक्रिय हुई हैं तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। दिल्ली पार्क एंड गार्डन सोसायटी, दिल्ली स्टेट वेटलैंड अथारिटी, जल बोर्ड और दिल्ली विकास प्राधिकरण इत्यादि सक्रियता के साथ जलाशयों का संरक्षण करते नजर आ रहे हैं। वेटलैंड मित्र बनाकर आम जन को भी मुहिम से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। इससे अब एक आस बंधने लगी है कि अब जलाशयों का पुर्नजीवित होना तय है। हालांकि पुराने अनुभवों भी है कि कहीं यह सब भी दिखावा बनकर न रह जाए।

जलाशयों के संरक्षण की प्रक्रिया एक सतत प्रक्रिया है। इस पर लगातार काम किए जाने की जरूरत है। अगर ईमानदार प्रयास किए जाएंगे तो निकट भविष्य में सुखद परिणाम अवश्य ही सामने आएंगे।

यमुना में गंदे नालों का मुंह कहीं और मोड़ना होगा बरसाती नालों को यमुना से जोड़ना होगा। सोसायटी स्तर पर वर्षा जल संचयन के लिए सामूहिक प्रयास करने होंगे। सरकारी स्तर पर ईमानदारी से वर्षा जल संचयन की कोशिश की जाए।

[दिल्ली विश्वविद्यालय के भूगर्भ विभाग के प्रोफेसर डा. शशांक शेखर की संवाददाता संजीव गुप्ता से बातचीत पर आधारित]।

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