Delhi Air Pollution: देश की राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण से बचाव के दीर्घकालिक उपाय

Delhi Air Pollution पिछले कई वर्षो से देश की राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण का संकट उत्पन्न हो रहा है। विशेष तौर पर नवंबर और दिसंबर में वायु प्रदूषण का स्तर इतने खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है कि लोगों को सांस लेने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

Sanjay PokhriyalTue, 07 Dec 2021 09:32 AM (IST)
वाहनों की संख्या को चरणबद्ध रूप से नियंत्रित किए बिना राजधानी दिल्ली में वायु गुणवत्ता को बढ़ाना संभव नहीं। फाइल

डा. आर. अचल। Delhi Air Pollution नवंबर के पहले सप्ताह से ही दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर गंभीर स्थिति में बना हुआ है। बीच में एकाध दिन तेज हवा चलने से प्रदूषण में कुछ हद तक कमी आने की घटना को छोड़ दें तो इसका स्तर अधिकांशतया गंभीर स्थिति में ही है। वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति के कारण राजधानी दिल्ली में अब भी बच्चों के स्कूल बंद हैं और उनकी पढ़ाई आनलाइन ही चल रही है। दरअसल लगभग डेढ़ वर्षो के बाद आठवीं तक के स्कूल दिल्ली में पिछले माह ही खोले गए, लेकिन कुछ ही दिनों के बाद वायु प्रदूषण के गंभीर स्तर के कारण एक बार फिर से उन्हें बंद करना पड़ा। हालांकि वायु प्रदूषण की समस्या केवल राजधानी दिल्ली की ही नहीं है, इस मौसम में लगभग समूचे उत्तर भारत में यह समस्या पिछले कुछ वर्षो से सामने आ रही है। लेकिन अनेक कारणों से दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में इस समस्या की गंभीरता कहीं अधिक प्रतीत होती है।

दरअसल आजादी के बाद से आज तक दिल्ली का विकास बेहद अनियोजित विकास तरीके से हुआ है। पिछली सदी के आखिरी दशक में पहली बार इस समस्या पर ध्यान देते हुए उद्योगों को विस्थापित करने की नीति अपनाई गई, परंतु आसपास के खेतों और जंगलों का विध्वंस करते हुए शहर का विस्तार किया जाता रहा है। उद्योगों के विस्थापन के बावजूद शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सुविधाओं का केंद्र आज भी दिल्ली ही बनी हुई है। इस कारण यहां की आबादी निरंतर निर्बाध गति से बढ़ती जा रही है। एक अध्ययन के अनुसार दिल्ली की आबादी प्रति वर्ष चार लाख के हिसाब से बढ़ जाती है, जिसमें से करीब तीन लाख लोग तो प्रतिवर्ष शिक्षा और रोजगार की प्राप्ति के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से यहां आते हैं। इस बढ़ती आबादी के उत्सर्जित अपशिष्ट से दिल्ली के चारों ओर कूड़े के पहाड़ बनते जा रहे हैं। इसके निस्तारण के लिए वैसे तो अब तक कई प्रकार के उपाय खोजे गए हैं, लेकिन उनमें से कोई भी उपाय व्यावहारिक रूप से क्रियान्वित नहीं हो सका है। हमें इस बारे में नए सिरे से विचार करना चाहिए। उसके निस्तारण के लिए जलाने की प्रक्रिया का वायु प्रदूषण में विशेष योगदान है।

बढ़ती आबादी के परिवहन के लिए वाहनों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। निजी वाहनों के स्टेटस सिंबल के शौक ने वाहनों की संख्या में भी बेतहाशा वृद्धि की है। पब्लिक ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था आबादी के अनुपात में बेहद कमजोर है। यह कारण ही दिल्ली की हवा को जहरीली बनाने के लिए पर्याप्त है। इस पर मौसम का बदलता मिजाज नीम चढ़ा करेला साबित हो रहा है। इसका कारण भी ध्वंसात्मक विकास ही है। जंगलों को काट कर कंक्रीट का जंगल उगा कर, हम विकास कर रहे हैं। दिल्ली और राजस्थान के बीच घने जंगल तो कभी नहीं रहे, पर उष्णकटिबंधीय वृक्ष बबूल, मंदार जैसे सघन वृक्ष तो थे ही, जिनका विनाश कर खेती योग्य जमीन बनाने से लेकर औद्योगीकरण और कालोनियां बनाने के लिए किया जाता रहा है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि आज रेगिस्तानी शीत और लू ने बेरोकटोक दिल्ली तक पहुंचकर उसे दमघोटू शहर में तब्दील कर दिया है।

दुर्योग यह कि इसका कारण और उपाय खोजने में भी सतही और भरमाने वाली बातें की जाती हैं। कभी दिल्ली के आसपास के किसानों के पराली जलाने को कारण बताया जाता है, तो कभी पानी के छिड़काव को आसान उपाय के रूप में देखा जाता है, जो हास्यास्पद विकल्प से अधिक कुछ नहीं है। एक विडंबना यह भी है कि दिल्ली में जितनी पराली जलाई जाती है, उससे कई गुना अधिक यहां रिहायशी और औद्योगिक क्षेत्रों में प्लास्टिक जलाया जाता है। चूंकि दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में धान की खेती बहुत कम होती है और गेहूं की फसल के अवशेष से मवेशियों को खिलाने के लिए भूसा बना लिया जाता है, जिस कारण यहां फसल अवेशेषों को जलाने की घटनाएं कम ही होती हैं। पराली जलाने की बात बेहिसाब प्लास्टिक के कूड़े जलाने के दुष्कृत्य को छिपाने के लिए भी की जाती है। इसका ठोस उपाय यह है कि राजधानी दिल्ली में प्लास्टिक के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए। प्लास्टिक को जलाने के बजाय रासायनिक तरीके से निस्तारित किया जाना चाहिए।

निजी वाहनों की संख्या को सीमित करने जैसे व्यावहारिक उपायों पर ध्यान देना होगा। निजी वाहनों का उपयोग करने वालों के लिए सुविधाजनक सार्वजनिक बसों की व्यवस्था होनी चाहिए। मेट्रो टेन से यात्र करने वालों के लिए आखिरी गंतव्य तक पहुंचने की सुगम व्यवस्था होनी चाहिए। पर्यावरण के प्रति जागरुकता और टैक्स बढ़ाकर निजी वाहनों व वातानुकूलन के शौक को हतोत्साहित किया जा सकता है, अन्यथा वह समय दूर नहीं जब दिल्ली में लोगों का स्वच्छ वायु में सांस लेना दूभर हो जाएगा।

विगत कुछ वर्षो से पानी के छिड़काव को इसके उपचार के रूप में देखा जाता है। एक ओर यमुना सूख रही है, पीने के पानी की किल्लत है और दूसरी ओर कृत्रिम बरसात के रूप में पानी का छिड़काव किया जा रहा है। यह विकल्प विनाशकारी है। सूखते जल स्रोत के युग में इतना पानी कहां से आएगा, यह भी यक्ष प्रश्न है। इस विकट समस्या का स्थायी हल तभी संभव है जब दिल्ली में हरित क्रांति को प्रोत्साहित किया जाए। कम जगह में उगने वाले ताड़, खजूर, सुपाड़ी जैसे ऊंचे वृक्षों के पौधे लगाए जाएं। दिल्ली के चारों ओर वनीकरण को बढ़ावा दिया जाए, विशेषकर राजस्थान के रेगिस्तान और दिल्ली के बीच जंगलों को पुनस्र्थापित किया जाय।

साथ ही दिल्ली में लोगों की भीड़ को कम करने के लिए दिल्ली के स्तर की सुविधाओं का अन्य शहरों तक विकेंद्रीकरण किया जाए। गांवों में रोजगार-शिक्षा-स्वास्थ्य के संसाधन विकसित किए जाएं। दिल्ली में जिस तरह से शिक्षण और स्वास्थ्य संस्थान हैं, उसी प्रकार के संस्थान देश के विभिन्न इलाकों में स्थापित करने से दिल्ली में आबादी का भार कम होगा।

[चिकित्सक एवं विचारक]

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