कोरोना काल में अलग-अलग चुनौतियों का सामना करते बच्चों में जगाएं सुपर हीरो का एहसास

महामारी में जिस प्रकार बच्चों-किशोरों ने खुद को संभाला है। बेशक बच्चे खुद को संपूर्णता में अभिव्यक्त नहीं कर पा रहे लेकिन उनके डर एवं संकोच को दूर करना जरूरी है। उन्हें एहसास दिलाना है कि वे किसी सुपर हीरो से कम नहीं हैं...

Sanjay PokhriyalSat, 12 Jun 2021 01:03 PM (IST)
बच्चे मानसिक, सामाजिक एवं अन्य समस्याओं से जूझ रहे हैं, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अंशु सिंह। पिछले दिनों कश्मीर की एक छह साल की बच्ची ने ट्विटर पर एक वीडियो के जरिये प्रधानमंत्री से बड़ी ही मासूमियत से पूछा था कि क्यों बच्चों को इतना होमवर्क दिया जा रहा है? उसने अपनी परेशानी साझा करते हुए बताया था कि कैसे देर तक चलने वाले आनलाइन क्लासेज से छोटे बच्चों को दिक्कत हो रही है। यह पोस्ट इतनी तेजी से वायरल हुआ कि स्थानीय प्रशासन को तत्काल प्रभाव से पहली से आठवीं कक्षा की आनलाइन क्लासेज की समयसीमा 90 मिनट करने के निर्देश जारी करने पड़े। यह वाकया बताता है कि इन दिनों बच्चे किस तरह की मन:स्थिति से गुजर रहे हैं।

बदलते व्यवहार से बढ़ी चिंता: कोविड ने बच्चों की पूरी दिनचर्या बदल कर रख दी है। रात में देर तक सोना और सुबह देर से जागना आम बात हो गई है। साहिबाबाद (गाजियाबाद) में रहने वाले 10 वर्षीय श्वेतांश को ही लें। स्कूल की छुट्टियों के बाद अब जब दोबारा से आनलाइन क्लासेज शुरू हुईं हैं, तो सुबह-सुबह उन्हें बिस्तर से उठाने के लिए पैरेंट्स को काफी मशक्कत करनी पड़ती है। यहां तक तो बात समझ में आती है। लेकिन पिछले कुछ समय से पैरेंट्स उसमें एक और बदलाव देख रहे। वह गुमसुम रहता है। कई बार पूछने पर भी जवाब नहीं देता। न दोस्तों से बात करता है और न ही घर के लोगों से। ज्यादा समय फोन पर वीडियो गेम्स खेलने में बिताता है। मां लतिका कहती हैं, ‘बेटे के रवैये से सभी चिंतित हैं, क्योंकि श्वेतांश काफी बातूनी हुआ करता था। वह परिवार के सदस्यों के अलावा दोस्तों के साथ भी नियमित रूप से बातचीत करता था, जो इन दिनों बंद सा हो गया है।‘

स्पीच व लैंग्वेज स्किल हुई प्रभावित: बच्चे मानसिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शारीरिक हर प्रकार की चुनौती से लड़ रहे हैं। लास एंजिलिस स्थित वेनिस फैमिली क्लीनिक की पीडियाट्रिक्स विभाग की प्रमुख डॉ.मिशेल का एक शोध बताता है कि इन दिनों बच्चों को नींद न आना एक बड़ी समस्या बन गई है। स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण न रहने से उनके खानपान पर असर पड़ रहा है। भूख खत्म हो रही है। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आ जा रहा है। अकेले बच्चों में खासकर चिड़चिड़ापन एवं गुस्सा बढ़ रहा है। उधर, ब्रिटेन स्थित एजुकेशन एंडाउमेंट फाउंडेशन द्वारा कराए गए एक हालिया सर्वे पर ध्यान दें, तो महामारी के दौरान स्कूली दोस्तों, शिक्षकों और यहां तक कि अपने पैरेंट्स या परिवारवालों से संवाद कम होने से बच्चों की स्पीच एवं लैंग्वेज स्किल प्रभावित हुई है। उनके सामाजिक एवं भावनात्मक विकास पर असर पड़ा है। न्यूरोसाइंस से जुड़े रिसर्च बताते हैं कि पांच से सात वर्ष से कम आयु के बच्चों में उच्चारण, व्याकरण या ध्वनि विज्ञान (फोनोलाजी) सीखने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत तीव्र होती है। जैसे-जैसे वे किशोरावस्था की ओर बढ़ते हैं, यह प्रक्रिया धीमी होती जाती है। कई व्यावहारिक अध्ययन भी बताते हैं कि अगर सात वर्ष की उम्र तक बच्चों को एक से अधिक भाषा सिखायी जाए, तो वे दोनों में दक्ष हो सकते हैं।

आटिस्टिक बच्चों की अलग चुनौतियां: विशेषज्ञों की मानें, तो देश में ऐसे बच्चों की कमी नहीं, जो देर से बोलना शुरू करते हैं। आमतौर पर जहां ज्यादातर बच्चे चार वर्ष की आयु तक स्पष्ट बोलने लगते हैं, वहीं कुछ बच्चे छह वर्ष तक नहीं बोल पाते। ऐसे बच्चों को समय रहते स्पेशल केयर एवं थेरेपी की जरूरत पड़ती है। अगर उन्हें समय से ट्रेन या गाइड नहीं किया जाता, तो बड़े होने पर उनमें सोशल, बिहेवियरल, इमोशनल अथवा काग्निटिव समस्या हो सकती है। स्पेशल एजुकेटर सुकन्या का कहना है कि बच्चों के संपूर्ण व्यक्तित्व विकास में स्पीच एवं लैंग्वेज डेवलपमेंट की प्रमुख भूमिका होती है। इस समय जब सामान्य बच्चों के लिखने व बोलने दोनों का अभ्यास कम हो गया है, वैसे में आटिस्टिक, हकलाकर या तुतलाकर बोलने वाले बच्चों की अपनी अलग चुनौती है। हालांकि, ऐसे बच्चों के लिए आनलाइन क्लासेज चलायी जा रही हैं, जिसमें बच्चों के साथ उनके पैरेंट्स की भी काउंसिलिंग की जाती है।

पैरेंट्स को बिताना होगा क्वालिटी टाइम: मनोचिकित्सकों की मानें, तो इस समय बच्चे अपने आसपास काफी कुछ घटता हुए देख रहे हैं। उनके शब्दकोश में कोरोना, कोविड-19, शारीरिक दूरी, क्वारंटाइन, होम आइसोलेशन जैसे शब्द जुड़ते जा रहे हैं। यह कहीं न कहीं उनके मन-मस्तिष्क में भय को जन्म दे रहा है। जिन एकल परिवारों में माता-पिता दोनों कामकाजी हैं, वहां बच्चे और भी अकेलापन महसूस कर रहे हैं। वहीं, कोरोना की दूसरी लहर ने जब परिवार के बड़ों को अपनी चपेट में ले लिया, तो उसका भी सबसे बड़ा खामियाजा छोटे बच्चों को भुगतना पड़ा है। उनका अकेलापन कई गुना बढ़ गया है। इसके अलावा, कोविड के कारण शारीरिक दूरी बनाने की बाध्यता ने उन्हें इतना संवेदनशील बना दिया है कि वे दूसरों द्वारा स्पर्श की गई चीजों को छूने से संकोच कर रहे हैं। अपनी चीजें साझा करने से डर रहे हैं। बाल मनोचिकित्सक साक्षी कहती हैं, ‘हमें बच्चों को बेवजह डराने के बजाय उन्हें वस्तुस्थिति से सही तरीके से अवगत कराने, उन्हें समझाने की जरूरत है। पैरेंट्स घर के माहौल को जितना सामान्य बनाकर रखेंगे, बच्चों के साथ पर्याप्त एवं क्वालिटी टाइम बिताएंगे, उन्हें कुछ क्रिएटिव करने, बुक रीडिंग या स्टोरी टेलिंग एक्टिविटीज के लिए प्रोत्साहित करेंगे, उतना ही बच्चे सामान्य व्यवहार करेंगे और खुश भी रहेंगे।‘

बनना होगा बच्चों का सच्चा दोस्त: स्टोरीटेलर प्राची का मानना है कि कोरोना काल में बच्चों ने परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाया है। पैरेंट्स के अलावा ग्रैंड पैरेंट्स के साथ उनकी बांडिंग बढ़ी है। वे घर के कार्यों में रुचि ले रहे हैं। खुद को क्रिएटिव तरीके से व्यस्त रखा है। दूसरों की मदद करने के लिए आगे आ रहे हैं। इन सब को देखते हुए हमें बच्चों का सच्चा दोस्त बनकर दिखाना होगा। उनका विश्वास जीतना होगा। एक निजी कंपनी में काम करने वाली संजना की मानें, तो हम बच्चों को जितना सच के करीब रखेंगे, उतना उनका मनोबल बढ़ेगा। वह बताती हैं कि, ‘मेरी पांच वर्षीय बेटी स्वाति पिछले डेढ़ साल से घर पर ही है। बाहरी दुनिया से उसका सामना या संवाद न्यूनतम रहा है। कुछ महीने पहले जब हम उसे अपनी गाड़ी में बाहर लेकर गए, तो उसने सड़क पर कुछ लोगों को पैसे मांगते देखा। उसके मन में एकदम से कई सवाल खड़े हो गए। आखिर वे पैसे क्यों मांग रहे हैं? उनके सारे पैसे कहां चले गए? उसके प्रश्नों को सुनते हुए हमने तब कुछ लोगों को पैसे दे दिए। लेकिन एक महिला से हमें क्षमा मांगनी पड़ी क्योंकि नगद खत्म हो गए थे। बेटी ने इस घटना को भी ध्यान से देखा। दो-तीन दिन बाद जब हम सभी दोबारा बाहर निकले, तो स्वाति ने मुट्ठी में कुछ छिपा रखा था। पूछने पर मुट्ठी खोली, तो उसमें कुछ सिक्के थे जो उसने अपनी गुल्लक से निकाले थे। उसने कहा, आज अगर वह महिला दिखेंगी, तो मैं उन्हें ये सारे पैसे दे दूंगी। स्वाति को बेशक पैसों का मूल्य नहीं पता था। लेकिन उसे यह याद रहा कि किसी जरूरतमंद की मदद करनी है।’

बच्चों का रखें ऐसे ध्यान

साथ बैठकर टीवी शोज, मूवी, स्पोर्ट्स इवेंट्स, वीडियो गेम्स आदि देखने एवं उन पर चर्चा करने से बढ़ेगा सोशल इंटरैक्शन घर के कामकाज में ले सकते हैं बच्चों का सहयोग साथ मिलकर पढ़ें अलग-अलग जानर की किताबें बच्चों के साथ खेलें राइमिंग एवं वर्ड गेम्स, पजल दोस्तों एवं रिश्तेदारों से नियमित कराएं फोन पर बातें आनलाइन डांस या आर्ट क्लास से टीचर्स एवं नये बच्चों से जुड़ने का मौका सुबह या शाम साथ मिलकर करें एक्सरसाइज बच्चों का बनाएं एक रूटीन, ताकि बना रहे अनुशासन

पैरेंट्स को समझनी होगी बच्चों की मन:स्थिति: बाल मनोचिकित्सक डा साक्षी गुप्ता ने बताया कि बच्चे कई प्रकार की समस्याओं का सामना कर रहे हैं। स्कूल बंद होने एवं दोस्तों का स्टडी ग्रुप न बन पाने के कारण उनका पढ़ाई में मन नहीं लग रहा। अटेंशन स्पैन कम होने के अलावा वे एकाग्र नहीं हो पा रहे। पैरेंट्स को लगता है कि मोबाइल पर अधिक समय देने से ऐसा हो रहा है। लेकिन वे बच्चों को दूसरा कोई विकल्प भी नहीं दे पा रहे हैं। इस वजह से पढ़ाई के अलावा रीक्रिएशन एवं मनोरंजन के लिए गैजेट्स एवं मोबाइल फोन पर निर्भर रहना उनकी मजबूर बन चुकी है। जरूरी यह है कि पैरेंट्स बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम गुजारें। वे उनके साथ बैठकर वीडियो गेम्स या टीवी शोज देख सकते हैं। उन्हें छोटे बच्चों के अलावा किशोर उम्र वालों की मन:स्थिति को भी समझना होगा, जो अपने लिए एक स्पेस चाहते हैं। इन दिनों उनकी सहनशक्ति वैसे ही कम हो गई है। अगर वे देर रात तक फोन पर बात करते हैं या आनलाइन मूवी देखते हैं, तो नाराज होने की जगह उन्हें प्यार से समझा सकते हैं कि फ्रीडम देने का यह कतई मतलब नहीं होता कि उसका गलत इस्तेमाल हो। पैरेंट्स बच्चों के लिए एक समय निर्धारित कर सकते हैं, जिसके बाद वे फोन का प्रयोग नहीं करेंगे। उन्हें एक रोल माडल की तरह पेश आना होगा। अपने बच्चों पर विश्वास रखना होगा।

बच्चों के साथ बढ़ाना होगा संवाद: दिल्ली के शालीमार बाग में फोर्टिस अस्पताल वरिष्ठ स्पीच थेरेपिस्ट पीयूष सेमवाल ने बताया कि पिछले छह-सात महीनों में हमारे पास ऐसे मामलों की संख्या निश्चित तौर पर बढ़ी है, जहां बच्चों को बोलने में दिक्कत आ रही है, वे ठीक से अपनी बात व्यक्त नहीं कर पा रहे या फिर देर से बोल रहे। इनमें एकल परिवारों के बच्चे अधिक हैं। इसके अलावा, वैसे बच्चे हैं जिनके माता-पिता दोनों कामकाजी हैं। हैरानी की बात यह है कि महानगरों के अलावा अब ग्रामीण इलाकों से भी ऐसे मामले आ रहे हैं, जहां बच्चों को संवाद करने में दिक्कत आ रही है, उनमें स्पीच डिसार्डर एवं आटिज्म के लक्षण देखे जा रहे हैं।

कुछ बच्चों में देर से बोलने की समस्या के अलावा व्यावहारिक मसले भी सामने आ रहे हैं। इसी तरह, तीन से सात वर्ष के बच्चों की बोली में अस्पष्टता यानी तोतलापन, हकलापन की समस्या आ रही है। उनका उपयुक्त शब्दकोश सही रूप से विकसित नहीं हो पा रहा है। स्पीच डिसार्डर के साथ ही बच्चों को मानसिक परेशानी हो रही है। खासकर छोटे बच्चे अपने मन की बात ठीक तरीके से साझा नहीं कर पा रहे हैं, जबकि छह-सात वर्ष की उम्र में बच्चे खुद को अभिव्यक्त करना अच्छी तरह सीख लेते हैं। इसलिए जरूरी है कि पैरेंट्स बच्चों से नियमित संवाद करें। उनके साथ बुक रीडिंग करें। वर्ड गेम्स आदि खेलें।

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