Coronavirus से जंग जीतने के लिए एजेंट, होस्ट और परिवेश के तीनों पहलुओं पर करना होगा काम

कोरोना महामारी से जीतने के लिए एपिडेमियोलॉजी त्रिकोण के तीनों पहलुओं पर काम करना होगा।

सरकारों को लोगों के साथ मिलकर कुछ नए और समन्वित कदम तत्काल उठाने होंगे। महामारी को और फैलने से रोकने के लिए नए सिरे से जनसंदेश और जन भागीदारी की प्रक्रिया शुरू करनी होगी जो वैज्ञानिक सोच पर आधारित हो जिससे लोगों में विश्वास बहाली सुनिश्चित हो।

Sanjay PokhriyalMon, 19 Apr 2021 11:09 AM (IST)

डॉ चंद्रकांत लहरिया। हामारियां आसानी से नहीं जाती हैं। 1918-20 की एनफ्लुएंजा महामारी में दो साल के भीतर कुल चार लहरें आयी थीं। उसमें दूसरी लहर सबसे घातक थी। कोविड-19 महामारी के लिए लगाए गए सख्त लॉकडाउन से लोगों को परेशानी तो हुई, लेकिन कह सकते हैं कि इससे भारत में कोविड-19 की पहली लहर, कई दूसरे देशों के मुकाबले देर से आई। भारत में जब पहली लहर चल रही थी, तो बाकी देश कोरोना की दूसरी लहर का सामना कर रहे थे।

जनवरी 2021 आते-आते भारत में कोविड -19 के नए मामले बहुत कम हो गए। साथ ही बचाव के दो टीके भी लगने शुरू हो गए। हम सभी जरूरत से ज्यादा सहज हो गए, जैसे हम कोरोना से जंग जीत चुके है। यह सोचने का कोई कारण नहीं था कि देश में कोरोना की दूसरी लहर नहीं आएगी। इस बात पर अधिक चर्चा थी कि क्या वजह है कि भारत में मामले कम हो गए। लेकिन कोई इस बात को लेकर तैयारी नहीं कर रहा था कि देश में दूसरी लहर भी आ सकती है। यदि सिर्फ इस बात को ही याद रखा जाता कि बाकी देशों की तरह, भारत भी कोरोना की दूसरी लहर से अछूता नहीं रहेगा और उस हिसाब से तैयारी रखी गई होती, तो परिस्थितियां मौजूदा समय में इतनी विकराल नहीं होती।

महामारी विज्ञान में किसी भी बीमारी के प्रसार को समझने किए लिए एक अवधारणा है, जिसे ‘एपिडेमियोजिक त्रिकोण’ कहते हैं। इस त्रिकोण के तीन पहलुओं में, पहला ‘एजेंट’ या बीमारी का कारक; दूसरा ‘होस्ट’ अर्थात लोग जिनको ‘एजेंट’ संक्रमित कर सकता है, और तीसरा ‘परिवेश’ है। एजेंट, कोरोना वायरस है। होस्ट हम सब लोग जिनको बीमारी हो सकती है। परिवेश का अर्थ बहुआयामी है जिसमें रहने वाले लोगों की सामाजिक परिस्थितियों के साथ-साथ राजनीतिक और स्वास्थ्य नीतियां, और स्वास्थ्य तंत्र भी शामिल है। कोई भी बीमारी अथवा महामारी किस स्तर पर फैलेगी, यह इन तीनों पहलुओं के परस्पर प्रभाव पर निर्भर है।

अब अगर कोविड-19 महामारी के संदर्भ में बात करें तो पिछले कुछ महीनों में एजेंट (वायरस) का स्वरूप बदल गया है, और भारत तथा अन्य देशों में नए स्ट्रेन आए हैं। इनका भारत में बीमारी के प्रसार पर कितना असर है, इसके बारे में हम पूरी तरह नहीं जानते। लेकिन देश में पहली लहर में एक संक्रमित व्यक्ति से दूसरों में संक्रमण कम फैल रहा था। आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में हुए एक बड़े अध्ययन में यह बात सामने आई थी कि 70 फीसद मामलों में पति पत्नी में से किसी एक ही संक्रमण हुआ। दूसरी लहर में अब देखा जा रहा है कि लगभग पूरा परिवार संक्रमित हो रहा है। एक संक्रमित व्यक्ति से दो या तीन लोगों को संक्रमित होना आम हो गया है। इससे संकेत मिलते है कि वायरस में संक्रमण की क्षमता पहले से अधिक है।

अब बात आती है ‘होस्ट’ की। जनवरी में संक्रमण कम होने पर डर बिल्कुल खत्म हो गया। बाजारों, रेस्तरां और सैर सपाटों की जगहों पर भीड़ बढ़ने लगी थी। मास्क या तो नजर नहीं आते थे या नाक और मुंह से गिरकर गले पर आ गए थे। लोग पर्यटन स्थलों की यात्रएं करने लगे थे। बचाव के अन्य नियमों का पालन भी तुलनात्मक रूप से काम हो गया था। अब तीसरे पहलू की बात करें तो महामारी फैलने में ‘परिवेश’ की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह उन परिस्थितिओं को दर्शाता है जिनमें लोग रहते हैं और काम करते हैं। इसका संबंध इससे भी होता है कि संक्रमण से बचाव के लिए क्या नीतियां अपनाई जा रही हैं? संक्रमण से बचाव के लिए लोगों को किस तरह के संदेश दिए जा रहे हैं? कार में अकेले बैठे व्यक्ति को मास्क पहनने के लिए तो कहा जा रहा था, लेकिन दूसरी ओर भीड़ भरी राजनीतिक रैलियां हो रही थी। कुंभ का भी आयोजन हो रहा है।

महामारी से लड़ने के लिए पहले से तैयारी ही, सबसे बेहतर उपाय है। एक बार जब वायरस फैलने लगता है तो उसे रोक पाना आसान नहीं होता। लोगों का व्यवहार इस बात पर निर्भर करता है कि जो उन्हें सचेत करने वाले हैं वे खुद उसका पालन कर रहे हैं या नहीं। लिहाजा, लोगों ने बचाव के लिए जारी संदेशों को गंभीरता से लेना छोड़ दिया। सतर्कता और सख्ती भी बंद हो गई। सितंबर व अक्टूबर से देश भर में जब पहली लहर के दौरान संक्रमण चरम पर था तो सरकार बहुत गंभीरता से त्योहारों में संभलकर रहने की सलाह दे रही थी। लोग उसका पालन भी कर रहे थे और मन में डर भी था। टीका आने के बाद सरकार और आमजन दोनों ही स्तर पर सतर्कता में कमी आ गई।

महामारी सिर्फ एक बीमारी नहीं होती। महामारी में बीमारी के साथ सामाजिक व आíथक पहलु भी जुड़े होते हैं। इसलिए रोकथाम के अभियान में सामाजिक व आíथक पहलुओं पर भी ध्यान देना होगा। अब जब भारत, कोरोना की दूसरी और पहले से तेज लहर की चपेट में है, तो सरकारों को लोगों के साथ मिलकर कुछ नए और समन्वित कदम तत्काल उठाने होंगे। महामारी को और फैलने से रोकने के लिए, नए सिरे से जनसंदेश और जन भागीदारी की प्रक्रिया शुरू करनी होगी, जो वैज्ञानिक सोच पर आधारित हो जिससे लोगों में विश्वास बहाली सुनिश्चित हो। लोगों को सलाह देने के साथ-साथ यह बताने की जरूरत है कि यह सलाह क्यों दी जा रही है। उस सलाह का वैज्ञानिक आधार क्या है? उसका पालन क्यों जरूरी है? इस कार्य में प्रोफेशनल एजेंसियों की मदद ली जा सकती है। यदि उत्तर प्रदेश व कुछ अन्य बड़े राज्यों में संक्रमण बढ़ने की संभावना है तो वहां के सभी जिलों में लोगों को जागरूक करने के लिए अभियान चलाया जाना चाहिए।

वैसे भी यह संक्रमण लंबा चलेगा। यदि परिवार के सभी लोग संक्रमित हो रहे हैं तो अब माइक्रो कंटेनमेंट के अलावा ‘परिवार आधारित कंटेनमेंट’ रणनीति पर विचार करना चाहिए। यदि कोविड-19 जांचों की कुल संख्या उच्च रखने के बाबजूद, अगर टेस्ट पॉजिटिविटी दर 15-20 फीसद है तो ऐसी स्थिति में एक सीमा के बाद जांच बढ़ाना भी चुनौतीपूर्ण है। ऐसे में सिंड्रोमिक आधार पर इलाज की व्यवस्था पर विचार करना चाहिए। जांच में जिनको अधिक खतरा है उन्हें प्रमुखता दी जाए।

फिलहाल बढ़ते मरीजों को देखते हुए, इलाज के लिए अस्थायी तौर पर आइसोलेशन और क्वारंटाइन केंद्र बनाए जाने चाहिए। होम आइसोलेशन वाले मरीजों की निगरानी सुदृढ़ हो तो इस महामारी के प्रकोप को काफी हद तक काबू में किया जा सकता है। बीमारी के सामाजिक पहलुओं से निपटने के लिए, गरीब और प्रतिबंधों से प्रभावित लोगों को आíथक सहायता और राशन की उचित व्यवस्था महामारी से निपटने की रणनीति में शामिल होने चाहिए। कोरोना महामारी से लड़ाई लंबी चलेगी और इससे जीतने के लिए, एपिडेमियोलॉजी त्रिकोण के तीनों पहलुओं पर काम करना होगा।

[जन नीति और स्वास्थ्य तंत्र विशेषज्ञ, नई दिल्ली]

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