देश अब एक ‘महामारी जनरेशन’ में प्रवेश करने के लिए तैयार, बच्चों में दिखेगा कोरोना का कुप्रभाव

करीब 37.5 करोड़ बच्चों में वजन और लंबाई घटने के साथ ही मृत्यु दर में हो सकती है वृद्धि

कोविड-19 संक्रमण भले ही कम हो गया हो इसकी वैक्सीन भी आ गई हो लेकिन इस महामारी का कुप्रभाव अभी वर्षो तक देखने को मिलेगा। खासकर बच्चों का शारीरिक विकास इससे सर्वाधिक प्रभावित होगा। बच्चों की मृत्युदर में भी इजाफा हो सकता है और उनकी पढ़ाई-लिखाई भी छूट सकती है।

Vinay Kumar TiwariFri, 26 Feb 2021 02:22 PM (IST)

संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। कोविड-19 संक्रमण भले ही कम हो गया हो और इसकी वैक्सीन भी आ गई हो, लेकिन इस महामारी का कुप्रभाव अभी वर्षो तक देखने को मिलेगा। खासकर बच्चों का शारीरिक विकास इससे सर्वाधिक प्रभावित होगा। बच्चों की मृत्युदर में भी इजाफा हो सकता है और उनकी पढ़ाई-लिखाई भी बीच में ही छूट सकती है।

यह दावा किया गया है सेंटर फार साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) की वार्षिक रिपोर्ट स्टेट आफ इंडियाज एन्वायरमेंट 2021 में। सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण सहित देश भर के 60 से अधिक पर्यावरणविदें ने एक साथ यह रिपोर्ट बृहस्पतिवार शाम वर्चुअली जारी की। 

इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत अब एक ‘महामारी जनरेशन’ में प्रवेश करने के लिए तैयार है। 37.5 करोड़ बच्चे (नवजात शिशु से लेकर 14 साल के बच्चों तक) लंबे समय तक चलने वाले कोरोना के कुप्रभावों की चपेट में आ सकते हैं। उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होने से यह कुप्रभाव कम वजन, कम लंबाई और मृत्यु दर में वृद्धि से लेकर शिक्षा के नुकसान के रूप में भी सामने आ सकता है।

विश्व भर में पचास करोड़ से ज्यादा बच्चे स्कूल से बाहर हो गए हैं। इसमें आधे से ज्यादा बच्चे भारत में हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पूर्ण लाकडाउन के बावजूद भारत संक्रमण मुक्त नहीं रहा। यहां आबादी का एक बड़ा हिस्सा स्लम, झुग्गी-झोपड़ियों और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में रहता है। वहां न तो पीने का साफ पानी उपलब्ध है और न सफाई ठीक से होती है। ऐसे में संक्रमण फैलने की गुंजाइश रहती है। 

बाघों की संख्या बढ़ी, मगर घट गया वन क्षेत्र

देश में वनस्पति और वन्य जीव खतरे में हैं। पर्यावरण संबंधी अपराध के मामले बढ़ रहे हैं, पर उनका निपटान धीमा है। वर्ष 2019 में 34,671 अपराध दर्ज किए गए, जबकि 49,877 मामले लंबित हैं। सरकारी दावा है कि वर्ष 2017 के बाद से भारत का वन क्षेत्र 5,188 वर्ग किमी हो गया है।

हालांकि सीएसई इससे इत्तेफाक नहीं रखता। बाघों को लेकर भी आंकड़ा भ्रमित करता है। सरकारी दावा है कि भारत में 714 बाघों को जोड़ा है, पर बाघों के कब्जे वाला क्षेत्र 17,000 वर्ग किमी (पिछले चार सालों में) पहले से सिकुड़ गया है। 

सतत विकास में भारत 192 में से 117वें नंबर पर 

सतत विकास के मामले में भारत 192 देशों में से 117वें स्थान पर है। हैरत की बात यह कि अब भारत पाकिस्तान को छोड़ सभी दक्षिण एशियाई देशों से भी पीछे हो गया है। सतत विकास के लक्ष्यों को पूरा करने के मामले में देश में सबसे अच्छा प्रदर्शन वाले पांच राज्य केरल, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और तेलंगाना हैं, जबकि सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले पांच राज्य बिहार, झारखंड, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय और उत्तर प्रदेश हैं। 

अब यह जांच करने का समय आ गया है कि कोरोना महामारी हमारे लिए दीर्घावधि में क्या छोड़ने वाली है। एक खोई हुई पीढ़ी, जो अस्वस्थता, कुपोषण, गरीबी और शैक्षणिक उपलब्धियों में दुर्बलता से घिरी हुई है। चुनौती यह भी है कि पर्यावरण का उपयोग सतत विकास के लिए किया जाए, ताकि जलवायु-जोखिम वाले समय में हम आजीविका, पोषण सुरक्षा में सुधार कर सकें। (-सुनीता नारायण, महानिदेशक, सीएसई)

 

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