Congress Party Politics: दलितों की राजनीति के सहारे सत्ता पाने का सपना देख रही कांग्रेस

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी कार्यालय से वाल्मीकि मंदिर तक शोभायात्रा आयोजित की तो इसे हरी झंडी दिखाने के लिए राहुल गांधी को बुलाया गया। दिल्ली में राहुल आए तो नेताओं ने उनके सम्मान के बहाने अपनी और पार्टी की जय जय भी कर ली।

Jp YadavThu, 21 Oct 2021 10:45 AM (IST)
दलितों की राजनीति के सहारे सत्ता पाने का सपना देख रही कांग्रेस

नई दिल्ली [संजीव गुप्ता]। समाज के ज्यादातर वर्गों से कटती जा रही दिल्ली कांग्रेस अब अपना बिखरता जनाधार बचाने में जुटी है। किसानों ने तो पिछले दिनों कांग्रेस की बैसाखी बनने से इनकार कर दिया, ऐसे में अब कांग्रेसी दलितों की नाव पर सवार हो गए हैं। दिल्ली कैंट प्रकरण से लेकर दलितों से जुड़ा जो भी घटनाक्रम होता है, पार्टी उसे भुनाने की कोशिश करती है। वाल्मीकि जन्मोत्सव के बहाने भी प्रदेश कांग्रेस ने दलितों को जोड़ने का प्रयास किया। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी कार्यालय से वाल्मीकि मंदिर तक शोभायात्रा आयोजित की तो इसे हरी झंडी दिखाने के लिए राहुल गांधी को बुलाया गया। राहुल आए तो नेताओं ने उनके सम्मान के बहाने अपनी और पार्टी की जय जय भी कर ली। निगम चुनाव की आहट में इस शोभायात्रा में पार्टी बड़ी संख्या में कार्यकर्ता जुटाने में भी कामयाब हो गई। बेहतर हो कि पार्टी ऐसा ही समाज के हर वर्ग में करे। दिल्ली ही नहीं, बल्कि आगामी यूपी विधानसबा चुनाव 2022 में भी कांग्रेस दलितों को अभी से लुभाने में जुट गई है। प्रियंका गांधी के साथ राहुल गांधी भी यूपी में सक्रियता दिखा रहे हैं।

प्रचार प्रपंच

दिल्ली नगर निगम चुनाव की तैयारी में आम आदमी पार्टी और भाजपा से लगातार पिछड़ रही प्रदेश कांग्रेस भी अब कुछ- कुछ करने की सोच रही है। इसी दिशा में पार्टी नेताओं ने वार्ड स्तर पर रैलियां निकालने का कार्यक्रम बनाया है। दरअसल, नेताओं का मानना है कि इन रैलियों से एक पंथ दो काज होंगे। एक ओर कार्यकर्ता फिर से खड़ा हो पाएगा तो दूसरी ओर जनता को कांग्रेसकाल याद दिलाया जा सकेगा। अब पार्टी की यह रणनीति कितनी सफल होगी, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन राजनीतिक जानकारों की मानें तो निगम चुनाव के लिए पार्टी नेताओं को युद्ध स्तर पर जुट जाना चाहिए। वार्ड ही नहीं, ब्लाक स्तर पर भी मजबत पकड़ बनानी चाहिए। सबसे पहले तो हर उस पार्टी कार्यकर्ता और नेता को घर से बाहर निकालना चाहिए जो लंबे समय से निकला ही नहीं है। निगम चुनाव दिल्ली कांग्रेस के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं।

बाहरी और भीतरी के द्वंद्व में उलझे कांग्रेसी

कांग्रेस के लगातार हाशिये पर जाते रहने की एक वजह कांग्रेसियों का आपस में उलझे रहना भी है। विपक्षी पार्टियों के साथ लड़ने से पहले कांग्रेसी एक दूसरे के सामने खड़े हो जाते हैं। आलम यह हो गया है कि पार्टी नेताओं को वे लोग हजम ही नहीं हो रहे जो एक बार पार्टी छोड़कर चले गए थे और बाद में वापस आ गए। हाल ही में निगम चुनाव की तैयारियों को लेकर प्रदेश कार्यालय में एक बैठक रखी गई तो वहां भी बाहरी और भीतरी का यह मुददा उठ गया। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा ने भी इस दौरान ऐसे कुछ नेताओं की निष्कि्रयता पर सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि वापस लौैटकर भी ऐसे नेता पार्टी के लिए कोई योगदान नहीं दे रहे हैं। इसमें तो खैर कोई शक नहीं कि जिस पार्टी ने पहचान दी हो, उसकी मजबूती के लिए भी यथासंभव प्रयास करना चाहिए। 

मुद्दे अनेक, अंजाम तक नहीं पहुंचा पा रहे एक

दिल्ली में मुददे अनेक हैं, प्रदेश कांग्रेस भी सभी को उठाने में लगी रहती है। लेकिन पुख्ता रणनीति न होने के कारण अंजाम तक किसी को नहीं पहुंचा पाती। कायदे से तो पार्टी को अपना एजेंडा सेट करके उस पर आगे बढ़ना चाहिए। किन्तु ऐसा कर पाने में नाकाम कांग्रेसी मुददों के लिए हर समय भाजपा और आम आदमी पार्टी की ओर मुंह ताकते रहते हैं। कभी किसानों के साथ खड़े होने की कोशिश करते हैं तो कभी लखीमपुर खीरी हिंसा प्रकरण का विरोध करने लगते हैं। कभी बढ़ती महंगाई का विरोध करते हैं तो कभी डेंगू का मुद्दा उठा लेते हैं। और कुछ नहीं मिलता तो आप और भाजपा की पार्टी गतिविधियों पर ही बयान जारी करने लगते हैं। जनता भी सोचने पर विवश हो गई है कि कांग्रेस का स्टैंड आखिर है क्या? बहुत बार तो लगता है कि कांग्रेस का काम विरोध के लिए विरोध करना ही रह गया है। 

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