बच्चे दिखा रहे क्रिएटिविटी का कमाल, डूडल के जरिये बना रहे नई पहचान

आनलाइन सर्च के लिए इन दिनों हर कोई गूगल पर जाता है। पर अक्सर सर्च करने से पहले नजर गूगल के आकर्षक डूडल पर चली जाती है। बेशक डूडल का मतलब आड़ी-तिरछी रेखाएं होती हैं पर आज यह क्रिएटिविटी का प्रतीक बन गया है।

Sanjay PokhriyalMon, 27 Sep 2021 04:55 PM (IST)
आप भी डूडल बनाकर दुनिया में छा सकते हैं..

यशा माथुर। ग्रुरुग्राम की दिव्यांशी सिंघल जब अपनी दादी के घर गईं तो उन्होंने काफी पेड़ कटते देखे। उनके बालमन ने सोचा कि अगर इन पेड़ों के पैर होते तो यह भागकर अपनी जान बचा लेते और कटने से बच जाते और इसी विचार को उनकी नन्हीं उंगलियों ने कागज पर उतार दिया। उन्होंने कुछ पेड़ बनाए और उन्हें जूते पहन कर चलते दिखाया। अपनी पेंटिंग को नाम दिया 'वाकिंग ट्री'। उनकी इस सोच का गूगल भी कायल हो गया और लाख बच्चों में से उनकी पेंटिंग का चयन कर बाल दिवस पर डूडल बनाया।गूगल को जब अपना नाम मिला तो वही दिन उसका जन्मदिन कहलाया। गूगल पनपा तो डूडल भी महत्‍वपूर्ण हो गया। दोस्तो, दिव्यांशी की तरह ही इन दिनों बच्चों व किशोंरों में डूडल बनाने का शौक बहुत पनप रहा है। दिव्यांशी की सोच समाज से भी सारोकार रखती है।

भावनाएं होती हैं डूडल में : बच्चों के नन्हें दिमाग में किस तरह की सोच आती है जो उन्हें डूडल बनाने के लिए प्रेरित करती है? या फिर वे अपनी इस क्रिएटिविटी को किस तरह से पंख दे कर एंजॉय कर रहे हैं? यह आपके जानने का विषय हो सकता है दोस्तो, तो हम आपको मिलवाते हैं बारहवीं कक्षा में पढ़ रहे डूडल बनाने के शौकीन सत्रह साल के पलाश पांडे से। उन्होंने आठवीं कक्षा से ही डूडल बनाना शुरू कर दिया था। वे कहते हैं, 'एक तरह से तो हर कोई डूडल बनाता है। अगर आपको खाली कागज दे दिया जाए और आप उस कागज पर फूल-पत्ती भी बना रहे हैं तो उसे भी डूडल कहते हैं। इस प्रकार से हर बच्चा डूडलिंग करता है। और अगर मंडाला आर्ट या ऐसे डूडल की बात करें जिसकी कोई थीम होती है या जिसमें भावनाएं होती हैं तो वह बड़े होने के साथ विकसित होती है।'

ट्रक आर्ट से प्रेरित डूडल : बड़ी आइटी कंपनियां डूडल आर्ट का इस्तेमाल अपने कर्मचारियों का तनाव दूर करने या मेडिटेशन के लिए भी कर रही हैं। खास तौर पर युवाओं के बीच इस कला को सीखने का जबरदस्त क्रेज है। अंतरराष्ट्रीय स्तर के डूडल आॢटस्ट शांतनु हजारिका मानते हैं कि गूगल का डूडल, वास्तव में इस कला का बहुत छोटा भाग है। डूडल कला भारत की मधुबनी पेंटिंग कला जैसी है। लेकिन इसका उद्गम पश्चिमी देशों से हुआ है। वहीं से यह कला भारत समेत अन्य देशों तक पहुंची है। भारत के ग्रामीण अंचल में बहुत पहले से डूडल ट्रक आर्ट से प्रेरित हैं। ट्रकों पर काफी पहले से खूबसूरत चित्रकारी की परंपरा रही है, ताकि ट्रक चालक घर से महीनों दूर रहने के दौरान अपने दिमाग को तनाव मुक्त रख सकें। डूडल में पशु-पक्षी और पेड़-पौधों को शामिल किया जाता है। डूडल आर्ट का इन दिनों फैशन, टी-शर्ट प्रिंटिंग समेत किताबों और विज्ञापनों में जबरदस्त इस्तेमाल हो रहा है।

डूडलिंग एक खूबसूरत थेरेपी है : जब हम बच्चे होते थे और हमें कागज और रंग देकर, चित्र बनाकर, रंग भरने के लिए कहा जाता था तो हम खुश हो जाते, व्यस्त रहते और हमें काफी मजा भी आता था। यही डूडलिंग है। ऐसा बड़े होने पर भी होता है। हम रंगों के साथ खुश होते हैं। डूडलिंग करने से हमें ब्रेक मिलता है और हमारा मानसिक तनाव कागज पर उतर आता है। हम अपनी भावनाओं को रंगों के जरिए व्यक्त करने लगते हैं। यह एक थेरेपी है। हर रंग का अलग अर्थ और अलग प्रभाव होता है। डूडलिंग मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक खूबसूरत थेरेपी है। मैंने स्कूल के बाद बीबीए और फिर एमबीए किया और कॉरपोरेट जॉब करने लगी। फिर मेरे माता-पिता की मृत्यु हो गई तो मेरी मानसिक स्थिति काफी खराब हो गई। मेरा जॉब करने का मन नहीं था। बचपन में ड्राइंग क्लासेज करती थी। चित्रों में रंग करने का मुझे बहुत शौक था। तो मैंने अपनी मानसिक स्वास्थ्य के लिए, अपनी खुशी के लिए ड्राइंग बनानी शुरू की।

'द डूडल डेस्क' के फाउंडर भव्या दोषी ने बताया कि पहले मैं अपने हाथ से बने डूडल ही इंस्टाग्राम पर डालती थी लेकिन बाद में मैने जापानी कला कवायन के डूडल बनाने का फैसला किया। मुझे बचपन से ही वैसी ही कलाकारी पसंद थी। पर कैसे होगा, कैसे मैं इन्हें बनाऊंगी? यह सवाल थे मेरे अंदर। लेकिन धीरे-धीरे मैंने सॉफ्टवेयर सीखे और समझा कि इसे कैसे बनाते हैं। मुझे मेरे जैसे लोगों की मदद भी करनी थी। तो मैं मोटिवेशनल डूडल्स बना कर इंस्टाग्राम पर डालने लगी। तब तक वह मेरा शौक था। लेकिन एक ही महीने में बहुत अच्छी प्रतिक्रियाएं मिलने लगीं। तब से मेरी यात्रा शुुरू हुई। मैंने सोचा कि अब इसे ही आगे बढ़ाऊंगी। मैंने सकारात्मकता की शक्ति को पहचाना और 'द डूडल डेस्क' नाम से स्टार्टअप बना कर डूडल्स सबके सामने लाने लगी। मेरे डूडल्स की खूबसूरती यह है कि बहुत कम कला-कार्य और शब्दों में प्रभावी तरीके से जिंदगी के सबक बताते हैं। आज गर्व होता है कि मैं बहुत से लोगों की मदद कर पाई हूं। कोविड के दौरान तो हमने सबके लिए बहुत सकारात्मक संदेश दिए ताकि वे इस कठिन समय को सकारात्मक तरीके से व्यतीत कर सकें। अब मैं बहुत खुश हूं। हम अपने प्रोडक्ट और अपनी ऐप भी लांच करेंगे। हम सर्वश्रेष्ठ करने की कोशिश कर रहे हैं।

क्रिएटिविटी का कमाल : डूडल कलाकार पलाश पांडे ने बताया कि मैं डिजाइनिंग में जाना चाहता हूं। रोज डेढ़ घंटे तक आर्ट बनाता हूं। डूडलिंग मसल मेमोरी के लिए एक तरह की एक्सरसाइज है। इसकी आदत बनने पर आप चीजें जल्दी स्केच कर सकेंगे। बहुत बार लोग हल्की डूडलिंग करते ही हैं। मैंने आठवीं कक्षा में एक यू-ट्यूब चैनल पर डूडलिंग देखी तो मुझे अंदर से लगा कि यह एक बहुत अलग आर्ट है। उस समय भारत में ज्यादा बच्चे डूडलिंग नहीं कर रहे थे। डूडलिंग करते समय आप अपनी सारी क्रिएटिविटी कागज पर निकालते हैं। अपना 100 प्रतिशत देते हैं। खुद को आसानी से व्यक्त कर पाते हैं। अगर कोई किसी चीज से नाराज होता है तो उसके डूडल नाराजगी दिखती है। डूडलिंग आपके मन को कुछ भी कहने की इजाजत और आजादी देता है।

मन में बात कागज पर : यूएक्स डिजाइनर अनुनय यूआई ने बताया कि जब मैं नवीं कक्षा में था तो मैंने डूडलिंग करना शुरू किया। मैं आरके लक्ष्मण जी के कार्टूंस से प्रेरित हूं। इसके बाद डूडल कलाकार कर्बी से मेरा जुड़ाव हुआ। मैं रोज डूडलिंग करता हूं। मैं इसी फील्ड में हूं। आजकल यूआई / यूएक्स (यूजर्स इंटरफेस एंड यूजर एक्सपीरियंस) डिजाइन का कोर्स कर रहा हूं। आप एप यूजर के रूप में जो आइकॉन देखती हैं। उन्हें हम डिजाइन करते है। मैं अपने इलेस्ट्रेशंस और डूडल्स को प्रोफेशन के साथ मिक्स नहीं करूंगा। डूडलिंग के साथ अच्छी बात यह है कि जितनी भी मन में बात होती है वह बाहर निकल जाती है और बच्चे शांत रहते हैं। अपनी इस कला के लिए इसके लिए मुझे स्कूल में सम्मानित भी किया गया। नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी जी ने मुझे पुरस्कार दिया।

डूडल बनाना है फायदेमंद

. यह आपके लिए थिकिंग टूल है।

. यह आपकी याददाश्त बढ़ाते हैं।

. यह आपमें कल्पनाशीलता बढ़ाते हैं।

. यह कला आपका तनाव कम करती है। क्योंकि मन में भरी भावनाएं बाहर निकल जाती हैं। . इससे आपकी मानसिक और शारीरिक सेहत में इजाफा होता है। . इसे करते समय ध्यान जैरी स्थिति बन जाती है। . दिमाग का व्यायाम होता है। . रचनात्मक सोच विकसित होती है। . सीखने, याद रखने और सूचनाएं रिकार्ड करने की सामथ्र्य बढ़ती है। . समस्याएं सुलझाने की काबिलियत बढ़ जाती है।

डूडल है गूगल की सोच

1998 जब गूगल के संस्थापकों लैरी और सर्गेई ने नेवाडा के रेगिस्तान में बॄनग मैन उत्सव अपनी उपस्थिति दर्शाने के लिए अपने कारपोरेेट 'लोगो' को कलात्मक रूप दिया तो गूगल शब्द के दूसरे 'ओ' के पीछे छड़ी की आकृति की ड्राइंग लगा दी। उनका प्रयोजन गूगल के उपयोगकर्ताओं को यह मजेदार मैसेज देना था कि संस्थापक कार्यालय से बाहर हैं। हालांकि, पहला डूडल काफी सरल था, लेकिन किसी खास इवेंट को मनाने के लिए कंपनी के 'लोगो' को सजाने का विचार जन्म ले चुका था। समय के साथ, डूडल की मांग दुनिया भर में बढ़ गई है और डूडल बनाना अब रचनाकारों (जिन्हें डूडलर कहते हैं) और इंजीनियरों की एक खास योग्यता वाली टीम की जिम्मेदारी है। डूडल चुनते समय ऐसे मनोरंजक इवेंट और वर्षगांठ ढूंढ़ा जाता है जिसके जरिए गूगल की पहचान, नई चीजेंं करने और आजमाने की सोच झलकती है।

(गूगल डॉट कॉम से साभार)

डूडल का अर्थ

आप खाली बैठे हुए हैं और ऐसे ही कोई कलाकृति बना रहे हैं तो वह डूडल है। खाली समय में बैठकर बेवजह की गई चित्रकारी डूडल है। कई लोगो में एक खास आदत होती है कि वे कभी कागज, कापी, किताबों या डेस्क पर आड़ी-तिरछी आकृतियां बनाते नजर आते हैं। इन चित्रों को ही डूडल्स कहा जाता है। डूडल व्यक्ति के नजरिए और सोच को बताता है। गूगल ने ही किसी भी विशेष दिन को चिन्हित करने के लिए डूडल्स का इस्तेमाल कर डूडल्स को बहुत अधिक महत्व दिया है।

अब एनीमेटेड कार्टून भी

शुरुआत में डूडल पर कोई एनिमेटिड कार्टून नहीं होता था बल्कि एक इमेज और उसके साथ एक संदेश होता था। लेकिन 2010 में पहला एनिमेटिड डूडल पेश किया गया जो आइजैक न्यूटन को समॢपत था। इसके कुछ दिनों बाद ही दूसरा एनीमेटिड डूडल बनाया गया। इसके बाद डूडल में हाइपरलिंक जोड़े गए। गूगल अब तक हजारो की संख्या में डूडल पेश कर चुका है।

डाउनलोड करें हमारी नई एप और पायें अपने शहर से जुड़ी हर जरुरी खबर!
This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.