जीत की राह, अपनी कमियों पर विजय हासिल कर लेने के बाद लक्ष्य हासिल करना कहीं अधिक आसान

कई प्रयासों के बावजूद भी जब कामयाबी नहीं मिल पाती तो ऐसे में ठहरकर सोचने की जरूरत होती है कि आखिर कमी कहां रह गई। उन कमियों को दूर करके पुनः प्रयास करेंगे तो सफलता की उम्मीद कहीं अधिक होगी।

Sanjay PokhriyalSat, 23 Oct 2021 09:52 AM (IST)
खुद पर भरोसा रखकर किस तरह से प्रयास करें कि आगे की राह सुगम हो सके

नई दिल्‍ली, अरुण श्रीवास्तव। हमारा देश प्राचीन समय से ही स्वाभिमान के साथ अपनी पहचान बनाता और आगे बढ़ता रहा है, भले ही हमारी राह में तमाम मुश्किलें आती रही हैं। वसुधैव कुटुंबकम की धारणा में विश्वास रखते हुए पूरी दुनिया को अपना परिवार समझते हुए हमारा देश कभी भी आक्रांता की भूमिका में नहीं रहा। पर इसी को हमारी कमजोरी समझते हुए प्राचीन काल से ही विदेशी और मुस्लिम आक्रांताओं ने अनगिनत बार पर हम पर आधिपत्य जमाने की कोशिश की। तमाम आक्रमणों और झंझावातों के बावजूद भारतीय संस्कृति न सिर्फ अक्षुण्ण रही, बल्कि हम सभी का भरोसा इसमें और बढ़ा है। हमारी गौरवपूर्ण संस्कृति हमारी पहचान है और इससे हमें आगे बढ़ने की ऊर्जा भी लगातार मिलती रहती है।

सौ करोड़ के आगे : कोविड ने दुनिया के तमाम देशों के साथ-साथ भारतीयों को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। लेकिन तमाम विकसित और सक्षम देशों की तुलना में जिस तरह से भारत ने इस महामारी का सामना किया, वह अपने आप में किसी मिसाल से कम नहीं है। इस कड़ी में स्वावलंबन की राह पर चलते हुए भारत ने दो दिन पहले जिस तरह सौ करोड़ लोगों के टीकाकरण को पार किया, वह अपने आप में न केवल एक बड़ी उपलब्धि है, बल्कि इससे कोरोना मुक्त होने की राह पर आगे बढ़ते हुए जनजीवन को पूरी तरह पहले की तरह होने में भी मदद मिलेगी। बेशक कोरोना ने हम सभी को किसी न किसी रूप में प्रभावित किया है, लेकिन अब संयम और अनुशासन के साथ आगे बढ़ने का समय है। मुश्किलों ने हम सभी को और मजबूत बना दिया है।

आत्मविश्वास के साथ बढ़ें आगे

यदि आप प्रयास करने के क्रम में अपना मूल्यांकन भी करते रहेंगे, तो इससे उन कमियों को जानने का मौका मिलेगा, जिनसे आपको नुकसान हो सकता है सही समय पर कमियों/कमजोरियों को जान लेने से उन्हें दूर करने के लिए समुचित कदम उठा सकते हैं। इससे आत्ममुग्धता से बचने में भी मदद मिलती है अपनी कमियों पर विजय हासिल कर लेने के बाद लक्ष्य हासिल करना कहीं अधिक आसान हो जाता है

लौटा आत्मविश्वास : कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान लाकडाउन की वजह से जिस तरह अर्थव्यवस्था औंधे मुंह में गिरी थी, उसके जल्दी पटरी पर आने की उम्मीद नहीं की जा रही थी। वह भी तब, जब तमाम विशेषज्ञों द्वारा तीसरी लहर की आशंका जताई जा रही थी। लेकिन संयम और अनुशासन की राह पर चलते हुए सरकार के प्रयासों से जिस तरह देश में टीकाकरण को गति मिली, उससे सारी आशंकाएं निर्मूल साबित होती दिख रही हैं। लोगों का आत्मविश्वास भी लौटता दिख रहा है और फिर उत्साह के साथ अपने सपनों को पूरा करने में जुट रहे हैं। कोरोना ने हम सब को जख्म के साथ कई न भूलने वाले सबक भी दिए हैं, जो आगे हमें सचेतता के साथ आगे बढ़ने में मददगार साबित होंगे।

नौकरियों की आस : कोरोना के खौफ में कमी आने और विश्वास लौटने के साथ सरकारी और निजी क्षेत्र द्वारा युवाओं को उपलब्ध कराई जाने वाली नौकरियों में भी तेजी आती दिख रही है। अर्थव्यवस्था के गति पकड़ने और मांग बढ़ने के साथ तमाम छोटी-बड़ी कंपनियों द्वारा हायरिंग में तेजी लाई जा रही है। इससे उन युवाओं की निराशा दूर करने और उत्साह के साथ खुद को कुशल बनाने में मदद मिल रही है, जो कोरोना के कारण अनिश्चय के भंवर में फंसे हुए थे।

लक्ष्य की ओर : हमारे देश में युवाओं के बीच सरकारी नौकरियों का आकर्षण बहुत होता है, खासकर आइएएस और पीसीएस जैसी नौकरियों के लिए। इन सेवाओं के लिए वैसे तो हर साल प्रतियोगी परीक्षाएं होती हैं, लेकिन देखा जाए तो रिक्तियों के अनुपात में इनके लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवारों की संख्या अनुमान से कहीं बहुत अधिक होती है। यदि संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित की जाने वाली सिविल सेवा परीक्षा की बात करें, तो पता चलता है कि करीब छह से सात सौ रिक्तियों की तुलना में हर साल करीब 12 लाख से अधिक उम्मीदवार प्रारंभिक परीक्षा के लिए आवेदन करते हैं। इनमें से सभी का सपना आइएएस बनना होता है। हालांकि सभी का सपना सच हो पाना संभव नहीं है। इन उम्मीदवारों से कुछ अगंभीर हो सकते हैं, पर ज्यादातर अपने लक्ष्य को लेकर सजग होते हैं और उसे हासिल करने के लिए अपनी ओर से कोई कसर नहीं रहने देना चाहते। इसके बावजूद जब उन्हें कामयाबी नहीं मिलती, तो हताश होना स्वाभाविक है।

सीखें गलतियों से सबक : कई प्रयासों के बाद भी सफलता कोसों दूर रह जाती है। ऐसे में हताश और निराश होने के बजाय ठहरकर यह सोचने की जरूरत होती है कि आखिर कमी कहां रह गई। कहीं लक्ष्य चुनने में तो चूक नहीं हो गई? यह भी हो सकता है कि हम लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जो रास्ता चुन रहे हों, वह सही नहीं हो। कभी-कभी सिलेबस के किसी हिस्से को हम अनदेखा करते हुए आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं, जबकि वह सबसे महत्वपूर्ण होता है। ऐसा इसलिए होता है कि उस हिस्से को हम अपने लिए मुश्किल मानते हैं या फिर उसमें हमारी रुचि नहीं होती। यह अनदेखी ही हमारी असफलता का बड़ा कारण कारण बन जाती है।

कमजोरी को बनाएं ताकत : यदि सिलेबस के किसी खास हिस्से में हमारी रुचि नहीं है या फिर किसी कमजोरी के कारण हम उससे दूर भागना चाहते हैं, तो विचार करें कि क्या ऐसा करके हम खुद को ही नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं। अगर हम वाकई लक्ष्य को हासिल करने के लिए दृढ़ संकल्प रखते हैं, तो अपनी कमजोरी को स्वीकार करते हुए उसे अपनी ताकत बनाने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। इसके लिए जो भी संभव हो, वह करने के लिए खुद को प्रेरित करना चाहिए। इसमें शुरुआत में थोड़ी कठिनाई अलबत्ता हो सकती है, लेकिन यदि आप जिद के साथ कोशिश करते रहेंगे, तो एक न एक दिन आपकी वही कमजोरी ताकत में तब्दील हो जाएगी। फिर आपको सफलता से कोई रोक नहीं पाएगा।

करते रहें अपना मूल्यांकन : किसी भी लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए यह जरूरी है कि आप बीच-बीच में रुककर अपने प्रयासों का ईमानदारी से मूल्याकन करते रहें। इससे आपको अतिआत्मविश्वास से बचते हुए अपनी कमियों को जानने-समझने और उन्हें दूर करने में मदद मिल सकेगी। यह प्रक्रिया तब तक चलती रहनी चाहिए, जब तक कि अंतिम रूप से आपको कामयाबी न मिल जाए। खुद को भटकने से बचाने के लिए ऐसा करना बेहद जरूरी होता है। 

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