Autoimmune: कोरोना काल में हाइजीन हाइपोथीसिस से हासिल ऑटो इम्युन बना भारतीयों के लिए वरदान

टीका लगाने के बाद भी मास्क, सुरक्षित शारीरिक दूरी और सैनिटाइजेशन का पालन करते रहें।

हाइजीन हाइपोथीसिस से हासिल ऑटो इम्युन भारतीयों को कोरोना से लड़ने में मदद कर रहा है। कारगर और तेज टीकाकरण के जरिये उसे और बेहतर बनाया जा रहा है। इस महामारी पर हम विजय के करीब हैं जल्द ही पुराने दिनों की वापसी संभव है।

Publish Date:Mon, 25 Jan 2021 10:56 AM (IST) Author: Sanjay Pokhriyal

डॉ शेखर मांडे। चिकित्सा विज्ञान के लिहाज से देखें तो पृथ्वी दो तरह की भौगोलिक परिस्थितियों वाला ग्रह है। एक जहां पानी की स्वच्छता का स्तर बहुत ज्यादा है वहीं दूसरी ओर स्वच्छता कम है। इस अंतर की वजह से दोनों जगह होने वाली बीमारियों का भी अपना-अपना वर्ग है। कोविड-19 का अलग-अलग देशों पर अलहदा असर इसका सबसे ताजा उदाहरण है। अब जब हम इस महामारी की चपेट से धीरे-धीरे बाहर निकलने लगे हैं तो यह बोलने में कोई संकोच नहीं है कि कोरोना संक्रमण धरती पर फैले अब तक की भयावह महामारियों में से एक है। आपको ध्यान हो तो शुरुआती दौर में लोगों के मन में यह शंकाएं जन्म लेने लगी थीं कि धरती बचेगी या नहीं। ऐसे में हाइजीन हाइपोथीसिस ने ही भारत जैसे देशों पर कोरोना के असर को कम किया।

कोरोना संक्रमण के दौरान हुए तमाम अध्ययनों से यह साबित हुआ है कि गंदगी और कम गुणवत्ता वाले पानी की वजह से जिन देशों में हाइजीन यानी स्वच्छता का स्तर कम है, वहां कोरोना का असर कम रहा है। निम्न और मध्यम आय वाले देशों पर हाई पैरासाइट और बैक्टीरिया से फैलने वाली बीमारियों का बोझ ज्यादा होता है, जैसे भारत। यहां पानी के संक्रमण से फैलने वाली बीमारियां मलेरिया, आंत्रशोध, प्लेग आदि का प्रकोप ज्यादा रहा है। मगर वायरस से फैलने वाली बीमारियां कम हुई है। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि भारतीय बच्चों में बचपन से ही इन परिस्थितियों से निपटने की क्षमता पैदा हो जाती है। जब कोरोना का आक्रमण हुआ तो अधिकांश लोग उससे उबर गए। इसे ऑटोइम्यून सिस्टम कहते हैं। यानी खुद ब खुद बेहतर होना।

उदाहरण के तौर पर, बिहार भारत का एक गरीब राज्य है। लेकिन कोविड-19 से यहां मौत का खतरा सिर्फ 0.5 प्रतिशत रहा है। विकसित देशों जैसे अमेरिका, यूरोप में बेहतर हाइजीन और इंफेक्शन के खतरे का घटता स्तर ऑटोइम्यून डिसऑर्डर और एलर्जी की समस्या पैदा करता है। जैसे इन देशों में लीवर सिरोसिस जैसी बीमारी ज्यादा होती है। ऑटोइम्यून डिसॉर्डर की समस्या हाई जीडीपी वाले देशों यानी विकसित देशों में ज्यादा देखने को मिली है। यही वजह रही कि वहां कोरोना संक्रमण और मौत का आंकड़ा ज्यादा रहा। भारत की तुलना में अमेरिका की आबादी एक चौथाई है। जबकि वहां हमसे दो गुना संक्रमण फैला और मौत भी उतनी ही अधिक हुई। सीएसआइआर ने भी इस पर एक रिपोर्ट तैयार की है। जिसमें 25 मापदंडों का विश्लेषण किया है। यह रिपोर्ट जल्द ही साइंस जनरल में प्रकाशित होगी। कोरोना के दौरान लोगों ने आयुर्वेद और घरेलू नुस्खे (नेचुरोपैथी) का खूब इस्तेमाल किया। यह पहला मौका है जब इतनी बड़ी संख्या में लोगों ने पारंपरिक पद्धति को अपनाया। सीएसआइआर, आयुष विभाग के साथ मिलकर इसका अध्ययन कर रहा है। हम जानना चाहते हैं कि अश्वगंधा, गिलोय आदि चीजों के सेवन का कितना और क्या असर रहा है?

कोरोना संक्रमण को बेहतर इम्यून सिस्टम से ही हराया जा सकता है। जो टीका लगाया जा रहा है वह व्यक्ति के इम्यून सिस्टम को इतना बेहतर बना देता है कि वायरस को हरा सके। हाइजीन हाइपोथीसिस हमें कोरोना से लड़ने में मदद कर रहा है और टीकाकरण के जरिये उसे और बेहतर बना सकते हैं। इसमें कोई दो मत नहीं है कि भारत में विदेशी देशों की तुलना में मास्क, सैनिटाइजेशन और सुरक्षित शारीरिक दूरी का बेहतर ढंग से पालन किया गया है। इतनी बड़ी आबादी के बावजूद यह कैसे संभव हुआ यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध का विषय बन गया है। एक बार फिर टीका जरूर लगवाएं। दोनों डोज लगाना जरूरी है। टीका लगाने के बाद भी मास्क, सुरक्षित शारीरिक दूरी और सैनिटाइजेशन का पालन करते रहें।

[महानिदेशक, सीएसआइआर, नई दिल्ली]

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