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अंडर-19 क्रिकेट टीम के नवनियुक्त कप्तान प्रियम गर्ग के पिता नरेश कुमार के हौसले की कहानी

अमित तिवारी, मेरठ। यह कहानी है भारतीय अंडर-19 क्रिकेट टीम के नवनियुक्त कप्तान प्रियम गर्ग की सफलता में निहित उनके पिता के घोर संघर्ष की। पिता के साथ मां का भी किरदार निभाते हुए उन्होंने न केवल प्रियम वरन सभी बेटे-बेटियों का भविष्य संवारा। होनहार क्रिकेटर प्रियम अब अपने करियर की शुरुआती चढ़ान पर हैं, आखिर अंडर-19 विश्वकप में भारतीय टीम का नेतृत्व करना कोई छोटी-मोटी बात तो नहीं।

कठिन परिश्रम का अक्स

हालांकि इस मुकाम तक पहुंचने के पहले प्रियम व उनके परिवार की मेहनत अपने में एक लंबी दास्तां छुपाए है। उनके खेल में प्रियम की मेहनत के साथ ही पिता नरेश कुमार गर्ग के कठिन परिश्रम का भी अक्स झलकता है। प्रियम में क्रिकेट के प्रति दिखी ललक ने उनका हौसला बढ़ाया तो पिता के किरदार में वह भी प्रियम के खेल से जुड़ गए। हर सुबह प्रियम को मेरठ, उप्र के निकट पैतृक गांव किला परीक्षितगढ़ से शहर स्थित भामाशाह पार्क पहुंचाना और शाम को घर ले जाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था।

खराब आर्थिक दौर के दौरान प्रियम की मांं का निधन

यहां तक कि बिटिया की शादी में भी सुबह उसे विदा करने से पहले वह प्रियम को मैच खेलने के लिए दिल्ली छोड़कर आए थे। नरेश कुमार गर्ग के अनुसार बेहद खराब आर्थिक दौर से गुजरने के दौरान ही 11 मार्च 2012 को प्रियम की माता कुसुम देवी का करीब छह महीने के इलाज के बाद निधन हो गया। उनके लिवर में पीलिया के बाद इंफेक्शन हो गया था। इसके बाद प्रियम की ट्रेनिंग बंद हो गई।

मेहनत रंग रंग लाई, प्रियम का बल्ला बोलने लगा

घर में छोटे बच्चों का खाना बनाने से लेकर उन्हें पढ़ाने तक की जिम्मेदारी के बीच प्रियम को रोज शहर लाने का क्रम टूट गया। उस दौरान प्रियम यूपीसीए अंडर-14 के प्रबल दावेदार बन चुके थे। कोच संजय रस्तोगी और एमडीसीए पदाधिकारियों के प्रोत्साहन पर नरेश ने फिर हिम्मत बांधी और पिता के साथ मां का भी किरदार निभाते हुए प्रियम को नियमित ट्रेनिंग में पहुंचाने लगे। पूर्व क्रिकेटर और कोच राहुल द्रविड़ ने भी एक मुलाकात में प्रियम के खेल को देख भरोसा दिलाया था कि अगर मेहनत चलती रही तो प्रियम को मुकाम जरूर मिलेगा। मेहनत रंग रंग लाई, प्रियम का बल्ला बोलने लगा।

नरेश ने बाकी बच्चों को भी उसी लाड़- प्यार से पाला

नरेश का फोकस केवल प्रियम तक ही सीमित नहीं था, उन्होंने बाकी बच्चों को भी उसी लाड़- प्यार से पाला। उनकी कुशल परवरिश का ही नतीजा है कि प्रियम के बड़े भाई शिवम गर्ग, बड़ी बहन पूजा और च्योति चिकित्सा क्षेत्र में सेवारत हैं। तीसरी बहन रेशु ने भी फार्मेसी की पढ़ाई पूरी कर ली है। अब वह सिविल सेवा की तैयारी कर रही हैं। वर्ष 2009 में नरेश कुमार प्रियम को भामाशाह पार्क में संचालित मेरठ कॉलेज क्रिकेट एकेडमी में कोच संजय रस्तोगी के पास लेकर पहुंचे थे।

क्रिकेट का ककहरा सीखने के क्रम में ही प्रियम अपने हुनर का परिचय देने लगे थे। टैक्सी चालक नरेश कुमार हर दिन सुबह प्रियम को भामाशाह पार्क पहुंचाते और शाम को साथ लेकर घर जाते। प्रियम भी सुबह से शाम तक क्रिकेट की ट्रेनिंग करने के साथ ही क्रिकेट को जीने लगे। प्रियम की दुनिया घर और क्रिकेट के मैदान तक सिमटी रही, वहीं पिता नरेश भी हमेशा बेटे के साथ खड़े रहे।

प्रियम की सफलता, संघर्ष की कथा-कहानी के बीच लंबी सांस लेते हुए नरेश ने बताया कि मैंने टैक्सी चलाने के अलावा पैसे जोड़ने को और भी छोटे-मोटे काम किए। जीने की जद्दोजहद के बीच मैं अपने सभी बच्चों को बताता रहा कि किसी का अपमान और पैसे पर गुमान कभी मत करना। आशीर्वाद सबका लेते रहें पर दोस्ती- यारी सिर्फ पढ़ाई, ट्रेनिंग और अपने काम से ही करें।

इसी मार्गदर्शन ने बच्चों को तंगी के समय भी भटकने नहीं दिया। बताते हैं, अपने साथियों के साथ किला परीक्षितगढ़ में ही स्थानीय संगम क्लब के लिए क्रिकेट खेला करते थे। खेलता देख प्रियम भी घर आने पर प्लास्टिक की छोटी गेंद से क्रिकेट खेलता, और आज वह भारतीय टीम का कप्तान है।

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