अपनी सरजमीं पर भारत से मिली हार को भुला नहीं पा रहे ऑस्ट्रेलियाई- सुनील गावस्कर

गावस्कर ने कहा कि मेरे विचार से टीम इंडिया की तारीफ होनी चाहिए कि उसने एक स्वर्ण पदक विजेता जैसी टीम को उसके घर में ही चारों खाने चित किया और इस तरह की बातों को ऑस्ट्रेलिया ने खुद स्वीकारा है।

Sanjay SavernSat, 15 May 2021 08:03 PM (IST)
भारतीय टेस्ट टीम के खिलाड़ी एक साथ (एपी फोटो)

सुनील गावस्कर का कॉलम 

जब हालात विपरीत और कठिन हों तो आपको चीजों को नजरअंदाज करना चाहिए, ना कि उससे बचने के लिए बहाने तलाशने चाहिए। ऑस्ट्रेलियाई कप्तान टीम पेन अगर इस पंक्ति से वाकिफ होते तो शायद इस साल बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी में लगातार दूसरी बार टीम इंडिया से हारने के छह महीने बाद बहाने ना बनाते, बल्कि इस हार को जल्द से जल्द भूलने की कोशिश करते। हालांकि ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी अपनी सरजमीं पर भारत से मिली हार को भुला नहीं पा रहे हैं, नहीं तो वे ऐसे बयान कतई नहीं देते।

पेन ने साल 2018 में दक्षिण अफ्रीका में हुई बॉल टेंपरिंग (गेंद से छेड़छाड़) की घटना के बाद ईमानदारी से क्रिकेट खेलते हुए व शानदार कप्तानी से ऑस्ट्रेलियाई लोगों का दोबारा विश्वास जीता। उनके नेतृत्व में एक बार फिर से ऑस्ट्रेलियाई टीम ने मनोबल हासिल किया और विश्व स्तर पर लड़ने को तैयार हुई। हालांकि, उनके भोलेपन की छवि इंग्लैंड मे एशेज सीरीज के दौरान सामने नहीं आई थी, लेकिन भारत के खिलाफ घरेलू सीरीज में इसी के चलते ऑस्ट्रेलिया को हार का सामना करना पड़ा।

इंग्लैंड में एशेज सीरीज के दौरान लीड्स टेस्ट में बेन स्टोक्स ने नंबर 11 के बल्लेबाज जैक लीच के साथ मिलकर टीम को ऐतिहासिक जीत दिलाई, जबकि भारत के भी ऑस्ट्रेलिया दौरे पर यही हुआ। जब पहले टेस्ट मैच में कप्तान विराट कोहली के नेतृत्व वाली टीम इंडिया 36 पर ऑलआउट हो गई। उसके बाद कोहली स्वदेश वापस लौट आए और सभी ऑस्ट्रेलियाई दिग्गजों ने भविष्यवाणी करना शुरू कर दी थी कि इस बार भारत का टेस्ट सीरीज में सूपड़ा साफ होगा, लेकिन बाद में पेन ने अगले मैच में क्या किया।

दूसरे टेस्ट मैच में टॉस जीतने के बाद पेन ने बल्लेबाजी चुनी, जबकि पूर्व ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग मैच से पहले रिपोर्ट में बता चुके थे कि पिछले टेस्ट की पिच से इस पिच पर तीन मिलीमीटर घास ज्यादा है, जहां भारत 36 पर ऑलआउट हुआ था। ऐसे में पेन ने बल्लेबाजी चुनी और भारतीय गेंदबाजों ने उसका फायदा उठाते हुए ऑस्ट्रेलियाई पारी को 200 के अंदर समेटते हुए सीरीज में भारत की वापसी करा दी। उसके बाद तीसरे सिडनी टेस्ट मैच में जब हनुमा विहारी और अश्विन को चोट लगी थी, उस समय पेन ने मिशेल स्टार्क को गेंदबाजी आक्रमण पर नहीं लगाया, जबकि चौथे ब्रिसबेन टेस्ट में भी उनका गेंदबाजों का चयन और क्षेत्ररक्षण बिलकुल स्कूली क्रिकेट के बच्चे की तरह था। बहुत सारे कैच चौथे स्लिप में जा रहे थे, लेकिन जब पेन ने वहां पर मैथ्यू वेड को लगाया तब तक भारतीय बल्लेबाज काफी रन स्कोर बोर्ड पर लगा चुके थे।

अब पेन ने यह बहाना बनाया कि टीम इंडिया के खिलाड़ी चालबाज हैं और सीरीज के दौरान उनका तमाम गतिविधियों से ध्यान भटका रहे थे। बल्लेबाजों के बार-बार दस्ताने बदलने से उनकी नजर गेंद से हट रही थी। मेरे विचार से टीम इंडिया की तारीफ होनी चाहिए कि उसने एक स्वर्ण पदक विजेता जैसी टीम को उसके घर में ही चारों खाने चित किया और इस तरह की बातों को ऑस्ट्रेलिया ने खुद स्वीकारा है। ऑस्ट्रेलिया को टीम इंडिया का सम्मान करना चाहिए।

अब तथ्य की बात यह है कि ना सिर्फ भारतीय खिलाड़ी, बल्कि टीम के किसी एक अधिकारी तक ने इस बात को नहीं कहा था कि वह ब्रिसबेन में टेस्ट मैच खेलने नहीं जाना चाहते थे। भारतीय मीडिया में भी इस तरह का कुछ नहीं था। यह सब कुछ ऑस्ट्रेलियाई मीडिया की तरफ से आया था। वह इस मामले को साल 2008 में हरभजन-सायमंड्स (मंकीगेट प्रकरण) की तरह हवा देने में लगे हुए थे। हालांकि दोनों कहानियों में सच्चाई का एक दाना भी नहीं है, लेकिन फिर जैसा कि मीडिया में कहावत है सच्चाई को एक अच्छी कहानी के रास्ते में क्यों ना आने दें।

इसलिए वहां पर अगर कोई चीज मैच से उनका ध्यान भटका रही थी तो वह उनका ऑस्ट्रेलियाई मीडिया, सपोर्ट स्टाफ और खुद कप्तान पेन थे। वह सिडनी में कीपिंग के दौरान अश्विन को गाबा आने की बात कह रहे थे, जबकि इस मैच में पेन से लियोन की गेंद पर कैच भी छूटा। बल्ले से लगने के बाद गेंद जब तक पेन के दस्तानों में आती, उससे पहले ही वह अपने दस्तानों को बंद कर चुके थे। इसके बाद प्रतिक्रिया आई थी कि मुंह खोलने के बजाय अगर दस्ताने खुले रखेंगे तो शायद ज्यादा सही रहेगा। जरा सोचिए इन तमाम चीजों के बाद भी ऑस्ट्रेलिया की तरफ से हार को पचाने के लिए नए-नए बहाने बनाने का सिलसिला जारी है।

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